​बिहार की सत्ता का एक और अल्पकालिक अध्याय: 145 दिनों में सिमटा नीतीश कुमार का यह कार्यकाल, इतिहास के पन्नों में दर्ज हुई एक और ‘शॉर्ट टर्म’ पारी

पटना। बिहार की सियासत को अनिश्चितताओं और चौंकाने वाले फैसलों की प्रयोगशाला कहा जाता है, और इस प्रयोगशाला के सबसे बड़े वैज्ञानिक के रूप में अपनी पहचान बना चुके नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। पटना के राजनीतिक गलियारों में इस समय केवल उनके इस्तीफे की खबर नहीं तैर रही है, बल्कि चर्चा उस आंकड़े की हो रही है जो उनके इस वर्तमान कार्यकाल की उम्र बता रहा है। 20 नवंबर 2025 को जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा था कि कैलेंडर का पन्ना आधा भी नहीं पलटेगा और वे एक नई भूमिका की ओर कदम बढ़ा देंगे। 13 अप्रैल 2026 तक उनके इस कार्यकाल के 144 दिन पूरे हो चुके हैं और 14 अप्रैल को औपचारिक इस्तीफे के साथ ही यह सफर 145 दिनों पर जाकर ठहर जाएगा। बिहार की राजनीति के इतिहास में यह कार्यकाल एक ऐसे ‘शॉर्ट टर्म’ अध्याय के रूप में दर्ज होने जा रहा है, जिसने न केवल सत्ता के समीकरणों को बदला, बल्कि नीतीश कुमार के राजनीतिक लचीलेपन और रणनीति को एक नई परिभाषा भी दी।

145 दिन: रणनीति का हिस्सा या समय का तकाज़ा?

​किसी भी मुख्यमंत्री के लिए 145 दिन का समय बहुत छोटा होता है, जिसमें योजनाओं को धरातल पर उतारना तो दूर, अक्सर कैबिनेट के स्वरूप को समझने में ही वक्त निकल जाता है। लेकिन नीतीश कुमार के मामले में यह आंकड़ा केवल समय की कमी नहीं, बल्कि एक बड़ी राजनीतिक बिसात का हिस्सा नजर आता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नवंबर 2025 में जब उन्होंने कमान संभाली थी, तभी से उनके दिमाग में ‘एग्जिट प्लान’ तैयार था।

​इन 145 दिनों के भीतर उन्होंने अपनी पार्टी और गठबंधन के भीतर उन तमाम पेचों को कस लिया, जो उनके दिल्ली प्रस्थान (राज्यसभा जाने) के लिए जरूरी थे। इस संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रशासन की गति को बनाए रखा और यह सुनिश्चित किया कि जब वे सत्ता की चाबी भाजपा के हाथों में सौंपें, तो विरासत और विकास का संतुलन बना रहे। 145 दिनों का यह सफर भले ही छोटा हो, लेकिन इसमें लिए गए फैसले आने वाले कई वर्षों तक बिहार की राजनीति को प्रभावित करेंगे। यह कार्यकाल नीतीश कुमार के उस कौशल का प्रमाण है जहाँ वे समय से ज्यादा फैसलों की तीव्रता पर भरोसा करते हैं।

इतिहास का आईना: जब 7 दिनों में ही गिर गई थी सरकार

​नीतीश कुमार के लिए यह पहली बार नहीं है जब उनका कार्यकाल इतना संक्षिप्त रहा हो। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें, तो साल 2000 का वह दौर याद आता है जब बिहार की राजनीति अपनी सबसे अस्थिर स्थिति में थी। 3 मार्च 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। उस समय सदन का गणित बेहद पेचीदा था और वे बहुमत के आंकड़े से दूर थे। महज 7 दिनों के भीतर ही, यानी 10 मार्च 2000 को उन्हें अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा था क्योंकि वे सदन के पटल पर विश्वास मत हासिल नहीं कर सके थे।

​वह 7 दिनों का कार्यकाल आज भी बिहार के संसदीय रिकॉर्ड में नीतीश कुमार की सबसे छोटी पारी के रूप में दर्ज है। उस 7 दिनों की हार ने उन्हें जो सबक सिखाया, उसी का नतीजा था कि उन्होंने बाद के वर्षों में गठबंधन की राजनीति का ऐसा तिलिस्म बुना कि वे ‘अपरिहार्य’ बन गए। साल 2000 के उन 7 दिनों और 2026 के इन 145 दिनों के बीच एक बड़ा अंतर है। 2000 में वे ‘मजबूरी’ में हटे थे, जबकि 2026 में वे अपनी ‘रणनीति’ के तहत खुद पद छोड़ रहे हैं। यह बदलाव उनके राजनीतिक कद के बढ़ने और स्थिति पर उनकी पकड़ को दर्शाता है।

बिहार की नई पॉलिटिक्स का टर्निंग पॉइंट

​नीतीश कुमार का यह 145 दिनों का कार्यकाल बिहार में ‘पोस्ट-नीतीश’ युग की आधारशिला माना जा रहा है। इस दौरान उन्होंने जिस तरह से भाजपा के साथ समन्वय बिठाया और अपने पुत्र निशांत कुमार को धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय किया, वह बताता है कि ये 145 दिन व्यर्थ नहीं गए। उन्होंने इस छोटे से कालखंड में यह स्पष्ट कर दिया कि बिहार अब एक नए नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है।

​राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कभी-कभी पीछे हटना, भविष्य की बड़ी छलांग के लिए जरूरी होता है। नीतीश कुमार का यह इस्तीफा और 145 दिनों की पारी का समापन, बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के मार्ग को प्रशस्त कर रहा है। यह कार्यकाल उस संक्रमण काल (Transition Period) की तरह है, जिसने सत्ता के केंद्र को ‘समाजवाद’ के पारंपरिक ढांचे से निकालकर ‘भगवा एनडीए’ के नए सांचे में फिट कर दिया है। 145 दिनों की इस कहानी का अंत 14 अप्रैल को राजभवन के कमरों में होगा, लेकिन इसकी गूँज आगामी 2030 तक की राजनीति में सुनाई देगी।

14 और 15 अप्रैल: विदाई और नए सवेरे की तैयारी

​अब पूरी दुनिया और विशेष रूप से बिहार की जनता की नजरें 14 अप्रैल के उस पल पर टिकी हैं, जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री आवास से राजभवन के लिए निकलेंगे। 145वें दिन का सूरज डूबते ही बिहार के एक लंबे राजनीतिक युग का समापन हो जाएगा। 15 अप्रैल को जब नई सरकार शपथ लेगी, तब यह 145 दिनों की पारी एक ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में याद की जाएगी।

​पटना की सड़कों पर बढ़ती हलचल, होर्डिंग्स का बदलना और नेताओं की आवाजाही इस बात की तस्दीक कर रही है कि बिहार एक बार फिर बड़े राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। हर दल अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटा है और हर नेता इस ‘शॉर्ट टर्म’ कार्यकाल के निहितार्थ खोजने में लगा है। नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे केवल मुख्यमंत्री रहने के लिए नहीं, बल्कि राजनीति की दिशा तय करने के लिए जाने जाते हैं। समय के इस छोटे से टुकड़े यानी 145 दिनों ने यह दिखा दिया है कि राजनीति में दिनों की संख्या से ज्यादा, उन दिनों में बदले गए समीकरणों का वजन अधिक होता है। बिहार एक नए सवेरे का इंतजार कर रहा है, जहाँ नेतृत्व नया होगा, चेहरा नया होगा, लेकिन नींव इन्हीं 145 दिनों की जद्दोजहद पर टिकी होगी।

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