
पटना। बिहार, जिसकी मिट्टी ने नालंदा और विक्रमशिला जैसे महान विश्वविद्यालयों को जन्म दिया, आज एक बार फिर अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल कर चुका है। केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत आयोजित राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वे में बिहार ने अपनी सांस्कृतिक गहराई का लोहा मनवाते हुए पूरे देश में तीसरा स्थान प्राप्त किया है। 17 अप्रैल 2026 को पटना में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में यह गौरवशाली तथ्य सामने आया कि बिहार अब केवल राजस्थान और मध्य प्रदेश से पीछे है, जबकि 6,19,051 चिन्हित पाण्डुलिपियों के साथ उसने देश के अन्य सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में न केवल इन उपलब्धियों का उत्सव मनाया गया, बल्कि इस मिशन को पूर्ण शुद्धता के साथ शीर्ष पर ले जाने के लिए जिलाधिकारियों को कड़े और स्पष्ट निर्देश भी जारी किए गए। यह सर्वे केवल कागजों का संकलन नहीं है, बल्कि बिहार के उस बौद्धिक गौरव की पुनर्स्थापना है जो सदियों से निजी संग्रहों, मठों और पुराने संदूकियों में धूल फांक रहा था।
सांस्कृतिक महाकुंभ: राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद बिहार की धमक
बिहार की इस सफलता की कहानी इसके जिलों में छिपी उस विरासत में है जिसे अब आधिकारिक तौर पर पहचाना जा रहा है। समीक्षा बैठक के दौरान कला एवं संस्कृति विभाग के अधिकारियों ने बताया कि राज्य के सभी 38 जिलों में जिला स्तरीय समितियों का गठन न केवल पूर्ण हो चुका है, बल्कि 35 जिलों ने तो अपना सर्वे डेटा ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड भी कर दिया है। 6 लाख से अधिक पाण्डुलिपियों की पहचान होना इस बात का प्रमाण है कि बिहार की ज्ञान परंपरा कितनी विस्तृत और गहरी रही है।
वर्तमान रैंकिंग में राजस्थान पहले और मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर है, लेकिन बिहार जिस गति से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए अधिकारियों को विश्वास है कि जल्द ही राज्य प्रथम स्थान पर काबिज होगा। अब तक कुल 433 सर्वे का सत्यापन (Verification) भी पूर्ण कर लिया गया है। यह सत्यापन प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पाण्डुलिपि की मौलिकता और उसकी ऐतिहासिक महत्ता की पुष्टि होती है। यह मिशन बिहार की उन दुर्लभ लिपियों और भाषाओं को पुनर्जीवित करने का जरिया बन रहा है जो समय के साथ लुप्तप्राय हो गई थीं।
प्रत्यय अमृत का कड़ा निर्देश: गुणवत्ता से समझौता राष्ट्र के साथ खिलवाड़
बैठक को संबोधित करते हुए मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने प्रशासनिक मशीनरी को स्पष्ट चेतावनी दी कि इस मिशन का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि वास्तविक धरोहरों का संरक्षण है। उन्होंने जिलाधिकारियों को निर्देशित किया कि सर्वे के दौरान डेटा की शुद्धता सर्वोपरि होनी चाहिए। प्रत्यय अमृत ने उन त्रुटियों पर कड़ी नाराजगी जाहिर की जहाँ केवल पृष्ठों की संख्या को एक अलग पाण्डुलिपि मान लिया जाता था या एक ही स्थान से बार-बार डेटा अपलोड किया जा रहा था।
मुख्य सचिव ने पाण्डुलिपि की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे अपने सर्वेयरों को शिक्षित करें। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि:
- प्रिंटेड किताबें या छपी हुई सामग्री पाण्डुलिपि नहीं है।
- पुराने सिक्के, रिकॉर्ड रूम के सामान्य दस्तावेज या प्रशासनिक संचिकाएं इस श्रेणी में नहीं आतीं।
- रजिस्ट्री ऑफिस के सामान्य दस्तावेजों को ऐतिहासिक पाण्डुलिपि मानकर डेटा फीड करना गलत है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पाण्डुलिपि वह है जो हाथ से लिखी गई हो और जिसकी अपनी एक ऐतिहासिक या सांस्कृतिक विशिष्टता हो। यदि डेटा में किसी भी प्रकार का कृत्रिम उछाल या फर्जीवाड़ा पाया गया, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
कलेक्टरों को ‘सम्मान का दूत’ बनने का आह्वान: जनता का विश्वास जीतना जरूरी
इस मिशन की सबसे बड़ी चुनौती निजी संग्रहकर्ताओं का विश्वास जीतना है। अक्सर ग्रामीण इलाकों या पुराने परिवारों में यह डर रहता है कि यदि वे अपनी दुर्लभ पाण्डुलिपियां सरकार को दिखाएंगे, तो सरकार उन्हें जब्त कर लेगी। इस शंका को दूर करने के लिए प्रत्यय अमृत ने एक बहुत ही संवेनदशील और प्रभावी निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि जिला पदाधिकारी (डीएम) स्वयं उन लोगों के पास जाएं जिनके पास दुर्लभ और महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियों का संग्रह है।
जिलाधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे इन संग्रहकर्ताओं को इस पुनीत कार्य में सहयोग के लिए सम्मानित करें। जब जिले का सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी किसी बुजुर्ग या विद्वान के घर जाकर उसकी धरोहर का सम्मान करेगा, तो समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा। प्रत्यय अमृत ने कहा कि यह पाण्डुलिपियों का संकलन केवल एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह हमारी भावी पीढ़ियों के लिए एक ‘ज्ञान कोष’ तैयार करने का मिशन है। इन दस्तावेजों में आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, साहित्य और स्थानीय इतिहास के ऐसे रहस्य छिपे हो सकते हैं जो दुनिया के सामने बिहार की एक नई छवि पेश करेंगे।
तकनीकी सुदृढ़ीकरण और विशेषज्ञों का समन्वय
बैठक में सर्वेयरों के प्रशिक्षण पर भी विशेष चर्चा हुई। कला एवं संस्कृति विभाग को निर्देशित किया गया है कि वे जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारियों (DACAO) के साथ निरंतर समन्वय बनाए रखें। किसी भी तकनीकी संशय या पाण्डुलिपि की पहचान में होने वाली कठिनाई के लिए विभागीय विशेषज्ञों की मदद लेने को कहा गया है। प्रत्यय अमृत ने कहा कि बिहार को शीर्ष स्थान पर पहुँचाने के लिए हर जिले को अपनी पूरी क्षमता के साथ काम करना होगा।
विशेष रूप से उन तीन जिलों पर ध्यान देने को कहा गया है जिनका डेटा अभी ऑनलाइन पोर्टल पर पूरी तरह अपलोड नहीं हुआ है। मुख्य सचिव ने निर्देश दिया कि सर्वे की प्रक्रिया की निरंतर अनुश्रवण (Monitoring) की जाए। उन्होंने कहा कि पाण्डुलिपियों का संरक्षण बिहार की अस्मिता का सवाल है और इसमें किसी भी स्तर पर होने वाली शिथिलता अक्षम्य होगी। विभाग को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि जो पाण्डुलिपियां जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं, उनके संरक्षण (Restoration) के लिए विशेषज्ञों की राय ली जाए।
निष्कर्ष: विरासत की रक्षा, बिहार की नई पहचान
17 अप्रैल 2026 की यह समीक्षा बैठक बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। 6,19,051 पाण्डुलिपियों के साथ देश में तीसरा स्थान पाना कोई सामान्य उपलब्धि नहीं है। यह बिहार की उस सामूहिक स्मृति का हिस्सा है जिसे दशकों तक उपेक्षित रखा गया। प्रत्यय अमृत के नेतृत्व में प्रशासन अब यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि ज्ञान भारतम् मिशन के तहत बिहार की यह धरोहर न केवल सुरक्षित रहे, बल्कि दुनिया भर के शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के लिए अध्ययन का केंद्र बने।
पाण्डुलिपियों का यह खजाना साबित करेगा कि बिहार अतीत में भी विश्व का गुरु था और भविष्य में भी ज्ञान की ज्योति जलाए रखने के लिए तैयार है। जिलाधिकारियों को दिए गए ये निर्देश जल्द ही धरातल पर दिखाई देंगे, जिससे बिहार की रैंकिंग में और सुधार होने की प्रबल संभावना है। अब उम्मीद है कि बिहार की यह ‘हस्तलिखित विरासत’ बहुत जल्द राजस्थान और मध्य प्रदेश को पीछे छोड़कर देश में पहले स्थान पर अपनी जगह बनाएगी।

