
पटना। बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर नीतीश सरकार ने शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को एक ऐसा युगांतरकारी निर्णय लिया है, जिसकी मांग दशकों से की जा रही थी। राज्य सरकार ने एक कड़ा संकल्प जारी करते हुए बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग, बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग और इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC) के तमाम चिकित्सकों और शिक्षक-चिकित्सकों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी इस संकल्प के बाद अब सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में तैनात डॉक्टर अपनी निजी क्लिनिक या किसी भी निजी अस्पताल में सेवा नहीं दे सकेंगे। सरकार का यह फैसला मुख्यमंत्री के ‘सात निश्चय-3’ कार्यक्रम के तहत लिया गया है, जिसका उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करना और राज्य के आम नागरिकों को 24 घंटे उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है। इस आदेश के साथ ही बिहार अब उन राज्यों की श्रेणी में शामिल हो गया है जहाँ सरकारी डॉक्टरों के लिए केवल सरकारी सेवा ही एकमात्र विकल्प होगी।
संकल्प संख्या 319(3): स्वास्थ्य विभाग का बड़ा प्रहार
स्वास्थ्य विभाग के सचिव लोकेश कुमार सिंह के हस्ताक्षर से जारी संकल्प (सं०सं०-3/जन-02/2022) ने राज्य के चिकित्सा जगत में हलचल मचा दी है। इस आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ‘सात निश्चय-3’ के अंतर्गत घोषित कार्यक्रमों की कंडिका 5 (च) के तहत यह निर्णय लिया गया है। इस संकल्प के दायरे में तीन प्रमुख संवर्गों को रखा गया है:
- बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग: इसमें जिलों, अनुमंडलों और प्रखंडों में तैनात तमाम चिकित्सा पदाधिकारी शामिल हैं।
- बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग: इसके अंतर्गत राज्य के सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य, प्राध्यापक और सहायक प्राध्यापक (Doctors in Teaching cadre) आएंगे।
- इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC): हृदय रोगों के विशेषज्ञ संस्थान के चिकित्सकों पर भी यह रोक प्रभावी होगी।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह प्रस्ताव स्वास्थ्य विभाग द्वारा काफी सोच-विचार के बाद तैयार किया गया था, जिस पर अब राज्य सरकार की अंतिम सहमति प्राप्त हो गई है। यह आदेश केवल कागजों तक सीमित न रहे, इसके लिए विभाग ने इसकी प्रतिलिपि मुख्य सचिव, सभी जिलाधिकारी, सभी सिविल सर्जन और मेडिकल कॉलेजों के अधीक्षकों को भेज दी है ताकि धरातल पर इसका अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।
नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस (NPA) और प्रोत्साहन राशि का प्रावधान
प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने के बदले सरकार ने डॉक्टरों की वित्तीय सुरक्षा का भी ध्यान रखा है। संकल्प में इस बात का जिक्र है कि चिकित्सकों को होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए सरकार उन्हें गैर-व्यावसायिक भत्ता (NPA) या विशेष प्रोत्साहन राशि प्रदान करेगी। हालांकि, इस भत्ते की सटीक दर और इसके भुगतान की प्रक्रिया के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश सक्षम प्राधिकार के अनुमोदन के बाद अलग से जारी किए जाएंगे।
आमतौर पर अन्य राज्यों या केंद्र सरकार की सेवाओं (जैसे AIIMS) में मूल वेतन का एक निश्चित प्रतिशत (प्रायः 20-25%) एनपीए के रूप में दिया जाता है। बिहार सरकार भी इसी तर्ज पर आकर्षक वित्तीय पैकेज तैयार कर रही है ताकि डॉक्टरों के बीच किसी प्रकार का असंतोष न हो। सरकार का मानना है कि जब डॉक्टरों को उनके हुनर और समय का उचित मुआवजा घर बैठे मिलेगा, तो वे पूरी निष्ठा के साथ केवल सरकारी अस्पतालों में अपनी सेवाएं दे सकेंगे।
सात निश्चय-3: विकसित बिहार की नई स्वास्थ्य नीति
यह फैसला मुख्यमंत्री की ‘सात निश्चय-3’ योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार सरकार का लक्ष्य है कि राज्य के हर नागरिक को उसके घर के पास ही विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा मिले। अभी तक की स्थिति यह थी कि सरकारी डॉक्टर अपनी ड्यूटी के बाद या कई बार ड्यूटी के दौरान भी निजी क्लिनिकों में समय देते थे। इससे सरकारी अस्पतालों में आने वाले गरीब मरीजों को या तो जूनियर डॉक्टरों के भरोसे रहना पड़ता था या फिर उन्हें भी निजी क्लिनिकों की ओर रुख करना पड़ता था जहाँ इलाज का खर्च उनकी पहुंच से बाहर होता था।
प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगने से अब पीएमसीएच (PMCH), एनएमसीएच (NMCH), डीएमसीएच (DMCH) जैसे बड़े अस्पतालों से लेकर ग्रामीण पीएचसी (PHC) तक विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी। सरकार चाहती है कि ‘रेफरल’ की बीमारी को खत्म किया जाए और स्थानीय स्तर पर ही मरीजों का गंभीर ऑपरेशन और इलाज संभव हो सके। सात निश्चय-3 का यह संकल्प बिहार को ‘मेडिकल हब’ बनाने की दिशा में एक बड़ा और साहसी कदम है।

अभिभावकों और गरीब मरीजों के लिए बड़ी राहत
बिहार के सरकारी अस्पतालों में प्रतिदिन लाखों मरीज इलाज के लिए पहुँचते हैं। इनमें से बहुतायत ऐसे होते हैं जो निजी अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च नहीं उठा सकते। प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगने से इन मरीजों को सबसे अधिक लाभ होगा। अब वरिष्ठ डॉक्टरों को ओपीडी और वार्ड में अधिक समय देना होगा।
इससे पहले अक्सर यह शिकायतें मिलती थीं कि वरिष्ठ डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में केवल औपचारिकता पूरी करते हैं और गंभीर मरीजों को अपने निजी नर्सिंग होम में बुला लेते हैं। अब इस ‘नेक्सस’ पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी। सरकारी अस्पतालों में जांच और दवाएं पहले से ही मुफ्त हैं, अब विशेषज्ञों का परामर्श भी 24 घंटे उपलब्ध होने से मृत्यु दर में कमी आने और स्वास्थ्य सूचकांकों में सुधार होने की उम्मीद है।
अनुपालन की चुनौती और प्रशासनिक मुस्तैदी
इतने बड़े फैसले को लागू करना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। पूर्व में भी इस तरह के प्रयास हुए थे, लेकिन डॉक्टरों के संगठनों के दबाव और कानूनी अड़चनों के कारण वे सफल नहीं हो पाए थे। लेकिन इस बार सरकार ने ‘संकल्प’ जारी कर अपनी मंशा साफ कर दी है। जिलाधिकारी और सिविल सर्जनों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में औचक निरीक्षण करें और यह सुनिश्चित करें कि कोई भी सरकारी डॉक्टर निजी तौर पर मरीज न देखे।
आईटी मैनेजर और विभागीय वेबसाइट के माध्यम से इस आदेश को सार्वजनिक किया जा रहा है। यदि कोई डॉक्टर इस आदेश का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उस पर अनुशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ उसकी सेवा समाप्ति तक का प्रावधान किया जा सकता है। सरकार ने सचिवालय मुद्रणालय को इस संकल्प को असाधारण अंक के रूप में राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित करने का भी आदेश दिया है, जिससे यह एक पूर्ण कानूनी दस्तावेज बन जाएगा।
चिकित्सक संगठनों की संभावित प्रतिक्रिया
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य के चिकित्सक संगठनों, जैसे आईएमए (IMA) और भासा (BHASA), की प्रतिक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हैं। पूर्व में ये संगठन प्राइवेट प्रैक्टिस को डॉक्टरों का मौलिक अधिकार बताते रहे हैं और एनपीए की विसंगतियों को लेकर विरोध करते रहे हैं। हालांकि, सरकार ने इस बार प्रोत्साहन राशि का विकल्प देकर डॉक्टरों को एक सम्मानजनक रास्ता दिया है।
प्रशासन का तर्क है कि यदि डॉक्टर सरकारी वेतन और सुविधाएं ले रहे हैं, तो उनका पूरा समय और ऊर्जा जनता के लिए होनी चाहिए। बिहार जैसे राज्य में जहाँ डॉक्टरों की कमी एक बड़ी समस्या है, वहां उपलब्ध मानव संसाधन का अधिकतम उपयोग सरकारी तंत्र में करना ही श्रेयस्कर है। अब देखना यह होगा कि डॉक्टर इस फैसले को किस तरह स्वीकार करते हैं और सरकार एनपीए की राशि कितनी तय करती है।
निष्कर्ष: बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र में नई सुबह
11 अप्रैल 2026 की तारीख बिहार के चिकित्सा इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगी। नीतीश सरकार का यह फैसला न केवल स्वास्थ्य प्रणाली को पेशेवर बनाएगा, बल्कि सरकारी अस्पतालों के प्रति जनता के खोए हुए विश्वास को भी बहाल करेगा। प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक और एनपीए की शुरुआत से मेधावी छात्र भी सरकारी सेवाओं की ओर आकर्षित होंगे, क्योंकि अब उन्हें एक बेहतर कार्य संस्कृति और आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।
लोकेश कुमार सिंह द्वारा जारी यह संकल्प बिहार के सुदूर अंचलों में बैठे उस अंतिम व्यक्ति के लिए उम्मीद की किरण है, जिसे अब अपनी बीमारी के इलाज के लिए अपनी जमीन या गहने गिरवी रखकर निजी डॉक्टरों के पास नहीं जाना पड़ेगा। The Voice of Bihar की टीम सरकार के इस साहसी और जनहितैषी निर्णय का स्वागत करती है। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि बिहार के आम आदमी के स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा का एक महामंच है। आने वाले दिनों में जब विस्तृत दिशा-निर्देश जारी होंगे, तब इस नीति का प्रभाव और भी स्पष्ट होकर सामने आएगा।


