बिहार में मछली पालन से खुलेगा रोजगार का नया रास्ता, उत्पादन बढ़ाकर पलायन रोकने की तैयारी में सरकार

बिहार में मछली पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नई ताकत बनाने की दिशा में राज्य सरकार तेजी से काम कर रही है। सरकार का मानना है कि मत्स्य पालन केवल एक पारंपरिक व्यवसाय नहीं, बल्कि रोजगार, आय वृद्धि और ग्रामीण विकास का मजबूत माध्यम बन सकता है। इसी उद्देश्य से पटना के मीठापुर स्थित नवनिर्मित मत्स्य विकास भवन में एक महत्वपूर्ण कॉन्क्लेव का आयोजन किया गया, जिसमें राज्यभर से आए मत्स्य पालकों, किसानों, विशेषज्ञों और अधिकारियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के मंत्री नंद किशोर राम ने कहा कि बिहार में मत्स्य पालन और जल कृषि के क्षेत्र में असीम संभावनाएं मौजूद हैं। यदि इन संभावनाओं का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो राज्य में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और बड़ी संख्या में युवाओं का पलायन रोका जा सकेगा। उन्होंने कहा कि विभाग की प्राथमिकता गांव-गांव तक पहुंचकर लोगों को स्वरोजगार से जोड़ना और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना है।

मंत्री ने कहा कि बिहार की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और कृषि के साथ-साथ मत्स्य पालन ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सरकार लगातार ऐसी योजनाएं लागू कर रही है जिनके माध्यम से छोटे और मध्यम स्तर के किसान भी मछली पालन को व्यवसाय के रूप में अपना सकें।

उन्होंने बताया कि राज्य में मछली उत्पादन के क्षेत्र में लगातार उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है। कुछ वर्षों पहले तक बिहार को अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए अन्य राज्यों से मछली मंगानी पड़ती थी, लेकिन अब राज्य आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में जहां राज्य का कुल मछली उत्पादन 9.69 लाख मीट्रिक टन था, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 10.28 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। यह वृद्धि राज्य में मत्स्य क्षेत्र में हो रहे विकास को दर्शाती है।

मंत्री ने कहा कि सरकार द्वारा जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। राज्य में हजारों हेक्टेयर नए जल क्षेत्रों का विकास किया गया है, जिससे मत्स्य पालन की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसके अलावा चौर भूमि में आधुनिक तालाबों का निर्माण कर किसानों को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए आधुनिक तकनीकों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार ने विभिन्न जिलों में बड़ी संख्या में ट्यूबवेल स्थापित किए हैं ताकि जल प्रबंधन बेहतर हो सके और मत्स्य उत्पादन में निरंतरता बनी रहे। इसके साथ ही मत्स्य बीज उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए राज्य में कई हैचरियों की स्थापना की गई है।

वर्तमान समय में बिहार में स्थापित कार्यशील मत्स्य बीज हैचरियां राज्य की लगभग 70 प्रतिशत आवश्यकता की पूर्ति कर रही हैं। इससे बाहर के राज्यों पर निर्भरता कम हुई है और स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज उपलब्ध हो रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य में 2,753.45 मिलियन मत्स्य बीज का उत्पादन किया गया, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ सरकार मछली आहार उत्पादन को भी बढ़ावा दे रही है। वर्तमान में राज्य में स्थापित 89 फिश फीड मिलों के माध्यम से लगभग 50 हजार टन मछली आहार का उत्पादन किया जा रहा है। इससे मत्स्य पालकों को स्थानीय स्तर पर गुणवत्तापूर्ण आहार उपलब्ध हो रहा है और उत्पादन लागत में भी कमी आ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मत्स्य पालन को वैज्ञानिक पद्धति से किया जाए तो यह किसानों के लिए अत्यधिक लाभदायक व्यवसाय साबित हो सकता है। कम भूमि और सीमित संसाधनों के बावजूद भी इस क्षेत्र में अच्छी आय अर्जित की जा सकती है। यही कारण है कि सरकार इसे ग्रामीण विकास के प्रमुख साधन के रूप में देख रही है।

मछली उत्पादन के साथ-साथ विपणन व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। सरकार ने मत्स्य बाजारों में स्वच्छता और गुणवत्ता बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। अब तक हजारों वाहनों और मत्स्य विपणन किटों का वितरण किया जा चुका है ताकि मछलियों का परिवहन और बिक्री अधिक व्यवस्थित तरीके से हो सके।

मुख्यमंत्री मत्स्य विपणन योजना के तहत राज्य के चयनित प्रखंडों और पंचायतों में आधुनिक मत्स्य बाजारों का निर्माण किया जा रहा है। इन बाजारों में स्वच्छता, कोल्ड स्टोरेज, बिक्री व्यवस्था और अन्य आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता की मछली मिलेगी और मत्स्य पालकों को बेहतर बाजार उपलब्ध होगा।

कार्यक्रम में विभाग के सचिव शीर्षत कपिल अशोक ने कहा कि अब समय आ गया है कि मछली पालन को केवल पारंपरिक गतिविधि न मानकर एक संगठित व्यवसाय के रूप में विकसित किया जाए। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में निर्यात की भी अपार संभावनाएं हैं और यदि उत्पादन बढ़ाया जाए तो बिहार देश के प्रमुख मत्स्य निर्यातक राज्यों में शामिल हो सकता है।

उन्होंने कहा कि राज्य में प्रोसेसिंग प्लांट, फिश फीड मिल, आरएएस (रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम) और बायोफ्लॉक तकनीक जैसी आधुनिक प्रणालियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से सीमित क्षेत्र में अधिक उत्पादन संभव है और किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है।

कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (एनएफडीबी) के क्षेत्रीय कार्यालय का संचालन शुरू होना भी है। हाल ही में पटना स्थित मत्स्य विकास भवन में इस कार्यालय का शुभारंभ किया गया है। अधिकारियों का मानना है कि इससे राज्य में मत्स्य क्षेत्र की योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी और तकनीकी सहायता भी आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।

मत्स्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार में जल संसाधनों की उपलब्धता, बढ़ती तकनीकी सुविधाएं और सरकारी सहयोग इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकते हैं। यदि उत्पादन और उत्पादकता में इसी प्रकार वृद्धि जारी रही तो आने वाले वर्षों में बिहार न केवल आत्मनिर्भर बनेगा बल्कि अन्य राज्यों को भी बड़ी मात्रा में मछली की आपूर्ति कर सकेगा।

कुल मिलाकर राज्य सरकार की पहल, आधुनिक तकनीकों का उपयोग, नई योजनाओं का विस्तार और मत्स्य पालकों को दी जा रही सुविधाएं बिहार के मत्स्य क्षेत्र को नई दिशा देने का काम कर रही हैं। यह क्षेत्र आने वाले समय में रोजगार, स्वरोजगार और ग्रामीण विकास का प्रमुख आधार बन सकता है तथा पलायन रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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