बिजेंद्र यादव: बिहार के रिकॉर्डधारी मंत्री बने डिप्टी सीएम

पटना। बिहार की सत्ता के समंदर में लहरें आती रहीं, जाती रहीं, गठबंधन बनते रहे और टूटते रहे, लेकिन एक चेहरा ऐसा है जो पिछले दो दशकों से ‘स्थिर टापू’ की तरह अडिग खड़ा है। 15 अप्रैल 2026, बुधवार की यह सुबह बिहार की राजनैतिक नियति में एक ऐसा मोड़ लेकर आई है, जहाँ भाजपा के पहले मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी का राजतिलक हो रहा है। लेकिन इस ऐतिहासिक बदलाव के बीच जो सबसे अनुभवी और भरोसेमंद नाम उपमुख्यमंत्री के रूप में उभरकर सामने आया है, वह है बिजेंद्र प्रसाद यादव। पटना के लोकभवन में आज जब शपथ ग्रहण समारोह की शुरुआत हुई, तो बिजेंद्र यादव ने एक बार फिर पद और गोपनीयता की शपथ लेकर अपने ही उस रिकॉर्ड को और मजबूत कर दिया, जिसे तोड़ना किसी भी समकालीन नेता के लिए मुमकिन नजर नहीं आता। जदयू के इस कद्दावर नेता ने 2005 से लेकर आज तक हर उस सरकार में अपनी जगह सुरक्षित रखी, जिसने बिहार की सत्ता संभाली। आज वे न केवल एक मंत्री हैं, बल्कि उस अनुभव के ‘लंगर’ हैं जिसकी जरूरत सम्राट चौधरी की नई और आक्रामक सरकार को सबसे ज्यादा पड़ने वाली है।

सत्ता के ‘स्थायी पता’: 2005 से 2026 तक का अटूट सफर

​बिहार की राजनीति में बिजेंद्र प्रसाद यादव का नाम एक ऐसे रिकॉर्ड के साथ जुड़ा है जो उन्हें ‘अजेय’ बनाता है। नवंबर 2005 में जब नीतीश कुमार ने पहली बार सत्ता संभाली थी, तब से लेकर आज तक बिहार ने कई राजनैतिक प्रयोग देखे। एनडीए-1 से लेकर महागठबंधन और फिर एनडीए-2 तक, बिहार की मंत्रिपरिषद का स्वरूप दर्जनों बार बदला, लेकिन बिजेंद्र यादव का ‘पद’ कभी नहीं बदला।

​वे बिहार में सबसे लंबी अवधि तक लगातार मंत्री बने रहने वाले इकलौते नेता हैं। उनकी राजनैतिक चतुराई और प्रशासनिक पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे लालू प्रसाद के दौर में भी मंत्री रहे और अब भाजपा के नेतृत्व वाली इस नई सरकार में उपमुख्यमंत्री जैसी बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंत्री बनने वालों में वे फिलहाल सबसे अधिक उम्र के और सबसे अधिक अनुभवी नेता हैं। उनकी यह निरंतरता यह साबित करती है कि शासन चलाने के लिए केवल नारों की नहीं, बल्कि उस ‘प्रशासनिक संजीदगी’ की जरूरत होती है जो बिजेंद्र यादव के व्यक्तित्व का हिस्सा है।

ऊर्जा क्षेत्र के ‘चाणक्य’: अंधियारे से उजालों तक का नायक

​बिहार के गाँवों में आज यदि बिजली की चकाचौंध है, तो उसके पीछे बिजेंद्र प्रसाद यादव की वह खामोश मेहनत है जिसे उन्होंने ‘ऊर्जा मंत्री’ के रूप में अंजाम दिया। एक समय था जब बिहार में बिजली केवल बड़े शहरों के कुछ खास मोहल्लों तक ही सीमित थी। गाँवों के लिए लालटेन ही भाग्य की रेखा थी। लेकिन जब बिजेंद्र यादव ने ऊर्जा विभाग की कमान संभाली, तो उन्होंने ‘हर घर बिजली’ के संकल्प को किसी चुनावी वादे की तरह नहीं, बल्कि एक ‘मिशन’ की तरह लिया।

​उनके नेतृत्व में बिहार ने बिजली के उत्पादन, संचरण और वितरण में वह आत्मनिर्भरता हासिल की जिसकी मिसाल आज पूरे देश में दी जाती है। ‘दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना’ और राज्य के अपने ‘सात निश्चयों’ के तहत उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि बिहार का कोई भी टोला अंधेरे में न रहे। उनके कार्यकाल में ही बिहार में स्मार्ट मीटरिंग और ग्रिड सुदृढ़ीकरण जैसे आधुनिक प्रयोग सफल हुए। ऊर्जा के अलावा वे योजना एवं विकास, वित्त, वाणिज्यकर और मद्यनिषेध जैसे महत्वपूर्ण विभागों को भी सक्षमता से संभालते रहे हैं। उनकी कार्यशैली में फाइलों की पेचीदगियों को समझने और उन्हें हल करने का एक अलग ही ‘डिजिटल’ अंदाज़ है, जो उन्हें अन्य नेताओं से अलग खड़ा करता है।

सुपौल की माटी और नौवीं बार विधायक की साख

​किसी भी राजनेता की असली ताकत उसकी अपनी जमीन होती है, और बिजेंद्र प्रसाद यादव के लिए वह जमीन है सुपौल। सुपौल जिले के मुरली गांव के रहने वाले बिजेंद्र यादव ने अपने राजनैतिक सफर की शुरुआत अपने पिता स्व. सुखराम यादव की विरासत से की, जो स्वयं एक प्रतिष्ठित मुखिया थे। लेकिन बिजेंद्र ने अपने काम के दम पर सुपौल को अपना अभेद्य दुर्ग बना लिया।

​वे सुपौल विधानसभा क्षेत्र से लगातार नौवीं बार विधायक निर्वाचित हुए हैं। आज के दौर में जहाँ ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) बड़े-बड़े दिग्गजों को ले डूबती है, वहां नौ बार जीतना यह बताता है कि जनता के बीच उनकी पैठ कितनी गहरी है। वे एक ऐसे नेता हैं जो सत्ता के शीर्ष पर होने के बावजूद अपनी जड़ों से कभी नहीं कटे। सुपौल की जनता के लिए वे आज भी वही सरल और सुलभ नेता हैं, जो विकास की फाइलों और जनसमस्याओं के बीच संतुलन बनाना जानते हैं। उनकी राजनीति में कोई तामझाम या दिखावा नहीं होता, केवल काम बोलता है।

तीन चेहरों की ‘पावर टीम’: लोकभवन में नई शुरुआत

​आज लोकभवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह की सबसे बड़ी चर्चा इसके सीमित स्वरूप को लेकर रही। सम्राट चौधरी के साथ केवल दो उपमुख्यमंत्रियों—बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी—ने शपथ ली। यह ‘तीन की टीम’ दरअसल बिहार के भविष्य का वह रणनीतिक खाका है जिसे भाजपा और जदयू ने मिलकर तैयार किया है। सम्राट चौधरी जहाँ भाजपा की नई ऊर्जा और आक्रामकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं बिजेंद्र यादव अनुभव की वह दीवार हैं जो सरकार को प्रशासनिक मजबूती देगी।

​इस नए राजनैतिक ढांचे में फिलहाल 33 मंत्री पद रिक्त रखे गए हैं। इसके पीछे की मुख्य वजह 4 मई को आने वाले अन्य राज्यों के चुनाव परिणाम हैं। तब तक सम्राट चौधरी की सरकार केवल इन तीन स्तंभों के सहारे चलेगी। बिजेंद्र यादव का उपमुख्यमंत्री बनना यह भी संकेत देता है कि नई सरकार में जदयू का कद और उसकी विकासवादी नीतियां हाशिए पर नहीं जाएंगी। भाजपा ने सम्राट को चेहरा तो बना दिया है, लेकिन शासन की चाबी अभी भी उन अनुभवी हाथों में रखी है जिन्होंने पिछले 20 सालों में बिहार के विकास की पटकथा लिखी है।

लालू से लेकर सम्राट तक: बदलते दौर के गवाह

​बिजेंद्र प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के उन चंद जीवित दस्तावेजों में से हैं जिन्होंने राज्य की सत्ता के हर बड़े बदलाव को करीब से देखा और उसमें अपनी भूमिका निभाई। लालू प्रसाद यादव के मंत्रिमंडल में भी वे एक प्रभावशाली मंत्री थे। उस दौर की समाजवादी राजनीति से लेकर आज की भाजपा-प्रधान ‘एनडीए 2.0’ तक का उनका सफर यह दर्शाता है कि वे राजनैतिक धाराओं के साथ बहने वाले नहीं, बल्कि अपनी धारा खुद बनाने वाले नेता हैं।

​कल शाम जब विधानसभा के सेंट्रल हॉल में सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, तो बिजेंद्र यादव वहीं खामोश खड़े इस परिवर्तन को अपनी अनुभवी आंखों से देख रहे थे। वे जानते हैं कि अब चुनौतियां अलग हैं। अब भाजपा ‘बड़े भाई’ की भूमिका में है और उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री (सम्राट चौधरी) के साथ काम करना है जो उम्र में उनसे काफी छोटे हैं और स्वभाव में काफी आक्रामक। लेकिन बिजेंद्र यादव का धैर्य और उनकी कार्यक्षमता ही वह सूत्र है जो इस नए गठबंधन को स्थिरता प्रदान करेगा।

नया सफर और पुरानी साख: चुनौतियों का पहाड़

​आज शपथ लेने के बाद बिजेंद्र प्रसाद यादव के सामने चुनौतियों का एक नया पहाड़ खड़ा है। उन्हें न केवल अपने पुराने विभागों के अधूरे कामों को पूरा करना है, बल्कि उपमुख्यमंत्री के रूप में पूरे राज्य के शासन-प्रशासन में संतुलन भी बनाए रखना है। सम्राट चौधरी की सरकार से जनता को जो ‘बदलाव’ की उम्मीद है, उसे बिजेंद्र यादव के ‘अनुभव’ के साथ जोड़कर ही धरातल पर उतारा जा सकता है।

​रोजगार, पलायन और बिहार की आर्थिक स्थिति को सुधारना नई सरकार की पहली प्राथमिकता होगी। 4 मई के कैबिनेट विस्तार से पहले का यह समय बिजेंद्र यादव के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा, जहाँ वे सम्राट चौधरी के साथ मिलकर सरकार का रोडमैप तैयार करेंगे। सतुआन के इस पावन पर्व पर, जब बिहार नए अनाज और नई उम्मीदों का स्वागत कर रहा है, बिजेंद्र प्रसाद यादव का उपमुख्यमंत्री बनना राज्य के लिए एक ‘अनुभवी सुरक्षा कवच’ की तरह है। लोकभवन की ये सीढ़ियां आज उस नेता का सम्मान कर रही हैं जिसने मंत्री पद को रिकॉर्ड नहीं, बल्कि एक ‘सेवा का स्थायी पता’ बना दिया है।

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