​बिहार में ‘दीदी की रसोई’ का विस्तार: अब पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के छात्रों को मिलेगा सस्ता खाना

पटना। बिहार में महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उद्यमिता का सबसे सफल मॉडल बनकर उभरी ‘दीदी की रसोई’ अब राज्य के शैक्षणिक परिसरों में भी अपनी पहचान बना रही है। शनिवार, 11 अप्रैल 2026 को पटना स्थित पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में ‘अन्नपूर्णा जीविका दीदी की रसोई’ का भव्य उद्घाटन किया गया। यह पहल केवल एक कैंटीन की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का प्रतीक है जो बिहार सरकार ने राज्य की करोड़ों महिलाओं पर जताया है। अब तक अस्पतालों और सरकारी दफ्तरों तक सीमित रही यह रसोई अब छात्रों और विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को घर जैसा शुद्ध और सस्ता भोजन उपलब्ध कराएगी। इस अवसर पर ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने स्पष्ट किया कि आने वाले समय में ‘दीदी की रसोई’ की बढ़ती मांग को देखते हुए इसका विस्तार पूरे राज्य के हर महत्वपूर्ण संस्थान में किया जाएगा।

पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय में नई शुरुआत: 500 लोगों को मिलेगा लाभ

​पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय परिसर में अन्नपूर्णा जीविका दीदी की रसोई का उद्घाटन होने से विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है। अब तक यहाँ के छात्र-छात्राओं और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को गुणवत्तापूर्ण भोजन के लिए बाहरी होटलों या ढाबों पर निर्भर रहना पड़ता था, जहाँ स्वच्छता और दर को लेकर अक्सर चिंताएं बनी रहती थीं।

​मंत्री श्रवण कुमार ने उद्घाटन भाषण के दौरान कहा कि इस रसोई के संचालन से करीब 500 से अधिक छात्र-छात्राओं और स्टाफ को सीधे तौर पर लाभ मिलेगा। उन्हें बहुत ही कम और किफायती दरों पर नाश्ता और भोजन मिल सकेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस रसोई का प्रबंधन और संचालन पूरी तरह से प्रशिक्षित जीविका दीदियों के हाथ में होगा, जिससे भोजन की शुद्धता और पोषण की गारंटी मिलेगी। यह मॉडल शिक्षा के साथ-साथ सेवा और आत्मनिर्भरता का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।

आर्थिक सहायता का दूसरा चरण: इसी महीने खाते में आएंगे 20-20 हजार

​इस कार्यक्रम के दौरान श्रवण कुमार ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जो राज्य की लाखों महिलाओं के लिए खुशियों की सौगात लेकर आई है। उन्होंने बताया कि बिहार सरकार ने महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिए आर्थिक मदद की प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। अब तक 1 करोड़ 81 लाख महिलाओं को पहले चरण में 10-10 हजार रुपये की सहायता दी जा चुकी है।

​अब सरकार उन महिलाओं को 20-20 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता राशि देने जा रही है जिन्होंने अपना स्वरोजगार शुरू कर दिया है। यह राशि इसी महीने सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेज दी जाएगी। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले 18 लाख से अधिक परिवारों को भी 10-10 हजार रुपये की आर्थिक मदद देने की तैयारी पूरी कर ली गई है। सरकार का लक्ष्य है कि कोई भी महिला केवल पैसे के अभाव में अपना हुनर प्रदर्शित करने से पीछे न रहे।

जीविका का विशाल नेटवर्क: 11 लाख से अधिक समूह और करोड़ों परिवार

​बिहार में जीविका (Jeevika) आज केवल एक सरकारी परियोजना नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है। श्रवण कुमार ने इस नेटवर्क की सफलता के आंकड़े साझा करते हुए बताया कि जब से बिहार सरकार ने जीविका समूहों के गठन की शुरुआत की है, तब से अब तक 11 लाख 67 हजार से अधिक समूह बन चुके हैं। इन समूहों के माध्यम से एक करोड़ 50 लाख से अधिक परिवारों को जोड़ा गया है।

​यह नेटवर्क राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहा है। ‘दीदी की रसोई’ इसी नेटवर्क का एक व्यावसायिक चेहरा है, जहाँ वर्तमान में 6 हजार से अधिक जीविका दीदियां सक्रिय रूप से काम कर रही हैं। इन दीदियों को प्रोफेशनल कुकिंग, हाइजीन और कस्टमर डीलिंग का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि वे बाजार की प्रतिस्पर्धा में भी खड़ी रह सकें।

अस्पतालों से लेकर छात्रावासों तक ‘दीदी की रसोई’ का दबदबा

​’दीदी की रसोई’ की सफलता का सफर जिला अस्पतालों से शुरू हुआ था, जहाँ मरीजों और उनके परिजनों को अक्सर खराब गुणवत्ता वाले खाने की शिकायत रहती थी। जीविका दीदियों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और आज स्थिति यह है कि राज्य के लगभग सभी जिला और अनुमंडल अस्पतालों में इन्हीं रसोइयों का संचालन हो रहा है।

​मंत्री ने बताया कि अस्पतालों के अलावा अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रावासों, मेडिकल कॉलेजों और पॉलिटेक्निक कॉलेजों में भी इसे सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। सरकार के पास विभिन्न अन्य विभागों से भी ‘दीदी की रसोई’ खोलने के प्रस्ताव आ रहे हैं। कई जिलों में व्यक्तिगत दौरों के दौरान यह पाया गया कि निजी ठेकेदारों की तुलना में जीविका समूह बेहतर प्रबंधन और सेवा प्रदान कर रहे हैं।

कुलपति का नजरिया: शिक्षा और सेवा का उत्कृष्ट समन्वय

​कार्यक्रम में उपस्थित पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. उपेन्द्र प्रसाद सिंह ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे विश्वविद्यालय के लिए एक उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि परिसर में ऐसी सुविधा होने से छात्रों का समय बचेगा और उन्हें सेहतमंद खाना मिलेगा। कुलपति के अनुसार, जब छात्र अपने सामने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनते और व्यवसाय का प्रबंधन करते देखेंगे, तो उनमें भी स्वरोजगार और सामाजिक सहभागिता की प्रेरणा जगेगी।

​उन्होंने ‘दीदी की रसोई’ को शिक्षा और सेवा के समन्वय का एक उत्कृष्ट मॉडल करार दिया। कुलपति ने आश्वस्त किया कि विश्वविद्यालय प्रशासन रसोई के सुचारू संचालन के लिए हर संभव सहयोग प्रदान करेगा। कुलसचिव प्रो. अबु बकर ने मंत्री का स्वागत करते हुए विश्वविद्यालय की अन्य विकास योजनाओं के बारे में भी जानकारी साझा की।

निरीक्षण और सम्मान: व्यवस्थाओं की सराहना

​उद्घाटन के बाद श्रवण कुमार ने स्वयं कैंटीन का बारीकी से निरीक्षण किया। उन्होंने वहां मौजूद बर्तनों की सफाई, कच्ची सामग्रियों के भंडारण और खाना पकाने की प्रक्रिया को देखा। मंत्री ने दीदियों द्वारा तैयार किए गए व्यंजनों की गुणवत्ता की सराहना की और उन्हें भविष्य के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि साफ़-सफाई ही इस रसोई की सबसे बड़ी पूंजी है, इसे कभी कम न होने दें।

​इसके बाद कुलपति कक्ष में एक संक्षिप्त सम्मान समारोह आयोजित किया गया, जहाँ विश्वविद्यालय के वरीय अधिकारियों ने मंत्री को सम्मानित किया। इस दौरान डी एस डब्ल्यू प्रो. राजीव रंजन, कुलानुशासक प्रो. कीर्ति, सीसीडीसी प्रो. शिव कुमार यादव और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। मीडिया प्रभारी प्रो. तारिक फातमी ने इस आयोजन को विश्वविद्यालय के इतिहास में एक नया अध्याय बताया।

निष्कर्ष: सुशासन और महिला शक्ति का संगम

​’दीदी की रसोई’ का पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय तक पहुँचना यह साबित करता है कि बिहार में महिलाओं ने अब अपनी सीमाओं को लांघ लिया है। वे अब केवल घरों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े संस्थानों का प्रबंधन संभाल रही हैं। 20 हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता राशि मिलने से उन दीदियों के सपनों को और पंख लगेंगे जो अपने व्यवसाय को विस्तार देना चाहती हैं।

​यह पहल केवल पेट भरने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधी आबादी के स्वाभिमान को सींचने का प्रयास है। बिहार सरकार की यह योजना अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर है कि कैसे छोटे-छोटे प्रयासों से एक बड़ा सामाजिक और आर्थिक बदलाव लाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में जब बिहार के हर ब्लॉक और हर कॉलेज में ‘दीदी की रसोई’ की खुशबू महकेगी, तब सुशासन का यह सपना पूरी तरह साकार होगा।

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