चक्रवाती तबाही से बुरी तरह प्रभावित हुआ बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर, दुर्लभ आम-लीची संग्रह और अनुसंधान ढांचे को भारी नुकसान

भागलपुर। हाल ही में आए भीषण चक्रवाती तूफान ने बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर को गहरे संकट में डाल दिया है। तेज हवाओं, मूसलाधार बारिश और तूफानी मौसम के कारण विश्वविद्यालय परिसर में स्थित कई महत्वपूर्ण संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो गई हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने न केवल भवनों और कृषि इकाइयों को प्रभावित किया है, बल्कि वर्षों से संरक्षित दुर्लभ पौध प्रजातियों, अनुसंधान परियोजनाओं और कृषि विकास से जुड़ी व्यवस्थाओं को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन ने राज्य सरकार और राजभवन को विस्तृत रिपोर्ट भेजी थी। इसके बाद मामले को प्राथमिकता देते हुए बिहार सरकार के कृषि विभाग ने तत्काल कार्रवाई की और वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम को सबौर स्थित विश्वविद्यालय का निरीक्षण करने भेजा।

निरीक्षण दल में कृषि विभाग के संयुक्त सचिव मदन कुमार, अनुभाग पदाधिकारी अमित सिन्हा, जिला कृषि पदाधिकारी प्रेम शंकर प्रसाद, प्रखंड उद्यान पदाधिकारी विशाल कुमार सहित अन्य संबंधित अधिकारी शामिल थे। टीम ने विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर नुकसान का प्रत्यक्ष आकलन किया।

निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने कृषि अनुसंधान फार्म, उद्यान निदेशालय, फल बागानों, संरक्षित खेती परियोजनाओं, पॉलीहाउस, टिश्यू कल्चर लैब, बीज उत्पादन केंद्र, शैक्षणिक भवनों, छात्रावासों तथा आवासीय परिसरों की स्थिति का जायजा लिया। कई स्थानों पर पेड़ धराशायी मिले, जबकि कुछ संरचनाएं आंशिक या पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त दिखाई दीं।

सबसे अधिक चिंता का विषय विश्वविद्यालय के आम और लीची अनुसंधान केंद्रों को हुआ नुकसान माना जा रहा है। यहां वर्षों से दुर्लभ और उन्नत किस्मों के फलदार पौधों का संरक्षण किया जा रहा था। तूफान की तीव्रता इतनी अधिक थी कि अनेक पेड़ जड़ से उखड़ गए, जबकि कई वृक्षों की प्रमुख शाखाएं टूटकर नष्ट हो गईं। इससे विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक अनुसंधान कार्यक्रमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार इन पौधों का महत्व केवल शैक्षणिक शोध तक सीमित नहीं था। इनके माध्यम से किसानों को उच्च गुणवत्ता वाली पौध सामग्री उपलब्ध कराई जाती थी, जिससे राज्य में फल उत्पादन को बढ़ावा मिलता था। अब इन संसाधनों को दोबारा विकसित करने में वर्षों का समय लग सकता है।

विश्वविद्यालय के कुलपति ने निरीक्षण के दौरान कहा कि यह नुकसान केवल भौतिक संपत्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि विज्ञान और पौध आनुवंशिक संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी क्षति के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई ऐसी प्रजातियां प्रभावित हुई हैं जिन्हें वर्षों की मेहनत और वैज्ञानिक संरक्षण के बाद विकसित किया गया था।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने दशकों से फलों की उत्कृष्ट किस्मों के संरक्षण और संवर्धन का कार्य किया है। इन पौधों का उपयोग शोध, प्रशिक्षण और किसानों तक उन्नत तकनीक पहुंचाने के लिए किया जाता रहा है। ऐसे में इनका नुकसान विश्वविद्यालय परिवार के लिए अत्यंत दुखद है।

तूफान का असर विश्वविद्यालय की बीज उत्पादन इकाई पर भी देखने को मिला। यहां विभिन्न फसलों के प्रमाणित और गुणवत्तापूर्ण बीज तैयार तथा संग्रहित किए जाते हैं। तेज हवाओं और बारिश के कारण इकाई के कई शेड क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे भंडारण व्यवस्था प्रभावित हुई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर पुनर्स्थापन नहीं हुआ तो इसका असर किसानों को उपलब्ध कराए जाने वाले बीजों की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।

बीज उत्पादन केंद्र राज्य के कृषि विकास कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यहां तैयार बीज बिहार के विभिन्न जिलों में किसानों तक पहुंचाए जाते हैं। ऐसे में इस इकाई को हुआ नुकसान केवल विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र के लिए भी चिंता का विषय बन गया है।

इसी तरह संरक्षित खेती परियोजनाओं को भी व्यापक नुकसान पहुंचा है। पॉलीहाउस और अन्य आधुनिक कृषि संरचनाएं, जहां फल, सब्जी और फूलों की उन्नत खेती की जाती थी, अब कई स्थानों पर क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं। प्लास्टिक कवर फट गए हैं, लोहे के ढांचे टूट गए हैं और सिंचाई प्रणालियां भी प्रभावित हुई हैं। कुछ संरचनाएं पूरी तरह धराशायी हो चुकी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षित खेती आधुनिक कृषि का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। विश्वविद्यालय इन तकनीकों के माध्यम से किसानों को नई खेती पद्धतियों से जोड़ने का कार्य करता रहा है। ऐसे में इन परियोजनाओं को हुई क्षति का असर प्रशिक्षण और प्रदर्शन कार्यक्रमों पर भी पड़ सकता है।

तूफान से विश्वविद्यालय के शैक्षणिक ढांचे को भी नुकसान पहुंचा है। कई भवनों की छतों और खिड़कियों को क्षति पहुंची है। छात्रावासों और आवासीय परिसरों में भी टूट-फूट की घटनाएं सामने आई हैं। परिसर में बड़ी संख्या में पेड़ गिरने से आवागमन प्रभावित हुआ और कई स्थानों पर बिजली आपूर्ति भी बाधित हो गई।

हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन, वैज्ञानिकों, कर्मचारियों और छात्रों की संयुक्त टीम लगातार राहत और सफाई कार्य में जुटी हुई है। परिसर को सामान्य स्थिति में लाने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। प्राथमिकता शैक्षणिक और अनुसंधान गतिविधियों को जल्द से जल्द पुनः शुरू करने की है।

कुलपति ने बताया कि विश्वविद्यालय समुदाय एकजुट होकर इस चुनौती का सामना कर रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों और सरकारी सहयोग से संस्थान जल्द ही सामान्य स्थिति में लौट आएगा।

निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से विस्तृत क्षति रिपोर्ट प्राप्त की और विभिन्न प्रभावित क्षेत्रों का भौतिक सत्यापन भी किया। अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि नुकसान का विस्तृत मूल्यांकन कर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी जाएगी, ताकि पुनर्निर्माण और सहायता से संबंधित आवश्यक निर्णय शीघ्र लिए जा सकें।

विश्वविद्यालय प्रशासन को उम्मीद है कि सरकार की ओर से वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। विशेष रूप से दुर्लभ आम और लीची प्रजातियों के संरक्षण, क्षतिग्रस्त संरचनाओं के पुनर्निर्माण तथा अनुसंधान गतिविधियों को दोबारा गति देने के लिए विशेष योजनाएं तैयार की जा सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव के कारण इस प्रकार की चरम मौसमीय घटनाएं भविष्य में और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल शिक्षा और अनुसंधान तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि उन्हें जलवायु-स्मार्ट कृषि मॉडल विकसित करने और किसानों को नई परिस्थितियों के अनुरूप समाधान उपलब्ध कराने की भी जिम्मेदारी निभानी होगी।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने कहा कि इस आपदा से मिले अनुभवों के आधार पर भविष्य में आपदा प्रबंधन और संरचनात्मक सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में कार्य किया जाएगा। साथ ही प्रभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर दीर्घकालिक पुनर्वास योजना भी तैयार की जा रही है।

अंत में विश्वविद्यालय परिवार ने राज्यपाल-सह-कुलाधिपति, राजभवन और बिहार सरकार के कृषि विभाग के प्रति आभार व्यक्त किया। प्रशासन का कहना है कि त्वरित कार्रवाई और संवेदनशील पहल से विश्वविद्यालय को पुनर्निर्माण की दिशा में नई उम्मीद और ऊर्जा मिली है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्षतिग्रस्त अनुसंधान संसाधनों और कृषि संरचनाओं को कितनी तेजी से पुनर्स्थापित किया जा सकेगा, ताकि बिहार के कृषि विकास में विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका पहले की तरह जारी रह सके।

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