
भागलपुर। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर ने पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की पहल करते हुए “अपशिष्ट से समृद्धि, मिशन आम गुठली” अभियान का शुभारंभ किया। विश्वविद्यालय के नेचर क्लब एवं उद्यान (फसलोत्तर प्रबंधन) विभाग की ओर से आयोजित कार्यशाला के दौरान आम की गुठली को बेकार समझकर फेंकने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन के रूप में अपनाने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. (डॉ.) डी. आर. सिंह ने हरित ध्वज दिखाकर की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आम की गुठली केवल एक अपशिष्ट नहीं, बल्कि भविष्य की जैव-आधारित अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण संसाधन बन सकती है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि देश में हर वर्ष बड़ी मात्रा में आम का उत्पादन होता है, लेकिन उसके बाद निकलने वाली गुठलियां अधिकतर कचरे के रूप में फेंक दी जाती हैं। यदि इन्हें वैज्ञानिक तरीके से एकत्रित कर उनका प्रसंस्करण किया जाए, तो उनसे कई प्रकार के उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि बदलते समय में अपशिष्ट को संसाधन में बदलना ही सतत विकास और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा बन चुकी है।
उन्होंने कहा कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय का यह अभियान केवल शोध या प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य आम लोगों को भी इस पहल से जोड़ना है। इससे स्वच्छता को बढ़ावा मिलेगा, पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार तथा स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे। उन्होंने इसे “वेस्ट टू वेल्थ” यानी अपशिष्ट से संपदा बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
कुलपति ने विश्वविद्यालय परिवार, छात्रों, कर्मचारियों तथा भागलपुर जिले के सभी नागरिकों से अपील की कि आम खाने के बाद उसकी गुठलियों को कूड़ेदान में फेंकने के बजाय उन्हें अच्छी तरह साफ करें, छाया में सुखाएं और अपने निकटतम संग्रह केंद्र पर जमा करें। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय का नेचर क्लब निर्धारित समय पर इन संग्रह केंद्रों से गुठलियों का संग्रह करेगा और फिर उनका वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण किया जाएगा।
उन्होंने जानकारी दी कि एकत्रित गुठलियों से खाद्य उत्पाद, न्यूट्रास्यूटिकल उत्पाद, कॉस्मेटिक सामग्री, जैव-आधारित औद्योगिक उत्पाद तथा अन्य मूल्यवर्धित वस्तुएं विकसित की जा सकती हैं। इससे न केवल अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि किसानों, उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों के लिए आय के नए स्रोत भी तैयार होंगे।
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने आम की गुठली के वैज्ञानिक महत्व पर विस्तार से जानकारी दी। बताया गया कि गुठली में मौजूद विभिन्न प्राकृतिक तत्वों का उपयोग खाद्य प्रसंस्करण, औषधीय उत्पादों, पोषण आधारित उद्योगों तथा सौंदर्य प्रसाधन निर्माण में किया जा सकता है। यदि बड़े स्तर पर इसका संग्रह और प्रसंस्करण किया जाए तो यह ग्रामीण उद्योगों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कच्चा माल बन सकता है।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन, निदेशक, बिहार कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य, नेचर क्लब के सदस्य, उद्यान (फसलोत्तर प्रबंधन) विभाग के वैज्ञानिक, फल प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, शोधकर्ता, शिक्षक और बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भाग लिया। सभी ने इस अभियान को पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
कार्यशाला के दौरान वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों को आम की गुठलियों के संग्रह, संरक्षण, सुखाने और वैज्ञानिक प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यदि गुठलियों को सही तरीके से संरक्षित किया जाए तो उनकी गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है और उनका बेहतर उपयोग संभव हो जाता है।
विशेषज्ञों ने “वेस्ट टू वेल्थ” की अवधारणा को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए बताया कि आज दुनिया के कई देशों में कृषि अपशिष्ट से जैव ईंधन, खाद्य सामग्री, जैविक उर्वरक, औद्योगिक उत्पाद और अन्य मूल्यवान वस्तुएं तैयार की जा रही हैं। इसी दिशा में बिहार कृषि विश्वविद्यालय भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कृषि अपशिष्ट का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह अभियान केवल परिसर तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में इसे सबौर नगर, भागलपुर शहर तथा जिले के विभिन्न ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों तक विस्तारित किया जाएगा। इसके लिए जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे, संग्रह केंद्र स्थापित किए जाएंगे और अधिक से अधिक लोगों को इस पहल से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
अधिकारियों का कहना है कि यदि आम नागरिक इस अभियान में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं तो बड़ी मात्रा में आम की गुठलियों का संग्रह संभव होगा। इससे एक ओर कचरे की मात्रा कम होगी, वहीं दूसरी ओर इनसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार कर स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता को भी बढ़ावा मिलेगा। विशेष रूप से स्वयं सहायता समूहों, महिला समूहों और ग्रामीण युवाओं के लिए यह पहल नए अवसर लेकर आ सकती है।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी यह अभियान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आम की गुठलियों को खुले में फेंकने से जहां कचरे की मात्रा बढ़ती है, वहीं उनके वैज्ञानिक उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर संरक्षण संभव होगा। इससे स्वच्छता अभियान को भी मजबूती मिलेगी और जैविक अपशिष्ट के प्रभावी प्रबंधन का एक नया मॉडल विकसित किया जा सकेगा।
कार्यशाला का संचालन उद्यान (फसलोत्तर प्रबंधन) विभाग के अध्यक्ष डॉ. एम. ए. आफताब और नेचर क्लब के सदस्यों ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों के सवालों के जवाब भी दिए तथा अभियान को सफल बनाने के लिए सामूहिक भागीदारी पर जोर दिया।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय की यह पहल कृषि अपशिष्ट के वैज्ञानिक उपयोग, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विश्वविद्यालय को उम्मीद है कि आने वाले समय में “मिशन आम गुठली” जनआंदोलन का रूप लेगा और बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़कर अपशिष्ट को आय, रोजगार और सतत विकास का प्रभावी माध्यम बनाने में अपनी भागीदारी निभाएंगे।


