
बिहार के भागलपुर जिले में स्थित बरारी घाट पर शुक्रवार की दोपहर एक ऐसी खौफनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने गंगा की लहरों पर सफर कर रहे हजारों यात्रियों के बीच दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार चैनलों पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने प्रशासन के उन तमाम दावों की पोल खोल दी है, जिनमें जल परिवहन को पूरी तरह सुरक्षित बताया जा रहा था। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि कैसे भागलपुर और नवगछिया को जोड़ने वाले समानांतर पुल के निर्माण कार्य में लगा एक विशालकाय जहाज और यात्रियों को लाने-ले जाने वाली एक बड़ी नाव के बीच जोरदार भिड़ंत हो गई। यह टक्कर इतनी भीषण थी कि नाव का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त होने से बाल-बाल बचा। संयोगवश उस वक्त नाव पर यात्री सवार नहीं थे, अन्यथा भागलपुर के इतिहास में जल-त्रासदी का एक ऐसा अध्याय जुड़ सकता था जिसकी कल्पना करना भी रूह कंपा देने वाला है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि विक्रमशिला सेतु के क्षतिग्रस्त होने के बाद वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर जो ‘फेरी सेवा’ चल रही है, वह किसी भी वक्त बड़े हादसे का कारण बन सकती है।
दोपहर का वो खौफनाक मंजर: कैसे हुई भिड़ंत?
शुक्रवार दोपहर करीब तीन बजे का समय था। गंगा के उफनते पानी में नावों और जहाजों की आवाजाही सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक थी। बरारी पुल घाट के पास समानांतर सेतु के निर्माण में लगा एक बड़ा जहाज ‘बैक’ (पीछे) होकर किनारे की ओर बढ़ रहा था। जहाज के चालक का ध्यान अपनी दिशा पर था, लेकिन उसी समय श्मशान घाट की ओर से एक बड़ी नाव काफी रफ्तार के साथ मुख्य धारा की ओर आ रही थी।
वायरल वीडियो में जो दृश्य कैद हुए हैं, वे प्रशासन की घोर लापरवाही को उजागर करते हैं। जहाज धीरे-धीरे पीछे की ओर आ रहा था, जबकि नाव चालक ने सामने से आ रहे उस विशालकाय लोहे के ढांचे को देखकर भी अपनी दिशा बदलने की कोशिश नहीं की। जहाज का भारी-भरकम ‘रैंप’ (वह हिस्सा जो किनारे पर गाड़ियां उतारने के काम आता है) नाव के पिछले हिस्से से जा टकराया। टक्कर की आवाज इतनी तेज थी कि घाट किनारे खड़े पुलिसकर्मियों और आम यात्रियों के बीच अफरातफरी मच गई। टक्कर लगते ही नाव बुरी तरह डगमगाई, लेकिन अपनी गति के कारण वह जहाज के रैंप को रगड़ती हुई आगे निकल गई। अगर यह टक्कर नाव के बीच वाले हिस्से में होती, तो नाव का संतुलन बिगड़ना और उसका डूबना लगभग तय था।
यात्री नहीं थे सवार, टल गया बड़ा हादसा
इस पूरी घटना का सबसे राहत देने वाला पहलू यह रहा कि जिस वक्त यह टक्कर हुई, उस नाव पर यात्री सवार नहीं थे। चश्मदीदों के अनुसार, नाव यात्रियों को छोड़कर वापस लौट रही थी या दूसरे किनारे से सवारी लेने जा रही थी। अगर उस नाव पर 50 से 60 लोग सवार होते, जैसा कि इन दिनों बरारी घाट पर आम बात है, तो धक्का लगते ही भगदड़ मच सकती थी। नाव के डगमगाने से लोग गंगा की गहरी और तेज धारा में गिर सकते थे।
भागलपुर में विक्रमशिला सेतु का स्लैब गिरने के बाद से ही गंगा की गोद में ‘मौत का खेल’ जारी है। हर दिन हजारों लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इन नावों पर सवार होते हैं। शुक्रवार की यह टक्कर एक ‘अंतिम चेतावनी’ की तरह है। वीडियो में दिख रहा है कि टक्कर के बाद भी नाव चालक काफी देर तक संभलने की कोशिश करता रहा। घाट पर खड़ी पुलिस और आपदा मित्रों की टीम केवल किनारे से चिल्लाती रह गई, क्योंकि पानी के बीच जाकर किसी को रोकने या दिशा देने के लिए उनके पास कोई आधुनिक संसाधन या पेट्रोलिंग बोट उपलब्ध नहीं थी।
विक्रमशिला सेतु की जर्जरता और लोगों की मजबूरी
यह पूरी स्थिति इसलिए पैदा हुई है क्योंकि भागलपुर की लाइफलाइन कहा जाने वाला विक्रमशिला महासेतु पिछले पांच दिनों से भारी वाहनों और अब आम लोगों के लिए भी आंशिक रूप से बंद है। पुल का एक स्लैब अपनी जगह से खिसक कर गिर जाने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा के लिहाज से वहां आवाजाही रोक दी है। भागलपुर से नवगछिया, पूर्णिया, कटिहार और सीमांचल की ओर जाने वाले लाखों लोगों के पास अब गंगा पार करने के लिए केवल नाव और जहाज ही एकमात्र विकल्प बचे हैं।
बरारी घाट पर इन दिनों रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड से भी अधिक भीड़ उमड़ रही है। लोग घंटों चिलचिलाती धूप में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं। निजी नाव चालक इस आपदा का फायदा उठाकर मनमाना किराया वसूल रहे हैं, जबकि सरकारी जहाज की संख्या बेहद कम है। इसी अफरा-तफरी के बीच नाव और जहाज के चालक भी अपना नियंत्रण खो रहे हैं, जिसका नतीजा शुक्रवार की इस टक्कर के रूप में सामने आया।
वाटर ट्रैफिक कंट्रोल का अभाव और प्रशासनिक विफलता
शुक्रवार की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गंगा के भीतर यातायात को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन के पास कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। सड़कों पर जिस तरह ट्रैफिक सिग्नल और पुलिसकर्मी होते हैं, वैसी कोई व्यवस्था गंगा के भीतर नहीं दिखी। निर्माण कार्य में लगे बड़े जहाजों और यात्रियों को ढोने वाली छोटी-बड़ी नावों के लिए अलग-अलग ‘लेन’ निर्धारित नहीं की गई है।
सदर एसडीओ विकास कुमार ने इस संबंध में बताया कि प्रशासन व्यवस्थाओं को जरूरत के अनुरूप अपडेट कर रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि गंगा में ट्रैफिक नियंत्रण के लिए एक नई व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है और दावा किया कि अगले एक-दो दिनों में इसे धरातल पर उतार दिया जाएगा। हालांकि, सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था? पिछले पांच दिनों से हजारों लोगों की जिंदगी दांव पर लगी है, लेकिन अब तक ‘वॉटर ट्रैफिक कंट्रोल’ जैसी बुनियादी व्यवस्था का न होना गंभीर प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है।
सुरक्षा के साथ खिलवाड़: न लाइफ जैकेट, न कतार
बरारी घाट की जमीनी हकीकत यह है कि वहां सुरक्षा के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। वीडियो और मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, नावों पर क्षमता से अधिक सवारी और मोटर साइकिलें लादी जा रही हैं। अधिकांश यात्रियों के पास लाइफ जैकेट नहीं होते और न ही उन्हें पहनने के लिए प्रेरित किया जाता है। घाट पर कतार (क्यू) की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे जहाज के आते ही भगदड़ मच जाती है।
विक्रमशिला सेतु के टूटने ने भागलपुर के आपदा प्रबंधन के ढांचे को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ आईआईटी पटना की टीम सेतु की जांच कर रही है और उसे ‘वल्नरेबल’ घोषित कर रही है, तो दूसरी तरफ गंगा की लहरों पर चल रहा यह अनियंत्रित परिवहन एक और त्रासदी को न्योता दे रहा है। कोलकाता से मंगाए जाने वाले मालवाहक जहाजों की प्रतीक्षा की जा रही है, लेकिन जब तक वे नहीं आते, तब तक वर्तमान व्यवस्था को सुधारना अनिवार्य है। शुक्रवार को खाली नाव होने के कारण जान-माल का नुकसान नहीं हुआ, लेकिन अगली बार किस्मत इतनी मेहरबान होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। प्रशासन को चाहिए कि वह केवल कागजी दावों के बजाय धरातल पर नावों के सुरक्षित परिचालन और जलमार्ग पर कड़ी निगरानी सुनिश्चित करे।


