मंजूषा कला को नया आयाम देने की पहल, भागलपुर संग्रहालय में शुरू हुआ पांच दिवसीय समर कैम्प; नवाचार पर रहेगा विशेष फोकस

भागलपुर। अंग प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली मंजूषा कला को नई पीढ़ी से जोड़ने और इसके आधुनिक स्वरूप को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। भागलपुर संग्रहालय, आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र और मंजूषा कला प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पांच दिवसीय “मंजूषा समर कैम्प” का मंगलवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। इस विशेष प्रशिक्षण-सह-कार्यशाला का उद्देश्य मंजूषा कला को पारंपरिक सीमाओं से आगे बढ़ाकर नए विषयों, नए माध्यमों और आधुनिक प्रयोगों से जोड़ना है।

02 जून से 06 जून तक चलने वाले इस निःशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम में कला प्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और युवा कलाकारों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिल रही है। आयोजन के पहले ही दिन 50 से अधिक प्रतिभागियों ने अपना पंजीकरण कराया और मंजूषा कला के विभिन्न आयामों को समझने के लिए कार्यशाला में हिस्सा लिया।

पारंपरिक कला को आधुनिक पहचान देने का प्रयास

कार्यशाला का उद्घाटन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, मंजूषा कला के वरिष्ठ कलाकार मनोज पंडित और शिक्षाविद राजीवकांत मिश्रा ने संयुक्त रूप से किया। कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर आयोजन का शुभारंभ किया और मंजूषा कला के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर अपने विचार साझा किए।

उद्घाटन समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि समय के साथ लोक कलाओं को भी बदलती सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने की जरूरत है। यदि पारंपरिक कला आधुनिक जीवनशैली से जुड़ती है तो उसका विस्तार और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं।

‘मंजूषा में नवाचार’ है कार्यशाला का मुख्य विषय

इस वर्ष आयोजित समर कैम्प का केंद्रीय विषय “मंजूषा में नवाचार” रखा गया है। आयोजकों का मानना है कि मंजूषा कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए केवल परंपरा को संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसमें नए प्रयोगों को भी स्थान देना होगा।

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को यह सिखाया जाएगा कि किस प्रकार मंजूषा कला को आधुनिक डिजाइन, फैशन, हस्तशिल्प, डिजिटल माध्यम और समकालीन विषयों के साथ जोड़ा जा सकता है। इसके माध्यम से कलाकारों को रचनात्मक सोच विकसित करने का अवसर मिलेगा।

चम्पा नदी और मंजूषा कला के बीच बताया गया संबंध

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने मंजूषा कला की ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अंग प्रदेश की यह लोक कला कभी इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख आधार रही है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार प्राचीन काल में चम्पा नदी व्यापार, यात्रा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम थी, उसी प्रकार मंजूषा कला भी अपने समय में गौरव के शिखर पर थी। लेकिन समय के साथ यह कला धीरे-धीरे सीमित होती चली गई।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चम्पा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासों की आवश्यकता है, उसी प्रकार मंजूषा कला को भी नए प्रयोगों और नवाचारों के माध्यम से पुनः व्यापक पहचान दिलाने की जरूरत है।

नई पीढ़ी को जोड़ना समय की मांग

शिक्षाविद राजीवकांत मिश्रा ने अपने संबोधन में कहा कि मंजूषा कला को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए इसे नई पीढ़ी के जीवन से जोड़ना बेहद आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि यदि मंजूषा कला केवल चित्रों और पारंपरिक आयोजनों तक सीमित रहेगी तो इसका दायरा सीमित हो जाएगा। इसके विपरीत यदि यह कला आधुनिक परिधानों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं, सजावटी सामग्री और फैशन उद्योग का हिस्सा बनती है तो इसकी लोकप्रियता कई गुना बढ़ सकती है।

उन्होंने सुझाव दिया कि टी-शर्ट, साड़ी, टाई, बैग, स्टेशनरी और अन्य उत्पादों में मंजूषा डिजाइन का उपयोग किया जाए ताकि यह कला युवाओं के बीच अधिक लोकप्रिय हो सके।

बिहुला-विषहरी से आगे बढ़ने की जरूरत

मंजूषा कला के वरिष्ठ कलाकार मनोज पंडित ने कहा कि मंजूषा कला की सबसे बड़ी पहचान बिहुला-विषहरी लोककथा रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि इस कला को अन्य विषयों से भी जोड़ा जाए।

उन्होंने कहा कि सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, विज्ञान और समकालीन विषयों को भी मंजूषा चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है।

उनका मानना है कि जब कलाकार नए विषयों पर काम करेंगे तो इस कला की पहुंच और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।

पहले भी हुए हैं सफल प्रयोग

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि अतीत में मंजूषा कला के माध्यम से कई नए प्रयोग किए जा चुके हैं। उदाहरण के तौर पर साइकिल योजना पर आधारित मंजूषा चित्रों ने राज्य स्तर पर काफी पहचान बनाई थी।

ऐसे प्रयोगों ने यह साबित किया कि पारंपरिक कला आधुनिक विषयों को भी प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर सकती है। इसी अनुभव को आगे बढ़ाते हुए अब राष्ट्रीय स्तर पर भी मंजूषा कला के नए उपयोगों और संभावनाओं की तलाश की जा रही है।

लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां

उद्घाटन समारोह केवल औपचारिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा। इस अवसर पर मंजूषा कला प्रशिक्षण केंद्र की छात्राओं और कलाकारों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी दीं।

लोकनृत्य और पारंपरिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से अंग प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक देखने को मिली।

प्रतिभागियों ने भी इन प्रस्तुतियों की सराहना की और कहा कि कला एवं संस्कृति का ऐसा संगम नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।

NIFT पटना के विद्यार्थियों की भागीदारी

कार्यशाला का एक विशेष आकर्षण राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT) पटना के छात्रों की भागीदारी भी रही। फैशन कम्युनिकेशन विभाग के विद्यार्थियों ने कार्यशाला के पहले दिन मंजूषा कला के इतिहास, रंग संयोजन, प्रतीकों और शैलीगत विशेषताओं को समझा।

विशेषज्ञों का मानना है कि डिजाइन और फैशन के विद्यार्थियों की भागीदारी से मंजूषा कला को नए बाजार और नए मंच मिल सकते हैं। इससे कला और उद्योग के बीच बेहतर समन्वय विकसित होगा।

पांच दिनों तक होंगे नए प्रयोग

आयोजकों के अनुसार कार्यशाला के दौरान प्रतिभागी प्रतिदिन अलग-अलग विषयों पर काम करेंगे। उन्हें मंजूषा कला की मूल तकनीकों के साथ-साथ आधुनिक प्रयोगों की भी जानकारी दी जाएगी।

पांच दिनों तक चलने वाले इस प्रशिक्षण में कलाकार नई अवधारणाओं पर आधारित रचनाएं तैयार करेंगे। उद्देश्य यह है कि पारंपरिक कला को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाए ताकि यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सके।

मंजूषा समर कैम्प को भागलपुर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कला विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे प्रयास लगातार जारी रहे तो मंजूषा कला आने वाले वर्षों में न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की प्रमुख लोक कलाओं में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर सकती है।

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