भागलपुर, 6 अगस्त 2025:पीरपैंती थाना क्षेत्र के लकड़ाकोल गांव में रहने वाले योगेश यादव की नाबालिग बेटी के अपहरण का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। लगभग एक महीने से लापता किशोरी का पता तो चल गया, लेकिन उसके पिता की दुख, आक्रोश और निराशा भरी गुहार अब प्रशासन और सरकार की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रही है।
योगेश यादव की 15 वर्षीय पुत्री 1 जुलाई को अचानक लापता हो गई थी। जब वे स्थानीय पीरपैंती थाना में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे, तो उन्हें चार से पांच घंटे तक थाने में बिठाकर रखा गया, लेकिन आवेदन नहीं लिया गया। अंततः वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से मिलकर जब शिकायत की गई, तब जाकर थाना में प्राथमिकी दर्ज हुई।
देवघर रिमांड होम से आई सूचना, पिता ने जताई गहरी आशंका
सोमवार को देवघर रिमांड होम से फोन आने के बाद पता चला कि उनकी बेटी वहीं है। सूचना मिलते ही योगेश अपनी पत्नी के साथ देवघर पहुंचे। उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि किशोरी का अपहरण गांव के ही पूर्व मुखिया राजेंद्र यादव द्वारा किया गया और दुष्कर्म की आशंका भी जताई है।
योगेश का कहना है कि पहले भी राजेंद्र यादव द्वारा उनके साथ मारपीट की गई थी, जिसकी लिखित शिकायत दी गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
“बिना मेडिकल जांच बेटी को नहीं ले जाएंगे” — पिता की पीड़ा
देवघर पहुंचने पर योगेश ने यह स्पष्ट कहा कि जब तक उनकी बेटी का मेडिकल परीक्षण नहीं कराया जाता, वे उसे साथ नहीं ले जाएंगे। मंगलवार को उन्होंने एक बार फिर एसएसपी को आवेदन देकर न्याय और कार्रवाई की गुहार लगाई है।
“न्याय न मिला तो आत्मदाह” — सीएम को चुनौती
अपनी बेटी की अस्मिता और सुरक्षा को लेकर चिंतित योगेश यादव ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला, तो वह अपने पूरे परिवार के साथ मुख्यमंत्री के समक्ष आत्मदाह करने को मजबूर होंगे।
उनकी यह चेतावनी प्रशासन के लिए एक गंभीर संदेश है कि जनता की पीड़ा को समय रहते नहीं सुना गया, तो विश्वास टूटने की कीमत बड़ी होगी।
प्रशासनिक संवेदनशीलता और तत्परता की परीक्षा
अब यह देखना होगा कि प्रशासन, पुलिस और बाल संरक्षण आयोग इस मामले में कितनी संवेदनशीलता और तत्परता दिखाते हैं। एक किशोरी का अपहरण, महीनों तक गुमशुदगी, रिमांड होम में उपस्थिति और पिता की ओर से लगाए गए दुष्कर्म के आरोप बेहद गंभीर हैं, जिनकी निष्पक्ष मेडिकल जांच, न्यायिक प्रक्रिया और मनोवैज्ञानिक सहायता आवश्यक है।
यह मामला सिर्फ एक पिता की चीख नहीं, बल्कि सिस्टम के समक्ष खड़ी एक चुनौती है — क्या न्याय मिलेगा, या फिर फिर एक और परिवार इंसाफ के इंतज़ार में टूट जाएगा?


