बीएयू के BATI हब से जनजातीय किसानों को मिली नई दिशा, वैज्ञानिक तकनीक, उन्नत बीज और पोषण वाटिका से बदल रही ग्रामीण आजीविका

भागलपुर: बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर की अभिनव पहल बिहार एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन (BATI) हब जनजातीय किसानों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। विश्वविद्यालय द्वारा संचालित इस परियोजना के तहत बांका जिले के बेलहर प्रखंड के श्रीनगर गांव और फुल्लीडुमर प्रखंड की झिझिया पंचायत में किसान गोष्ठी, वैज्ञानिक प्रशिक्षण एवं बीज वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में दोनों क्षेत्रों के लगभग 120 जनजातीय किसान परिवारों ने भाग लिया और आधुनिक कृषि तकनीकों, उन्नत बीजों तथा पोषण आधारित खेती की जानकारी प्राप्त की।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा संचालित “Establishment and Validation of Bihar Agricultural Technology and Innovation (BATI) Hub for Sustainable Livelihood and Nutritional Security of Tribal Community of Bihar” परियोजना का उद्देश्य जनजातीय समुदायों तक आधुनिक कृषि तकनीकों को पहुंचाना और उनके पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार देकर कृषि विकास की नई संभावनाएं तैयार करना है। विश्वविद्यालय का मानना है कि वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों के पारंपरिक अनुभवों का समन्वय ही सतत कृषि विकास का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है।

कार्यक्रम के दौरान परियोजना की प्रमुख अन्वेषक एवं कृषि प्रसार विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी ने किसानों को BATI हब की कार्यप्रणाली के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह पहल “Lab to Land” और “Land to Lab” की अवधारणा पर आधारित है। इसका अर्थ है कि विश्वविद्यालय में विकसित वैज्ञानिक तकनीकों को सीधे किसानों तक पहुंचाया जाए और दूसरी ओर किसानों के पारंपरिक अनुभवों तथा स्थानीय ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़कर नई तकनीकों का विकास किया जाए।

उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के पास वर्षों से कृषि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा बहुमूल्य पारंपरिक ज्ञान मौजूद है। इस ज्ञान का वैज्ञानिक परीक्षण और दस्तावेजीकरण कर इसे आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इससे ऐसी सहभागी कृषि तकनीकों का विकास संभव होगा, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप हों और किसानों की वास्तविक जरूरतों को पूरा कर सकें।

कार्यक्रम में किसानों को शारदीय मौसम की सब्जियों की वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण भी दिया गया। सब्जी विज्ञान विभाग की वैज्ञानिक डॉ. राजकुमारी आशा देवी और डॉ. अमृता कुमारी ने टमाटर, नेनुआ, भिंडी, अगेती फूलगोभी, बोड़ा, बैंगन और करेला जैसी सब्जियों की उन्नत किस्मों की खेती के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने किसानों को बीजोपचार, पौध संरक्षण, पोषण प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था तथा कीट एवं रोग नियंत्रण की आधुनिक तकनीकों से भी अवगत कराया।

प्रशिक्षण के बाद किसानों के बीच विभिन्न सब्जियों के उन्नत बीज वितरित किए गए। विश्वविद्यालय ने किसानों से इन बीजों का उपयोग अपने घरों की पोषण वाटिका में करने का आग्रह किया। विशेषज्ञों का कहना है कि पोषण वाटिका न केवल परिवारों को ताजी और पौष्टिक सब्जियां उपलब्ध कराती है, बल्कि घरेलू खर्च कम करने और अतिरिक्त आय का स्रोत बनने में भी सहायक होती है।

डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी ने बताया कि पिछले वर्ष भी BATI हब के माध्यम से जनजातीय परिवारों को पोषण वाटिका स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। इस पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। परियोजना के मूल्यांकन में पाया गया कि पहले जहां केवल 22 प्रतिशत परिवार मध्यम स्तर की आहार विविधता की श्रेणी में आते थे, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इससे स्पष्ट होता है कि पोषण वाटिका ने जनजातीय परिवारों के भोजन की गुणवत्ता और पोषण स्तर में उल्लेखनीय सुधार किया है।

कार्यक्रम के दौरान किसानों को धान की उन्नत किस्म ‘सबौर हर्षित’ का प्रमाणित बीज भी वितरित किया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि यह किस्म कम अवधि में तैयार होती है और अपेक्षाकृत कम पानी में भी अच्छी उपज देने की क्षमता रखती है। बदलते मौसम और अल-नीनो जैसी परिस्थितियों को देखते हुए इस किस्म को किसानों के लिए उपयोगी बताया गया। कृषि विज्ञान विभाग की वैज्ञानिक डॉ. गायत्री कुमारी ने किसानों को धान की उन्नत उत्पादन तकनीकों, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और बेहतर खेती के तरीकों की जानकारी दी।

BATI हब के अंतर्गत किसानों के बीच ‘सीड हब मॉडल’ भी शुरू किया गया है। इस मॉडल के तहत प्रत्येक किसान को एक किलोग्राम प्रमाणित धान बीज उपलब्ध कराया गया। फसल तैयार होने के बाद किसान दो किलोग्राम बीज परियोजना को वापस देंगे। इन बीजों को अगले चरण में अन्य किसानों के बीच वितरित किया जाएगा। विश्वविद्यालय का मानना है कि इस प्रणाली से गुणवत्तापूर्ण बीजों का विस्तार समुदाय के भीतर ही होगा और किसान एक-दूसरे से सीखते हुए आत्मनिर्भर बनेंगे।

परियोजना के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों में रोजगार और पलायन की स्थिति पर भी अध्ययन किया गया। अध्ययन में सामने आया कि बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में गुजरात, बेंगलुरु, चेन्नई और अन्य शहरों की ओर पलायन करते हैं। इसका प्रमुख कारण कृषि से होने वाली अनिश्चित आय, आधुनिक कृषि तकनीकों की कमी, कम उत्पादकता और सीमित सिंचाई सुविधाएं हैं।

बैठक के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि बाहर काम करने वाले श्रमिकों को कई बार पर्याप्त भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं और सुरक्षित वातावरण नहीं मिल पाता। उन्होंने इच्छा जताई कि यदि गांव में आधुनिक कृषि प्रशिक्षण, उन्नत बीज, तकनीकी सहायता और बेहतर बाजार उपलब्ध हो जाए तो अधिकांश लोग खेती को ही अपनी स्थायी आजीविका बनाना पसंद करेंगे।

चर्चा के दौरान किसानों ने अपने पारंपरिक ज्ञान को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि महुआ उनके जीवन और आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। महुआ के बीज से निकाला जाने वाला तेल घी के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है, जबकि महुआ से तैयार लड्डू पोषण और आयरन का अच्छा स्रोत माना जाता है। विश्वविद्यालय ने बताया कि महुआ तेल का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया है और इसके मूल्य संवर्धन, प्रसंस्करण तथा उद्यमिता की संभावनाओं पर भी कार्य किया जा रहा है। साथ ही महुआ से जुड़े पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए एक विशेष डॉक्यूमेंट्री भी तैयार की जा रही है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी ने कहा कि BATI हब केवल कृषि तकनीक पहुंचाने की परियोजना नहीं है, बल्कि यह जनजातीय समाज के लिए ज्ञान, नवाचार और आत्मनिर्भरता का एक नया माध्यम है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय किसानों को केवल तकनीक देने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उनके अनुभवों से सीखते हुए ऐसी सहभागी तकनीकों का विकास करना चाहता है, जो उनकी आजीविका, पोषण सुरक्षा और सामाजिक विकास को लंबे समय तक मजबूत बना सकें।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के वैज्ञानिकों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में जनजातीय किसानों ने सक्रिय भागीदारी की। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि BATI हब जैसी पहलें लगातार जारी रहीं तो जनजातीय क्षेत्रों में आधुनिक कृषि तकनीकों का विस्तार होगा, पोषण स्तर में सुधार आएगा, किसानों की आय बढ़ेगी और रोजगार के लिए होने वाला पलायन भी धीरे-धीरे कम हो सकेगा। यह पहल बिहार में कृषि आधारित समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण मॉडल के रूप में उभर रही है।

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