
पटना: बिहार की सबसे चर्चित विधानसभा सीटों में शामिल बांकीपुर इस बार केवल एक उपचुनाव नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के विधानसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के कारण इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है।
10 जुलाई को होगी अहम रणनीतिक बैठक
30 जुलाई को प्रस्तावित मतदान से पहले चुनावी मुकाबला उस समय और रोचक हो गया, जब जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने स्वयं चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया। भाजपा इस चुनाव को सामान्य उपचुनाव की तरह नहीं देख रही है।
इसी क्रम में 10 जुलाई को मुख्यमंत्री आवास पर एनडीए की महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठक बुलाई गई है। आधिकारिक तौर पर बैठक का उद्देश्य सरकार के कार्यों की समीक्षा बताया गया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे बांकीपुर उपचुनाव और भोजपुर के भरत तिवारी एनकाउंटर मामले से जोड़कर देखा जा रहा है।
बांकीपुर में त्रिकोणीय मुकाबला
पिछले चार दशकों से बांकीपुर विधानसभा सीट भाजपा का मजबूत गढ़ रही है। पार्टी ने यहां लगातार जीत दर्ज की है और कई चुनावों में उसका जीत का अंतर विपक्षी दलों के कुल मतों से भी अधिक रहा है।
इस बार भाजपा ने युवा नेता अभिषेक कुमार (बंटी) को उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर प्रशांत किशोर पहली बार स्वयं चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा है। ऐसे में मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है।
प्रशांत किशोर की एंट्री से बढ़ी चुनौती
2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज को सफलता नहीं मिली थी, लेकिन इस बार प्रशांत किशोर ने सीधे बांकीपुर से चुनाव लड़कर इसे अपनी राजनीतिक परीक्षा बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी उम्मीदवारी ने इस उपचुनाव को राज्य का सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला बना दिया है।
एनडीए बैठक के पीछे दो बड़े उद्देश्य
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 10 जुलाई की बैठक के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य हैं—
- बांकीपुर उपचुनाव के लिए साझा चुनावी रणनीति तैयार करना।
- भरत तिवारी एनकाउंटर मामले पर गठबंधन के भीतर उभरे मतभेदों को समाप्त कर एकजुटता का संदेश देना।
बीजेपी के लिए क्यों अहम है बांकीपुर?
विशेषज्ञों का मानना है कि बांकीपुर केवल पटना की एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की राजनीतिक पहचान से जुड़ी सीट है। ऐसे में यहां कमजोर प्रदर्शन या हार का संदेश बिहार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक जा सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक भोलानाथ के अनुसार:
“यदि भाजपा अपने सबसे मजबूत गढ़ बांकीपुर में कमजोर पड़ती है, तो इसका संदेश पूरे देश में जाएगा। अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भी होने हैं, इसलिए भाजपा इस चुनाव में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।”
एनडीए एकजुटता दिखाने की तैयारी
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि बैठक में एनडीए के सभी घटक दलों के जिला अध्यक्ष शामिल होंगे और सरकार के कामकाज पर फीडबैक के साथ कई महत्वपूर्ण राजनीतिक विषयों पर चर्चा होगी।
वहीं जदयू एमएलसी संजय गांधी ने कहा कि चुनाव के समय गठबंधन की बैठक होना सामान्य प्रक्रिया है और एनडीए पहले भी एकजुट था तथा आगे भी रहेगा।
बूथ स्तर तक सक्रिय हुआ संगठन
भाजपा ने बांकीपुर उपचुनाव के लिए वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंप दी हैं। बूथ प्रबंधन, मतदाता संपर्क और प्रचार अभियान तेज कर दिया गया है। बैठक के बाद एनडीए के सभी घटक दल संयुक्त रूप से चुनाव प्रचार में उतरेंगे।
पूरे बिहार की नजर बांकीपुर पर
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह भाजपा की संगठनात्मक ताकत, एनडीए की एकजुटता और प्रशांत किशोर की राजनीतिक स्वीकार्यता—तीनों की बड़ी परीक्षा बन चुका है।
यदि भाजपा इस सीट को सुरक्षित रखती है तो उसे राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी। वहीं यदि मुकाबला बेहद करीबी रहता है या परिणाम अप्रत्याशित होता है, तो उसका असर बिहार की राजनीति के साथ-साथ आने वाले चुनावों की रणनीति पर भी पड़ सकता है।


