शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के फैसले का अश्विनी चौबे ने किया स्वागत, छात्रहित को बताया सर्वोच्च प्राथमिकता

पटना: पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्विनी कुमार चौबे ने शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार से जुड़े केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था को पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए उठाए गए कदम राष्ट्रहित और छात्रहित में महत्वपूर्ण हैं। चौबे ने कहा कि परीक्षा प्रणाली में किसी भी प्रकार की अनियमितता का सीधा असर लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है, इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जिसमें छात्रों को मेहनत और योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिले।

अपने बयान में अश्विनी कुमार चौबे ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की व्यक्तिगत रूप से भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की है और वह लंबे समय से युवाओं तथा विद्यार्थियों से जुड़े विषयों को समझते रहे हैं। चौबे के मुताबिक, छात्र जीवन से जुड़े अनुभव के कारण शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर लिया गया निर्णय भले ही कुछ लोगों को देर से आया हुआ लगे, लेकिन यदि इससे विद्यार्थियों का हित सुरक्षित होता है और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ती है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं का भविष्य शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता और प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता से सीधे जुड़ा हुआ है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया में किसी भी तरह की गड़बड़ी को रोकना सरकार और संबंधित संस्थाओं की बड़ी जिम्मेदारी है।

पेपर लीक रोकने के लिए कड़े कदम जरूरी

अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि पिछले कुछ समय में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं को लेकर छात्रों के बीच चिंता का माहौल बना है। उन्होंने कहा कि नीट सहित अलग-अलग परीक्षाओं में सामने आई कथित अनियमितताओं ने विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की चिंता बढ़ाई है।

उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए किए गए कानूनी और प्रशासनिक प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, परीक्षा व्यवस्था में सुधार केवल किसी एक परीक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक मजबूत और सुरक्षित प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।

चौबे ने कहा कि लाखों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन मेहनत और तैयारी के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होते हैं। ऐसे में यदि किसी स्तर पर पेपर लीक या अन्य गड़बड़ी होती है तो इसका असर केवल परीक्षा के परिणाम पर नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के पूरे करियर पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था में तकनीकी सुरक्षा, पारदर्शी प्रक्रिया और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था को और मजबूत किया जाना चाहिए।

भाजपा नेता ने कहा कि शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए लिए गए साहसिक निर्णयों का उद्देश्य तत्काल राजनीतिक लाभ नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना होना चाहिए। उनके मुताबिक, यदि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष और भरोसेमंद होगी तो विद्यार्थियों का संस्थानों और पूरी व्यवस्था पर विश्वास भी मजबूत होगा।

छात्र आंदोलनों को लेकर विपक्ष पर निशाना

अश्विनी कुमार चौबे ने अपने बयान में विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस, पर भी राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि छात्र समस्याओं को गंभीरता से समझने और उनके समाधान की दिशा में काम करने के बजाय विपक्षी दलों ने कई बार छात्र आंदोलनों को राजनीतिक रूप देने का प्रयास किया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों की वास्तविक समस्याओं और उनकी चिंताओं को समझने के बजाय उन्हें राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की गई। चौबे ने कहा कि युवाओं के मुद्दों पर राजनीति करने के बजाय सभी राजनीतिक दलों को छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

उन्होंने दावा किया कि देश की जनता विपक्ष की राजनीति को समझ रही है। हालांकि, विपक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों पर चौबे के बयान में कोई विस्तृत प्रतिक्रिया शामिल नहीं थी।

चौबे ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध का अधिकार सभी नागरिकों को है, लेकिन किसी भी आंदोलन को हिंसा का माध्यम नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों की आवाज को मजबूती से उठाया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए शांतिपूर्ण और संवैधानिक रास्तों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

लोकतंत्र में संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया जरूरी

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में किसी भी समस्या का स्थायी समाधान संवाद, चर्चा और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने कहा कि संसद और लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता की समस्याओं पर चर्चा करने और समाधान तलाशने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र सबसे ऊपर है और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर देश का हित होना चाहिए। उनके मुताबिक, शिक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे विषयों पर राजनीतिक दलों को दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर विचार करना चाहिए।

चौबे ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठने वाले सवालों का समाधान केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं हो सकता। इसके लिए सरकार, विपक्ष, शिक्षाविदों, परीक्षा संस्थाओं और छात्रों के बीच निरंतर संवाद जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी परीक्षा व्यवस्था में कमी सामने आती है तो उसे स्वीकार कर सुधार की दिशा में कदम उठाना ही बेहतर रास्ता है।

छात्र आंदोलनों से अपने जुड़ाव का किया जिक्र

अश्विनी कुमार चौबे ने अपने राजनीतिक जीवन और छात्र आंदोलनों से जुड़े अनुभवों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह स्वयं छात्र आंदोलनों और लोकतांत्रिक संघर्षों की परंपरा से आए हैं। उनके अनुसार, वर्ष 1966-67 के दौरान बिहार में तत्कालीन सरकार के खिलाफ चले छात्र आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई थी।

इसके बाद 1974 से 1976 के बीच चले जेपी आंदोलन और आपातकाल के खिलाफ संघर्ष में भी उनकी भागीदारी रही। उन्होंने दावा किया कि उस दौर में उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और गिरफ्तारी भी दी।

चौबे ने आपातकाल के अपने अनुभवों को याद करते हुए कहा कि उस समय उन्हें गंभीर यातनाओं का सामना करना पड़ा था। उन्होंने बताया कि संघर्ष के दौरान उनकी स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि उन्हें लंबे समय तक अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। उन्होंने कहा कि उस दौर में लाखों लोगों ने लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया और उनके त्याग तथा साहस के कारण देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को फिर मजबूती मिली।

उन्होंने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और कठिन अध्याय रहा है। उनके अनुसार, देश को उस दौर से सीख लेते हुए लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और नागरिक अधिकारों की रक्षा को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए।

74 वर्ष की उम्र में भी खुद को छात्र मानते हैं चौबे

अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि 74 वर्ष की उम्र में भी वह खुद को छात्र मानते हैं और जीवनभर सीखने की भावना को बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि छात्र होना केवल उम्र से जुड़ी पहचान नहीं है, बल्कि यह लगातार सीखने, नए विचारों को समझने और समाज के भविष्य के प्रति संवेदनशील रहने की मानसिकता है।

उन्होंने कहा कि युवाओं और छात्रों के मुद्दों से उनका जुड़ाव आज भी कायम है। इसी भावना के तहत उन्होंने हाल के दिनों में सोशल मीडिया के माध्यम से छात्रों की समस्याओं और चिंताओं को सामने रखने का प्रयास किया। उनका कहना था कि विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर गंभीर और संवेदनशील चर्चा होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि देश के छात्र केवल परीक्षा देने वाले युवा नहीं हैं, बल्कि वही आने वाले समय में देश के प्रशासन, विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसलिए उनके भविष्य से जुड़े किसी भी मुद्दे को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

छात्रहित में राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की अपील

अश्विनी कुमार चौबे ने कहा कि शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए राजनीतिक दलों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि छात्रों की समस्याओं को राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखने के बजाय उनके वास्तविक समाधान पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक पर प्रभावी रोक, समय पर परिणाम और शिकायतों के त्वरित समाधान जैसी व्यवस्थाएं विद्यार्थियों के हित में जरूरी हैं। उनका मानना है कि किसी भी छात्र को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी वर्षों की मेहनत किसी अनियमितता के कारण बेकार हो सकती है।

अंत में चौबे ने कहा कि राष्ट्रहित और छात्रहित सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। शिक्षा व्यवस्था को तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों या क्षणिक राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, निष्पक्ष परीक्षा और सुरक्षित भविष्य देने के लिए सभी पक्षों को मिलकर प्रयास करना होगा। उनके अनुसार, मजबूत और पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था ही विद्यार्थियों में विश्वास पैदा कर सकती है और देश की नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का समान अवसर दे सकती है।

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