​नदावां की माटी में अंतरराष्ट्रीय ‘दंगल’: सात समंदर पार से आए पहलवानों ने मोकामा में दिखाई ताकत, अनंत सिंह के राजसी ठाठ और नारों की गूँज से कांपा अखाड़ा

मोकामा/नदावां। बिहार के मोकामा की धरती एक बार फिर उस ऐतिहासिक शौर्य और पारंपरिक कुश्ती की गवाह बनी, जिसके लिए यह क्षेत्र दशकों से विख्यात रहा है। मोकामा विधायक अनंत सिंह के पैतृक गाँव नदावां में आयोजित इस दंगल ने न केवल स्थानीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में भी अपनी धमक दर्ज कराई है। 4 अप्रैल 2026 की यह दोपहर नदावां के अखाड़े के लिए सामान्य नहीं थी; यहाँ की लाल मिट्टी में जहाँ एक ओर बिहार और आसपास के जिलों के लंगोटधारी पहलवान अपना दम दिखा रहे थे, वहीं दूसरी ओर ईरान और जॉर्जिया जैसे देशों से आए अंतरराष्ट्रीय महारथियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को एक नया वैश्विक आयाम दे दिया। चिलचिलाती धूप और भीषण गर्मी के बावजूद, नदावां की सड़कों से लेकर अखाड़े के चारों ओर जनसैलाब ऐसा उमड़ा कि सुरक्षा और व्यवस्था के तमाम दावे बोने नजर आने लगे।

स्थानीय अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय दंगल तक का सफर

​दोपहर के चढ़ते सूरज के साथ ही नदावां के अखाड़े में कुश्ती का बिगुल फूंका गया। आयोजन की शुरुआत परंपरा के अनुसार स्थानीय स्तर के पहलवानों से की गई। बाढ़, लखीसराय, बेगूसराय और पटना समेत आसपास के कई जिलों से आए नौजवान पहलवानों ने एक-एक कर अखाड़े में दस्तक दी। अखाड़े में उतरने से पहले हर पहलवान अनंत सिंह के पास जाकर उनका आशीर्वाद लेता दिखा। यह दृश्य किसी चुनावी रैली से इतर एक सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण जैसा जान पड़ रहा था। कुश्ती की शुरुआत छोटे-छोटे मुकाबले से हुई, जहाँ दांव-पेच की बारीकियों ने दर्शकों को बांधे रखा। जैसे-जैसे पहलवान एक-दूसरे को चित कर अखाड़े से बाहर करते गए, वैसे-वैसे रोमांच का ग्राफ बढ़ता गया।

​इस दंगल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि शाम ढलते ही यहाँ ईरान और जॉर्जिया जैसे देशों के अंतरराष्ट्रीय पहलवानों के बीच महा-मुकाबला तय था। विदेशी पहलवानों के नदावां पहुँचने की खबर ने पूरे क्षेत्र में उत्साह का संचार कर दिया था। मोकामा की इस सुदूर ग्रामीण जमीन पर सात समंदर पार के पहलवानों का उतरना यह दर्शाता है कि अनंत सिंह ने अपनी व्यक्तिगत साख और संसाधनों के बल पर ग्रामीण खेलों को किस ऊँचाई पर पहुँचा दिया है।

राजसी अंदाज में ‘छोटे सरकार’: अखाड़े का वो अनोखा दृश्य

​पूरे आयोजन के केंद्र में अनंत सिंह का वह अंदाज रहा, जिसके लिए वे पूरे बिहार में चर्चित हैं। भीषण गर्मी और पसीने से तरबतर भीड़ के बीच अनंत सिंह अपने चिर-परिचित ‘राजसी’ ठाठ में नजर आए। उनके पीछे एक समर्थक बड़ी छतरी (Parasol) थामे चल रहा था, जो सीधी धूप से उन्हें बचा रहा था। अनंत सिंह पूरे अखाड़े का चक्कर लगाते रहे और पहलवानों का उत्साह बढ़ाते रहे। लोग अखाड़े में हो रही कुश्ती से ज्यादा अपने बीच ‘छोटे सरकार’ की एक झलक पाने के लिए उत्साहित दिखे।

​इस दौरान एक और भावुक और दिलचस्प दृश्य देखने को मिला। अनंत सिंह के छोटे पोते पूरे समय अपने दादा के साथ अखाड़े के भीतर ही मौजूद रहे। नन्हा बालक हाथ में गदा थामे हुए पूरी गंभीरता के साथ अखाड़े में टहलता दिखा, जो भविष्य की एक सांस्कृतिक विरासत की ओर इशारा कर रहा था। गदा थामे पोते और छतरी के साये में चलते अनंत सिंह को देखकर भीड़ बेकाबू हो उठी और चारों तरफ ‘छोटे सरकार जिंदाबाद’ के गगनभेदी नारे गूँजने लगे।

विवेका पहलवान की विरासत और मेहमानवाजी का आलम

​नदावां का यह दंगल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक विरासत को सम्मान देने का भी माध्यम था। बिहार केसरी के नाम से मशहूर रहे दिवंगत विवेका पहलवान की स्मृतियाँ इस अखाड़े में साफ तौर पर महसूस की गईं। विवेका पहलवान के भाई अरविंद पहलवान और उनके बेटे राजा परीक्षित पूरे समय सक्रिय दिखे। वे बाहर से आए नामचीन पहलवानों और अतिथियों का स्वागत-सत्कार करने में जुटे रहे। भीड़ के बीच लगातार ‘विवेका पहलवान अमर रहें’ के नारे लग रहे थे, जो यह बताता है कि आज भी इस इलाके के लोगों के दिलों में कुश्ती और विवेका पहलवान के प्रति कितना गहरा सम्मान है।

​अनंत सिंह ने नदावां आने वाले हजारों लोगों के लिए रहने और खाने का पुख्ता इंतजाम किया था। बाढ़ और अन्य सुदूर इलाकों से आए दर्शकों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई थी, जहाँ बिना किसी भेदभाव के सभी लोग एक साथ भोजन करते दिखे। यह आयोजन एक खेल प्रतियोगिता से बढ़कर एक सामाजिक महाकुंभ में तब्दील हो गया था, जहाँ मेहमानवाजी का स्तर किसी शाही दावत से कम नहीं था।

गर्मी पर भारी पड़ता जुनून (विशेष विश्लेषण)

​द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, मोकामा में आयोजित यह दंगल बिहार की ‘अखाड़ा संस्कृति’ के पुनरुद्धार का संकेत है। 4 अप्रैल के इस दिन तापमान 40 डिग्री के आसपास होने के बावजूद लोगों का उत्साह यह साबित करता है कि यहाँ के जनजीवन में कुश्ती का स्थान आज भी सर्वोपरि है।

  1. खेल और राजनीति का संगम: अनंत सिंह ने जिस तरह से इस आयोजन को एक बड़े ब्रांड के रूप में पेश किया है, वह उनकी क्षेत्र पर पकड़ और लोकप्रियता को और सुदृढ़ करता है। विदेशी पहलवानों को गाँव में लाना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती है, जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया।
  2. सांस्कृतिक पहचान: जॉर्जिया और ईरान के पहलवानों के बीच होने वाली कुश्ती ने यह संदेश दिया है कि बिहार की ग्रामीण प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों से रूबरू कराने की जरूरत है। स्थानीय पहलवानों के लिए यह सीखने का एक बड़ा अवसर था।
  3. सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन: हजारों की भीड़ को नियंत्रित करना और उनके खाने-पीने का प्रबंध करना एक बड़ी व्यवस्था थी, जिसे अनंत सिंह के समर्थकों ने सुचारू रूप से चलाया।

नदावां की लाल मिट्टी और अंतरराष्ट्रीय पहलवान

​शाम के वक्त जब सूरज की तपिश थोड़ी कम हुई, तब ईरान और जॉर्जिया के पहलवान अखाड़े में उतरे। मिट्टी की सोंधी खुशबू के बीच जब इन विदेशी पहलवानों ने भारतीय पद्धति से कुश्ती लड़ने के लिए कमर कसी, तो पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। भाषा की दीवार कहीं भी आड़े नहीं आई, क्योंकि ताकत और दांव-पेच की भाषा पूरी तरह सार्वभौमिक थी। अनंत सिंह स्वयं अखाड़े के किनारे खड़े होकर हर बारीक चाल को गौर से देखते रहे। यह कुश्ती मोकामा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गई है, क्योंकि इससे पहले कभी इतनी बड़ी संख्या में अंतरराष्ट्रीय रेसलर किसी गाँव के निजी अखाड़े में नहीं उतरे थे।

दंगल के सामाजिक सरोकार

​निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो अनंत सिंह का यह दंगल मोकामा के युवाओं को नशे और अपराध से दूर रखकर खेलों की ओर मोड़ने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। कुश्ती अनुशासन का खेल है और इस तरह के बड़े आयोजनों से क्षेत्र के युवाओं में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। हालाँकि, राजसी अंदाज और छतरी जैसे प्रतीकों को लेकर अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन जनसमर्थन और लोगों के बीच उनकी मौजूदगी यह साबित करती है कि वे आज भी ‘नाड़ी’ की नब्ज पहचानते हैं।

​विवेका पहलवान के नाम का स्मरण और उनके परिजनों का सम्मान करना यह दिखाता है कि अनंत सिंह अपनी जड़ों और पुराने रिश्तों को आज भी कितनी अहमियत देते हैं। यह दंगल केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि मोकामा की उस ‘मर्दाना विरासत’ का उत्सव है जो यहाँ की मिट्टी का अभिन्न अंग है।

नदावां से निकला शांति और शक्ति का संदेश

​नदावां के इस अखाड़े से जो धूल उठी है, उसकी चर्चा पूरे बिहार में हो रही है। अनंत सिंह ने यह साबित कर दिया है कि वे भले ही विधायक हों या न हों, लेकिन जनमानस के बीच उनका ‘छोटे सरकार’ वाला प्रभाव आज भी अक्षुण्ण है। विदेशी पहलवानों की मौजूदगी ने बिहार के ग्रामीण खेलों को एक नई दिशा दी है। 3 अप्रैल और 4 अप्रैल के इन दो दिनों में नदावां की धरती ने जो कुछ भी देखा, वह बिहार के बदलते खेल परिदृश्य और अनंत सिंह के अटूट रसूख की एक मुकम्मल तस्वीर है।

द वॉयस ऑफ बिहार की टीम इस आयोजन को बिहार की लोक-संस्कृति के एक गौरवशाली अध्याय के रूप में देखती है। कुश्ती के इस महाकुंभ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार की माटी में आज भी वह दम है कि वह दुनिया भर के पहलवानों को अपनी ओर खींच सकती है। फिलहाल, नदावां का अखाड़ा अब खाली हो चुका है, लेकिन यहाँ लगे नारे और पहलवानों के दांव-पेच की चर्चा मोकामा की चौपालों पर हफ्तों तक चलती रहेगी।

  • ये भी पढ़े..

    भागलपुर में पिता की स्मृति को समर्पित भावपूर्ण काव्य संध्या, कवियों ने कविता और गीतों से दी श्रद्धांजलि

    Share Add as a preferred…

    भागलपुर के नए डीडीसी रवि राकेश ने संभाला पदभार, विकास योजनाओं को गति देने पर रहेगा विशेष फोकस

    Share Add as a preferred…