गुरु पूर्णिमा पर सुल्तानगंज में आस्था और श्रद्धा का अद्भुत संगम, गूंजे ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के नारे

सुल्तानगंज (भागलपुर), 10 जुलाई 2025:गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा तट, नमामि गंगे घाट और अजगैबीनाथ मंदिर परिसर श्रद्धा और भक्ति से सराबोर हो उठा। देश-विदेश से आए हजारों कांवरियों और श्रद्धालुओं की भीड़ ने पूरे क्षेत्र को कावड़ और केसरिया रंग में रंग दिया।


105 किलोमीटर की पदयात्रा की शुरुआत

गंगा स्नान कर श्रद्धालु कंधे पर कावड़ में गंगाजल भरकर बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) के लिए 105 किलोमीटर की कठिन लेकिन आस्था-भरी पदयात्रा पर निकल पड़े। सुल्तानगंज से देवघर तक की यह यात्रा श्रावण मास में विशेष महत्व रखती है।


देश के कोने-कोने से पहुंचे श्रद्धालु

श्रावण के पहले सोमवार से ठीक पहले, गुरु पूर्णिमा के दिन गंगाजल लेने के लिए भागलपुर, बांका, मुंगेर, नवगछिया, पूर्णिया, कटिहार सहित झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। पूरे क्षेत्र में “हर हर महादेव” और “बोल बम” के गगनभेदी जयघोष गूंजते रहे।


प्रशासन की सख्त और संवेदनशील तैयारी

श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए भागलपुर जिला प्रशासन ने सुरक्षा और व्यवस्था के पुख्ता इंतज़ाम किए हैं:

  • ड्रोन कैमरों से निगरानी
  • मेडिकल कैंप और प्राथमिक उपचार केंद्र
  • जलपान और विश्राम स्थलों की व्यवस्था
  • प्रत्येक चौराहे पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती
  • महिला सुरक्षा के लिए अलग महिला पुलिस टीम

“नमामि गंगे घाट पर श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बन रही है। लोग घंटों लाइन में लगकर भी पूरे समर्पण और श्रद्धा के साथ गंगाजल भर रहे हैं।”
— स्थानीय स्वयंसेवक


शांति, समर्पण और ऊर्जा से भरपूर दृश्य

घाटों पर श्रद्धालुओं की कतार, कंधे पर कावड़, भक्तों की भक्ति, और गूंजते जयकारे—सुल्तानगंज का दृश्य दिव्य और मनोहारी बन गया है। श्रद्धालुओं के चेहरे पर भक्ति की चमक और सफर की थकान को मात देने वाली आस्था स्पष्ट देखी जा सकती है।


अगले एक माह तक चलेगा कांवरियों का प्रवाह

श्रावण मास के आरंभ के साथ ही यह कांवर यात्रा अब एक माह तक चलेगी। रोजाना लाखों श्रद्धालु सुल्तानगंज पहुंचकर गंगाजल लेकर देवघर के लिए रवाना होंगे।


यह अवसर न केवल धार्मिक परंपराओं की शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी सिद्ध करता है कि जब भक्ति, व्यवस्था और सामाजिक सहयोग एक साथ चलते हैं, तब एक आध्यात्मिक जनसैलाब भी अनुशासित और सौहार्दपूर्ण बन सकता है।


 

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