
समाचार के मुख्य बिंदु: परंपरा और भक्ति का महासंगम
- विशेष अनुष्ठान: रामनवमी के पावन अवसर पर भागलपुर के शहरी और ग्रामीण इलाकों में ‘महावीरी पताका’ (हनुमान ध्वज) के पूजन की विशेष धूम रही।
- अनोखी परंपरा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कच्चे बाँस को पवित्र कर उस पर रोली, चंदन और सिंदूर का लेप लगाकर ध्वज स्थापित किया गया।
- भक्तों का सैलाब: सुबह से ही नाथनगर, सबौर, बरारी और तिलकामांझी के हनुमान मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी।
- धार्मिक विधान: संकटमोचन को सिंदूर, चमेली तेल और विशेष फूल-माला अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की गई।
- सामूहिक पाठ: शहर के विभिन्न चौराहों और मंदिरों में सुंदरकांड और हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
- VOB इनसाइट: कच्चे बाँस पर ध्वज पूजन की यह परंपरा सदियों पुरानी है, जो न केवल धार्मिक आस्था बल्कि प्रकृति (बाँस) और शक्ति (हनुमान) के जुड़ाव को भी प्रदर्शित करती है।
भागलपुर | 27 मार्च, 2026
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव ‘रामनवमी’ के अवसर पर सिल्क सिटी भागलपुर का कोना-कोना ‘बजरंगबली’ की भक्ति में सराबोर नजर आया। जहाँ एक ओर रामनवमी की शोभायात्राओं ने समां बांधा, वहीं दूसरी ओर घरों और मंदिरों में ‘हनुमान ध्वज’ की स्थापना की पारंपरिक रस्म ने श्रद्धा का अनूठा दृश्य प्रस्तुत किया। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष श्रद्धालुओं में महावीरी पताका को लेकर विशेष उत्साह देखा गया।
कच्चे बाँस और रोली-चंदन का विधान: क्या है धार्मिक महत्व?
भागलपुर के प्रसिद्ध लाल बाबा मंदिर के पंडित ने इस परंपरा के पीछे के वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस दिन कच्चे बाँस का उपयोग उसकी शुद्धता और लचीलेपन का प्रतीक है।
पूजन की प्रक्रिया:
- बाँस का शुद्धिकरण: सर्वप्रथम नए और कच्चे बाँस को गंगाजल से पवित्र किया जाता है।
- शृंगार: बाँस के ऊपरी हिस्से से लेकर नीचे तक रोली, चंदन और सिंदूर से तिलक लगाया जाता है। यह माना जाता है कि सिंदूर हनुमान जी को अत्यंत प्रिय है और इससे ध्वज में ‘प्राण’ का संचार होता है।
- ध्वज स्थापना: लाल और केसरिया रंग के हनुमान ध्वज (जिस पर गदा या हनुमान जी की आकृति बनी होती है) को बाँस पर मजबूती से बांधा जाता है।
- संकल्प: विधि-विधान से पूजा के बाद इसे घर की छत, मंदिर के शिखर या चौक-चौराहों पर स्थापित किया जाता है।
श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इस प्रकार ध्वज स्थापित करने से घर पर आने वाले सभी आकस्मिक संकट दूर होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
मंदिरों में उमड़ा जनसैलाब: सिंदूर और चमेली तेल की महक
आज सुबह से ही भागलपुर के प्रमुख हनुमान मंदिरों में भक्तों की लंबी कतारें देखी गईं।
- प्रसाद और चढ़ावा: भक्तों ने पवनपुत्र को बूंदी के लड्डू, चमेली का तेल और सिंदूर अर्पित किया।
- सजावट: मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों और गेंदे के फूलों से भव्य तरीके से सजाया गया था। विशेष रूप से तिलकामांझी और बरारी के मंदिरों में लेजर लाइट की सजावट ने भक्तों का मन मोह लिया।
- भक्ति गूँज: ढोल-नगाड़ों की थाप और “जय श्री राम”, “जय बजरंगबली” के नारों के बीच जब महावीरी पताका फहराई गई, तो पूरा माहौल दिव्य हो उठा।
क्षेत्रवार कवरेज: कहाँ कैसा रहा नजारा?
- नाथनगर: यहाँ के प्राचीन मंदिरों में सामूहिक सुंदरकांड पाठ का आयोजन हुआ, जिसमें सैकड़ों महिलाओं और युवाओं ने हिस्सा लिया।
- सबौर और बरारी: इन क्षेत्रों में युवाओं की टोली ने मोटरसाइकिल और साइकिलों पर हनुमान ध्वज लगाकर छोटे जुलूस निकाले।
- शहरी क्षेत्र: घंटाघर और स्टेशन रोड के पास स्थित हनुमान मंदिरों में विशेष महाआरती का आयोजन किया गया।
VOB का नजरिया: आस्था के साथ अनुशासन की मिसाल
’द वॉयस ऑफ बिहार’ (VOB) का मानना है कि ऐसे पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान को और गहरा करते हैं।
- एकता का सूत्र: ध्वज पूजन के दौरान अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है और पूरा समाज एक ही रंग (केसरिया) में रंगा नजर आता है।
- पर्यावरण और परंपरा: कच्चे बाँस का उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का भी एक माध्यम है।
- युवाओं का जुड़ाव: आज की पीढ़ी का इन पारंपरिक अनुष्ठानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना यह दर्शाता है कि हमारी जड़ें आज भी सुरक्षित हैं।
सुशासन और धार्मिक सद्भाव का संदेश
लाल बाबा मंदिर के पंडित के मार्गदर्शन में संपन्न हुए इस ध्वज पूजन ने भागलपुर में शांति और भाईचारे का संदेश दिया है। जिला प्रशासन की मुस्तैदी के बीच यह धार्मिक अनुष्ठान बिना किसी बाधा के संपन्न हुआ। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ रामनवमी के अगले दिन होने वाले भंडारों, विसर्जन जुलूसों और सुरक्षा व्यवस्था की हर ताज़ा अपडेट आप तक सबसे पहले पहुँचाता रहेगा।


