सिरमौर (हिमाचल प्रदेश), 16 जुलाई 2025: महाभारत में जहां द्रौपदी ने पांच पांडवों से विवाह किया था, वैसी ही परंपरा आज भी भारत के कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलती है। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के शिलाई गांव में हट्टी समुदाय के दो सगे भाइयों ने एक ही दुल्हन से शादी रचाई, और यह विवाह समारोह इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।
बहुपतित्व की सदियों पुरानी परंपरा
यह परंपरा “बहुपतित्व” (Polyandry) कहलाती है, जिसमें एक महिला के एक से अधिक पति होते हैं। सिरमौर के ट्रांस-गिरी क्षेत्र के शिलाई गांव में हट्टी जनजाति इस परंपरा को वर्षों से निभाती आ रही है।
इस बार गांव के प्रदीप नेगी और कपिल नेगी, दोनों भाइयों ने मिलकर सुनीता चौहान से विवाह किया। तीन दिनों तक चले इस विवाह उत्सव में स्थानीय लोकगीतों, नृत्य और पारंपरिक भोज का आयोजन हुआ।
“बिना दबाव, आपसी सहमति से विवाह”
दुल्हन सुनीता चौहान और दोनों दूल्हों ने साफ कहा कि यह निर्णय उन्होंने बिना किसी सामाजिक या पारिवारिक दबाव के लिया है। कपिल नेगी, जो विदेश में रहते हैं, ने कहा—
“हमने पारदर्शिता में विश्वास किया है। यह शादी एक संयुक्त परिवार और स्थिरता का प्रतीक है।”
पारंपरिक कारण: संपत्ति का बंटवारा रोकना
विशेषज्ञों के अनुसार, इस परंपरा के पीछे पैतृक संपत्ति के बंटवारे को रोकना मुख्य उद्देश्य रहा है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी रहती थी। यही वजह है कि विशेषकर पहाड़ी और सीमित कृषि भूमि वाले क्षेत्रों में यह प्रथा पनपी।
किन्नौर में भी जारी है यह परंपरा
हिमाचल प्रदेश का किन्नौर जिला भी इस परंपरा का पालन करता है, जहां इसे “भ्रातृ बहुपतित्व” कहा जाता है — यानी एक महिला की शादी सगे भाइयों से होती है।
यहां के लोग इसे “पारिवारिक एकता और आपसी समझ” का प्रतीक मानते हैं। हालांकि, समय के साथ अब महिलाओं की शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ने से ऐसे विवाह कम होते जा रहे हैं।
हट्टी समुदाय को हाल ही में मिली जनजातीय मान्यता
2022 में हट्टी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिया गया था। यह समुदाय हिमाचल-उत्तराखंड की सीमा पर बसा है और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है। हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री वाई.एस. परमार ने भी इस विषय पर पीएचडी की थी।
भारत जैसे विविधता वाले देश में अनेक प्रथाएं सदियों से प्रचलित हैं। कुछ सामाजिक प्रथाएं समय के साथ बदलती हैं, तो कुछ अपने ऐतिहासिक मूल्यों और सांस्कृतिक पहचान के साथ आज भी जीवित हैं। बहुपतित्व एक ऐसी ही परंपरा है, जो अब विरल होती जा रही है लेकिन अपने पीछे सामाजिक संरचना और भूमि नीति से जुड़ी अहम कहानी छोड़ती है।


