“नेताओं के बच्चों के लिए ‘सिंहासन’, आपके लिए ‘पलायन’!” निशांत की एंट्री पर प्रशांत किशोर का तीखा हमला; कैमूर से दी शुभकामनाएं और नसीहत

कैमूर | 09 मार्च, 2026:बिहार की राजनीति में ‘निशांत उदय’ के बाद अब सियासी वार-पलटवार का दौर तेज हो गया है। जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (PK) ने कैमूर में मीडिया ब्रीफिंग के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री पर अपनी प्रतिक्रिया दी। पीके ने जहाँ एक तरफ निशांत को शिष्टाचार के नाते शुभकामनाएं दीं, वहीं दूसरी तरफ बिहार की जनता को आईना दिखाते हुए राज्य की ‘परिवारवादी’ व्यवस्था पर बड़ा प्रहार किया।

शुभकामनाएं… पर ‘व्यक्तिगत’ दायरे में

​निशांत कुमार के जदयू में शामिल होने के सवाल पर प्रशांत किशोर ने काफी सधी हुई लेकिन मर्मभेदी प्रतिक्रिया दी।

​”जदयू उनके पिताजी की पार्टी है और वे अगर वहां से अपनी राजनीति की शुरुआत कर रहे हैं तो हमारी ओर से उन्हें शुभकामनाएं हैं। राजनीति में आना या न आना उनका व्यक्तिगत निर्णय है और हर नागरिक की तरह उन्हें भी इसका अधिकार है।” — प्रशांत किशोर

 

​पीके का यह बयान ऊपर से सरल दिखता है, लेकिन इसमें ‘पिताजी की पार्टी’ कहकर उन्होंने जदयू की वर्तमान स्थिति पर एक गहरा कटाक्ष भी छिपा दिया है।

सिंहासन बनाम पलायन: पीके का जनता से सीधा सवाल

​निशांत को शुभकामनाएं देने के तुरंत बाद प्रशांत किशोर अपने चिर-परिचित आक्रामक अंदाज में नजर आए। उन्होंने बिहार के आम लोगों से अपील करते हुए एक ऐसी हकीकत बयां की जो राज्य के कड़वे सच को उजागर करती है।

  • अपनों के लिए सत्ता: प्रशांत किशोर ने कहा कि बिहार के बड़े नेताओं ने अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ‘सत्ता का सिंहासन’ पहले से ही तैयार कर रखा है।
  • जनता के लिए मरुथल: उन्होंने आरोप लगाया कि इन्ही नेताओं ने आम लोगों के बच्चों के हिस्से में केवल अशिक्षा, बेरोजगारी और पलायन (Migration) की व्यवस्था छोड़ी है।
  • दोहरा मापदंड: पीके का तर्क था कि जब नेताओं के बच्चे युवा होते हैं तो उनके लिए पार्टी के दरवाजे और बड़े पद खुल जाते हैं, लेकिन जब गरीब का बच्चा जवान होता है तो उसे दिल्ली-पंजाब की ट्रेनों में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है।

कैमूर की धरती से बदलाव की अपील

​कैमूर में अपनी पदयात्रा या सभा (जन सुराज अभियान के तहत) के दौरान उन्होंने लोगों से आह्वान किया कि वे अपनी अगली पीढ़ी के भविष्य को पहचानें। उन्होंने कहा कि जब तक जनता ‘राजा के बेटे’ को ही अपना भाग्यविधाता मानती रहेगी, तब तक उनके अपने बच्चे मजदूरी करने को मजबूर रहेंगे।

VOB का नजरिया: पीके की ‘पिंचिंग’ वाली राजनीति!

प्रशांत किशोर का यह बयान उस समय आया है जब बिहार में ‘विरासत’ और ‘सियासत’ के मिलन की चर्चाएं जोरों पर हैं। पीके जानते हैं कि नीतीश कुमार की ‘मिस्टर क्लीन’ छवि और परिवारवाद के विरोध वाले दावों के बीच निशांत की एंट्री एक कमजोर नस है। ‘सिंहासन बनाम पलायन’ का यह नारा सीधे उन युवाओं को हिट करता है जो रोजगार के लिए भटक रहे हैं। अब देखना यह है कि जदयू की ‘निशांत यात्रा’ पीके के इन तर्कों की काट कैसे ढूंढती है।

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