पटना के अधिवेशन भवन में उत्तर बिहार के अंचलाधिकारियों (COs) के लिए आयोजित यह कार्यशाला केवल एक औपचारिक बैठक नहीं थी, बल्कि यह बिहार के राजस्व प्रशासन के ‘डिजिटलीकरण’ और ‘कानूनी शुद्धिकरण’ की एक बड़ी कोशिश थी। विभाग का मानना है कि अगर ‘अंचल की नींव’ मजबूत होगी, तभी बिहार से भूमि विवादों का खात्मा होगा।
ट्रेनिंग मॉड्यूल ‘फाइल’ रिकॉर्ड: क्या सिखाया गया अधिकारियों को?
इस कार्यशाला में प्रशिक्षण को चार मुख्य स्तंभों में बांटा गया था, जिसका मकसद अधिकारियों को ‘रबर स्टैंप’ के बजाय ‘निर्णायक’ बनाना है:
1. राजस्व कानूनों की ‘मौलिक’ व्याख्या (Legal DNA)
सेवानिवृत्त अपर सचिव विनोद कुमार झा ने अधिकारियों को कानून की किताबों के पन्नों से बाहर निकालकर जमीनी हकीकत समझाई।
- इतिहास से सबक: अधिकारियों को आजादी के पहले (Pre-Independence) से लेकर वर्तमान तक के राजस्व अधिनियमों की यात्रा बताई गई, ताकि वे पुराने दस्तावेजों (खतियान आदि) की भाषा और कानूनी बारीकियों को समझ सकें।
- हाईकोर्ट का ‘हथौड़ा’: पटना उच्च न्यायालय द्वारा हाल के दिनों में दिए गए महत्वपूर्ण फैसलों पर चर्चा हुई। अधिकारियों को सिखाया गया कि हाईकोर्ट के निर्देशों के आलोक में कैसे आदेश पारित किए जाएं ताकि वे बाद में कानूनी चुनौती का सामना न करें।
- संवेदनशीलता का पाठ: यह साफ किया गया कि ‘जमीन’ केवल एक टुकड़ा नहीं, किसान का सम्मान है। इसलिए, हर मामले में निष्पक्ष और संवेदनशील रुख अपनाना जरूरी है।
2. डिजिटल क्रांति का ‘कमांड सेंटर’ (Digital Backbone)
आईटी मैनेजर आनंद शंकर ने प्रेजेंटेशन के जरिए अधिकारियों को ‘हाइटेक’ बनाने का मंत्र दिया।
- ई-मापी (e-Mapi): अब अमीन के भरोसे रहने के बजाय डिजिटल मापी की प्रक्रिया को कैसे पारदर्शी बनाया जाए, इस पर विशेष जोर रहा। इससे ‘पहुंच’ और ‘पैसे’ के खेल को खत्म किया जा सकेगा।
- दाखिल-खारिज (Mutation) और परिमार्जन: म्यूटेशन रिजेक्ट करने के ठोस कारण पोर्टल पर दर्ज करने और ‘परिमार्जन’ के जरिए पुराने रिकॉर्ड्स की गलतियों को सुधारने की तकनीकी बारीकियां सिखाई गईं।
- रियल-टाइम मॉनिटरिंग: अधिकारियों को सिखाया गया कि वे डैशबोर्ड के जरिए कैसे लंबित मामलों को ट्रैक करें और ‘समय सीमा’ (Timeline) का पालन करें।
3. भू-अर्जन और विभागीय ‘गाइडलाइन’ (Compliance)
अवर सचिव दिनेश कुमार और प्रशाखा पदाधिकारी शिवजी ने प्रशासनिक पेचीदगियों को सुलझाया।
- भू-अर्जन (Land Acquisition): सरकारी परियोजनाओं (सड़क, पुल, स्कूल) के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान मुआवजे की गणना और कानूनी अड़चनों को दूर करने की प्रक्रिया बताई गई।
- परिपत्रों (Circulars) का अनुपालन: विभाग द्वारा समय-समय पर जारी किए गए महत्वपूर्ण आदेशों की अनदेखी करना अब भारी पड़ेगा। अधिकारियों को इन सर्कुलर्स का हवाला देते हुए फैसले लेने को कहा गया।
4. समयबद्ध निष्पादन और जवाबदेही (Accountability)
अपर सचिव आजीव वत्सराज ने साफ लहजे में अधिकारियों को उनकी भूमिका की अहमियत समझाई।
- रीढ़ की हड्डी: सीओ को राजस्व प्रशासन की ‘रीढ़’ बताते हुए कहा गया कि अंचल स्तर पर फाइलें रुकने का मतलब है—न्याय में देरी।
- भविष्य की तैयारी: नए नियुक्त और प्रभारी अंचलाधिकारियों को ‘राजस्व न्यायालय’ चलाने और अभिलेखों (Records) के सटीक संधारण की ट्रेनिंग दी गई।
VOB का नजरिया: क्या ‘ट्रेनिंग’ से टूटेगा ‘बाबुओं और बिचौलियों’ का गठबंधन?
अक्सर देखा गया है कि पटना से जारी होने वाले ‘अच्छे निर्देश’ अंचल तक पहुंचते-पहुंचते ‘फाइलों के बोझ’ तले दब जाते हैं। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि विनोद कुमार झा जैसे अनुभवी अधिकारियों से ट्रेनिंग मिलना सीओ के लिए वरदान है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब ये अधिकारी अपने अंचल में लौटेंगे।
क्या ई-मापी के बाद अमीन अपनी मनमानी छोड़ेंगे? क्या म्यूटेशन के लिए किसान को अब भी किसी ‘बिचौलिए’ का सहारा लेना पड़ेगा? ट्रेनिंग देना ‘सॉफ्टवेयर अपडेट’ जैसा है, लेकिन उसे चलाने वाला ‘हार्डवेयर’ (यानी अधिकारी) अगर ईमानदार नहीं रहा, तो सिस्टम फिर से ‘हैंग’ हो जाएगा। उम्मीद है कि ‘उत्तर बिहार’ के ये अधिकारी अब ‘पारदर्शिता’ के नए युग की शुरुआत करेंगे।


