पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों जोरदार हलचल देखने को मिल रही है। विधानसभा में हुए शक्ति परीक्षण और बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच महागठबंधन को बड़ा झटका लगा है। आरजेडी और कांग्रेस के चार विधायकों के रुख ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। इन विधायकों के फैसले ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की रणनीति को बड़ा नुकसान पहुंचाया है और राज्य की राजनीति में नए समीकरण बनने की चर्चा तेज हो गई है।
राजनीतिक गलियारों में जिन चार विधायकों के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं, उनमें ढाका से विधायक फैसल रहमान, वाल्मीकिनगर से विधायक सुरेंद्र कुशवाहा, फारबिसगंज से विधायक मनोज विश्वास और मनिहारी से विधायक मनोहर सिंह शामिल हैं। इन चारों नेताओं के फैसले ने महागठबंधन के समीकरणों को प्रभावित किया है और इस कदम के पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं।
फैसल रहमान और आनंद मोहन का कनेक्शन
ढाका विधानसभा सीट से आरजेडी विधायक फैसल रहमान की जीत काफी मामूली अंतर से हुई थी। उन्होंने पिछले चुनाव में करीब 178 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके फैसले के पीछे बाहुबली नेता आनंद मोहन के साथ पुराने संबंध भी एक अहम कारण हो सकते हैं।
बताया जाता है कि 2020 के विधानसभा चुनाव के दौरान आनंद मोहन ने ढाका सीट पर बीजेपी उम्मीदवार के लिए सक्रिय प्रचार नहीं किया था, जिससे फैसल रहमान को फायदा मिला। हाल के दिनों में आनंद मोहन के कार्यक्रमों में फैसल रहमान की मौजूदगी ने भी कई तरह की राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दिया है।
सुरेंद्र कुशवाहा और राजनीतिक गुरु का प्रभाव
वाल्मीकिनगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा का रुख भी चर्चा का विषय बना हुआ है। उनका राजनीतिक संबंध पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा से माना जाता है। सुरेंद्र कुशवाहा पहले उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से जुड़े रहे हैं और 2015 के विधानसभा चुनाव में भी उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आगे बढ़े थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बिहार की राजनीति में अक्सर देखा गया है कि नेता अपने राजनीतिक गुरु या पुराने सहयोगियों के साथ खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे में उनके हालिया फैसले को उसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
मनोज विश्वास और बैक-चैनल राजनीति की चर्चा
फारबिसगंज के विधायक मनोज विश्वास का मामला भी काफी दिलचस्प बताया जा रहा है। उनकी जीत में एआईएमआईएम द्वारा उम्मीदवार नहीं उतारने को एक अहम कारण माना जाता है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि उनकी हालिया राजनीतिक गतिविधियों के पीछे कुछ बड़े स्तर पर बातचीत या बैक-चैनल रणनीति काम कर रही हो सकती है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है।
मनोहर सिंह और पुराने जेडीयू संबंध
मनिहारी के विधायक मनोहर सिंह का राजनीतिक करियर भी कई दलों से होकर गुजरा है। वे पहले जेडीयू से जुड़े रहे हैं और 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर जीत हासिल कर चुके हैं। बाद में 2015 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस से टिकट मिला था।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके पुराने संबंध मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से रहे हैं और यही कारण हो सकता है कि हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में उनका रुख बदलता हुआ दिखाई दिया।
बिहार की राजनीति में बढ़ी हलचल
इन चार विधायकों के फैसले के बाद बिहार की राजनीति में हलचल और तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस घटनाक्रम ने महागठबंधन के भीतर मौजूद कमजोरियों को उजागर कर दिया है।
साथ ही यह भी चर्चा हो रही है कि इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की रणनीति सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक स्तर पर तैयार की गई हो सकती है। हालांकि इस संबंध में किसी भी दल की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
फिलहाल बिहार की राजनीति में तेजी से बदलते समीकरणों के बीच यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दल किस तरह अपनी रणनीति तय करते हैं और इसका आगामी चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ता है।


