मुजफ्फरपुर |बिहार की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाली एक अनोखी घटना सामने आई है। जिले के चर्चित मानवाधिकार अधिवक्ता एस.के. झा ने एक ऐसे दारोगा का गयाजी में विधिवत श्राद्ध और पिंडदान कर दिया, जो आज भी जिंदा है, लेकिन अदालत के रिकॉर्ड में मृत दर्ज है।
यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि 14 साल पुरानी एक ‘भिष्म प्रतिज्ञा’ का प्रतीकात्मक अंत है।
कैसे बना जिंदा आदमी ‘मृत’
करीब 14 साल पहले, तत्कालीन दारोगा रामचंद्र सिंह ने कोर्ट में अपना ही डेथ सर्टिफिकेट दाखिल कर दिया।
उसने मानवाधिकार अधिवक्ता एस.के. झा को चुनौती दी थी—
“जो कर सकते हो, कर लो… मुझे कभी जिंदा साबित नहीं कर पाओगे।”
इसके बाद वह प्रशासनिक रिकॉर्ड में ‘ट्रेसलेस’ हो गया।
जनेऊ तोड़कर ली थी कसम
इस धोखे और न्यायिक अन्याय से आहत होकर अधिवक्ता झा ने अपना जनेऊ तोड़ दिया और संकल्प लिया—
“जब तक रामचंद्र सिंह को जिंदा साबित नहीं कर दूंगा, जनेऊ नहीं पहनूंगा।”
12 साल की तलाश के बाद जब उन्होंने उसे ढूंढ़ निकाला, तब जाकर दोबारा जनेऊ धारण किया।
फिर भी रिकॉर्ड में ‘मृत’… इसलिए श्राद्ध
हालांकि, दारोगा आज भी अदालत के कागजों में मृत ही है।
इसी कारण अपनी 14 साल पुरानी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए अधिवक्ता झा ने गयाजी में उसका विधिवत श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोज कराया।
झा कहते हैं—
“यह श्राद्ध किसी आत्मा के लिए नहीं, बल्कि उस सिस्टम के लिए है, जो जिंदा को मरा और निर्दोष को अपराधी बना देता है।”
कहानी की शुरुआत: झूठा रेप केस
मामला 2012 का है।
मुजफ्फरपुर के अहियापुर थाना क्षेत्र के नेउरी गांव निवासी शिक्षक अनंत राम को झूठे रेप केस में फंसा दिया गया।
जांच अधिकारी थे—दारोगा रामचंद्र सिंह।
गलत जांच के आधार पर शिक्षक को जेल भेजा गया और चार्जशीट दाखिल कर दी गई।
कोर्ट में खुलने वाली थी पोल, दारोगा ‘मर’ गया
जब ट्रायल में सच्चाई सामने आई और कोर्ट ने दारोगा को गवाही के लिए बुलाया, तब उसने चाल चली।
उसने 2009 का फर्जी डेथ सर्टिफिकेट कोर्ट में दाखिल कर दिया, जबकि उसी ने 2012 में केस की जांच की थी।
अधिवक्ता झा ने सवाल उठाया—
“जो 2009 में मर चुका, वह 2012 में जांच कैसे कर सकता है?”
फिर भी निर्दोष को मिली 7 साल की सजा
जांच के आदेश के बाद दारोगा ने ट्रांसफर करवा लिया और फिर गायब हो गया।
विभाग भी “कोई जानकारी नहीं” कहकर पल्ला झाड़ता रहा।
इस बीच, उसी गलत जांच के आधार पर शिक्षक अनंत राम को 7 साल की सजा सुना दी गई।
बाद में पटना हाई कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर नौकरी भी वापस दिलाई।
आज भी जिंदा है ‘मरा’ दारोगा
रामचंद्र सिंह अरवल जिले के कुर्था थाना क्षेत्र के गौहरा गांव का रहने वाला है और वर्तमान में पटना में रह रहा है।
लेकिन कोर्ट के कागजों में वह आज भी मृत है।
एक श्राद्ध, हजार सवाल
अधिवक्ता एस.के. झा कहते हैं—
“जब तक सिस्टम नहीं जागेगा, तब तक ऐसे श्राद्ध होते रहेंगे। यह इंसाफ नहीं, एक चेतावनी है।”
यह घटना न सिर्फ अनोखी है, बल्कि न्याय व्यवस्था के लिए एक करारा आईना भी है।


