गांधी मैदान में खेती का ‘हाई-टेक’ महाकुंभ! ‘एग्रो बिहार-2026’ का आगाज; 91 तरह के यंत्रों पर भारी छूट, अब बटन दबाते ही लहलहाएगी फसल

HIGHLIGHTS:

  • ग्रैंड ओपनिंग: कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने किया राज्य स्तरीय कृषि यांत्रीकरण मेले का उद्घाटन।
  • तारीख नोट कर लें: 15 मार्च तक चलेगा मेला; 2 लाख वर्ग फीट में सजे 100 से ज्यादा स्टॉल।
  • सब्सिडी का ‘सुपर’ ऑफर: 91 प्रकार के कृषि यंत्रों पर सरकार दे रही है अनुदान; सीधे खाते में आएगा पैसा (DBT)।
  • देशभर का संगम: हरियाणा से गुजरात और पंजाब से बंगाल तक के मशीन निर्माता पटना में मौजूद।

गांधी मैदान में ‘नया बिहार-नई खेती’: आधुनिक मशीनों का लगा जमावड़ा

पटना: क्या बिहार का किसान अब ‘स्मार्ट किसान’ बनने के लिए तैयार है? जवाब पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में मिल रहा है। गुरुवार को ‘एग्रो बिहार-2026’ का शानदार आगाज हुआ। कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने फीता काटकर इस मेले की शुरुआत की। मंत्री ने साफ कर दिया कि सरकार का लक्ष्य अब पुरानी पद्धति को पीछे छोड़कर तकनीक के जरिए किसानों की जेब भरना है।

मशीनें पंजाब की, तकनीक गुजरात की और फायदा बिहार के किसान का!

​मंत्री राम कृपाल यादव ने कहा कि इस मेले में सिर्फ बिहार के ही नहीं, बल्कि हरियाणा, पंजाब, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्यों के निर्माता भी अपने अत्याधुनिक औजार लेकर आए हैं।

  • सीधा फायदा: सरकार इन यंत्रों पर अनुदान दे रही है, और भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म करने के लिए पैसे सीधे DBT के जरिए किसान के बैंक खाते में भेजे जा रहे हैं।
  • छोटे किसानों का ध्यान: कृषि प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने बताया कि जिनके पास कम जमीन है, उनके लिए हर जिले में ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ बनाए जा रहे हैं, जहाँ से वे भाड़े पर मशीनें ले सकेंगे।

70% आबादी का ‘इकोनॉमिक गेम-चेंजर’

​भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के बिहार अध्यक्ष गौरव साह ने डेटा देते हुए बताया कि बिहार की 70% आबादी खेती पर टिकी है। ऐसे में एग्रीकल्चर इनोवेशन अब पसंद नहीं, बल्कि जरूरत है। कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव ने जोड़ा कि खेती को ‘लाभकारी’ बनाने के लिए यांत्रीकरण ही एकमात्र रास्ता है।

VOB का नजरिया: मशीनों की चमक में ‘गरीब किसान’ न रह जाए पीछे!

गांधी मैदान में चमकती हुई बड़ी मशीनें देखना सुखद है, लेकिन चुनौती उन्हें छोटे किसानों तक पहुँचाने की है। बिहार के अधिकांश किसानों के पास ‘एकड़’ नहीं बल्कि ‘कट्ठा’ में जमीन है। ‘क्लस्टर खेती’ की बात तो कागजों पर अच्छी है, लेकिन धरातल पर किसानों को एकजुट करना बड़ी चुनौती होगी। 91 यंत्रों पर अनुदान की खबर अच्छी है, बस उम्मीद है कि ‘कस्टम हायरिंग सेंटर’ की व्यवस्था वैसी ही दुरुस्त रहे जैसे मेले के स्टॉल।

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