HIGHLIGHTS: स्थापना के 114वें वर्ष में बिहार का ‘महा-उत्सव’; शून्य से लेकर सतरंगी संस्कृति तक का सफर
- गौरवशाली 114 वर्ष: 22 मार्च 1912 को बंगाल से अलग होकर अपनी पहचान बनाने वाला बिहार कल अपना 114वां स्थापना दिवस मना रहा है।
- नाम की महिमा: ‘विहार’ से ‘बिहार’ बनने की वह यात्रा जो बुद्ध और महावीर के शांति संदेश से शुरू हुई।
- अजेय विरासत: नालंदा की शिक्षा, लिच्छवी का लोकतंत्र और आर्यभट्ट का ‘शून्य’—यही बिहार की वैश्विक पहचान है।
पटना/लखनऊ | 21 मार्च, 2026
कल जब पूरा बिहार 114वें स्थापना दिवस के जश्न में डूबा होगा, तब डॉ. नंदकिशोर साह (मिशन मैनेजर, उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन) का यह आलेख हमें हमारी जड़ों की गहराई याद दिलाएगा। डॉ. साह ने बड़ी बेबाकी से लिखा है कि बिहार का इतिहास केवल तारीखों का नहीं, बल्कि सभ्यता के निर्माण का इतिहास है।
विभाजन की चोट और सृजन की शक्ति
डॉ. साह अपने लेख में स्पष्ट करते हैं कि राजनीतिक कारणों से बिहार 1912, 1936 और 2000 में विभाजित तो हुआ, लेकिन इसकी मेधा (Intellect) कभी नहीं बंटी। आज भी चाहे वह साहित्य हो या विज्ञान, ‘बिहारी मेधा’ पूरी दुनिया का नेतृत्व कर रही है।
महापुरुषों का वंदन
- क्रांति और कलम: बाबू वीर कुँवर सिंह की तलवार से लेकर दिनकर की ‘रश्मिरथी’ तक, बिहार ने हर युग को नायक दिए हैं।
- अध्यात्म और दर्शन: यह माता सीता की जन्मभूमि है और बुद्ध को ‘बुद्धत्व’ प्रदान करने वाली पवित्र धरा भी।
VOB का नजरिया: 114 साल का यह ‘बिहारी’ स्वाभिमान!
डॉ. नंदकिशोर साह का यह आलेख आज के युवाओं के लिए एक ‘एंथम’ की तरह है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि 114 साल की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि साधन कम होने के बावजूद हम ‘साधना’ में कभी पीछे नहीं रहे।
डॉ. साह ने बिल्कुल सटीक कहा है कि “बिहारी” शब्द कोई गाली नहीं, बल्कि सम्मान का वह तमगा है जो हमें विरासत में मिला है। चाहे वह मिथिला की पेंटिंग हो या मगध की राजनीति, बिहार हमेशा से ‘विश्वगुरु’ की भूमिका में रहा है।


