ओलपुरा में ‘मातम की गंगा’! एक साथ जलीं तीन सगे-चचेरे भाइयों की चिताएं; दिल्ली से लौटकर ‘अंडा’ बेच रहा था सनी, उजड़ गया हंसता-खेलता परिवार

HIGHLIGHTS:

  • हृदयविदारक: घोघा के कटरिया गंगा घाट पर हुए हादसे ने ओलपुरा गांव को दिया कभी न भूलने वाला जख्म।
  • वंश खत्म: शालीग्राम साह के दोनों बेटों की मौत, परिवार में अब कोई वारिस नहीं बचा।
  • अंतिम विदाई: भाई मनीष ने कांपते हाथों से दी तीन भाइयों को मुखाग्नि; घाट पर मौजूद हर शख्स की आंखें हुईं नम।

खुशियां बनीं ‘राख’: एक ही आंगन से उठीं तीन अर्थियां

भागलपुर: कहते हैं कि काल कब और किस रूप में आएगा, कोई नहीं जानता। घोघा के कटरिया गंगा तट पर बुधवार को जो हुआ, उसने न केवल तीन परिवारों के चिराग बुझा दिए, बल्कि पूरे ओलपुरा गांव की रूह कंपा दी है। शालीग्राम साह और नंदलाल साह के घर में दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा है कि चीख-पुकार सुनकर पत्थर का दिल भी पिघल जाए। जिस घर में कल तक शादी-ब्याह की चर्चाएं होती थीं, वहां आज केवल सिसकियां और गहरा सन्नाटा पसरा है।

[हादसे का शिकार हुए तीन ‘जांबाज’]

नाम

पिता का नाम

स्थिति

सनी देवल

शालीग्राम साह

अविवाहित, परिवार का बड़ा सहारा

बॉबी देवल

शालीग्राम साह

छोटा भाई, पिता का हाथ बंटाता था

कृष्णा उर्फ छोटू

नंदलाल साह

चचेरा भाई, दिल्ली में करता था काम

दिल्ली से लौटा था ‘सनी देवल’, गांव में ठेला लगाकर पाल रहा था मां-बाप

​हादसे की सबसे मार्मिक कहानी सनी देवल की है। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद वह भी अपने भाइयों की तरह दिल्ली में मजदूरी करता था। लेकिन कुछ महीनों पहले ही वह अपने बूढ़े माता-पिता की सेवा के लिए गांव लौट आया था।

  • मेहनतकश: वह गांव में ठेला लगाकर अंडा बेचने का काम करता था।
  • जिम्मेदारी: वह चाहता था कि घर की आर्थिक स्थिति सुधरे, लेकिन गंगा की लहरों ने उसके तमाम सपनों को लील लिया।

एक भाई… तीन चिताएं: कलेजा चीर देने वाला दृश्य

​श्मशान घाट पर वो मंजर देखकर हर कोई स्तब्ध रह गया, जब नंदलाल साह के दूसरे पुत्र मनीष कुमार ने अपने सगे भाई कृष्णा और दोनों चचेरे भाइयों (सनी और बॉबी) को मुखाग्नि दी। एक साथ जलती तीन चिताओं की लपटों ने आसमान को भी काला कर दिया। लोग कह रहे थे— “भगवान ऐसा दिन किसी दुश्मन को भी न दिखाए।”

SDRF की ‘लेती-लतीफी’ या सूचना का अभाव?

​इस दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर प्रशासन और स्थानीय सूचना तंत्र की पोल खोल दी है।

    • 2 घंटे की देरी: घोघा में हादसा सुबह हुआ, लेकिन SDRF को इसकी सूचना करीब 2 घंटे बाद दी गई।
    • सर्च ऑपरेशन: देरी से सूचना मिलने के कारण रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुँच सकी।
    • पुराना पैटर्न: इससे पहले बिहपुर की घटना में भी सूचना देने में देरी हुई थी, जिससे सर्च ऑपरेशन प्रभावित हुआ था।

VOB का नजरिया: आस्था के घाटों पर मौत का पहरा कब तक?

ओलपुरा के इन तीन नौजवानों ने अपनी ‘फुआ’ की जान बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। यह उनकी जांबाजी तो है, लेकिन प्रशासन के लिए एक बड़ा सवाल भी है। क्या घाटों पर सुरक्षा और SDRF को तत्काल सूचना देने के लिए कोई ‘क्विक रिस्पॉन्स सिस्टम’ नहीं बन सकता? सनी देवल जैसा होनहार युवक जो अपना घर चलाने के लिए संघर्ष कर रहा था, उसका चला जाना समाज की बड़ी क्षति है।

  • Related Posts