
नई दिल्ली: पेपर लीक और प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर संसद से लेकर जंतर-मंतर तक सियासी घमासान जारी है। इसी बीच केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कांग्रेस और विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब सरकार संसद में इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, तब विपक्ष सड़क पर प्रदर्शन कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बचने की कोशिश कर रहा है।
‘क्या यही सांसद धर्म है?’
समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में भूपेंद्र यादव ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों की पहली जिम्मेदारी संसद में जनता की आवाज उठाना है।
उन्होंने सवाल किया, “क्या आप सांसद के रूप में अपनी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं? क्या आप युवाओं के इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन में स्वस्थ बहस के लिए तैयार हैं?”
‘सरकार चर्चा चाहती है, विपक्ष टाल रहा है’
भूपेंद्र यादव ने कहा कि केंद्र सरकार ने खुद संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा का प्रस्ताव रखा है। सरकार हर सवाल का जवाब देने और अपना पक्ष रखने के लिए तैयार है, लेकिन विपक्ष बहस से बचते हुए सड़कों पर राजनीति कर रहा है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में समस्याओं का स्थायी समाधान नारेबाजी से नहीं, बल्कि संसद के भीतर गंभीर और रचनात्मक चर्चा से निकलता है।
पेपर लीक पर सरकार का सख्त कानून
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार केवल बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस कदम भी उठा रही है। उन्होंने लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 का उल्लेख करते हुए कहा कि पेपर लीक और परीक्षा में धांधली रोकने के लिए देश में सख्त कानूनी व्यवस्था लागू की गई है।
इस कानून के तहत:
- पेपर लीक और संगठित परीक्षा अपराध में 5 से 10 साल तक की जेल का प्रावधान।
- दोषियों पर 1 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती श्रेणी में शामिल किए गए हैं।
सड़क बनाम संसद की बहस तेज
पेपर लीक को लेकर एक ओर विपक्ष सरकार पर जवाबदेही तय करने और जांच एजेंसियों में सुधार की मांग कर रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि समाधान संसद के भीतर चर्चा और मजबूत कानूनों से ही निकलेगा।
भूपेंद्र यादव के ताजा बयान के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर राजनीतिक दलों को सड़क पर संघर्ष करना चाहिए या संसद के भीतर संवाद और बहस के जरिए समाधान तलाशना चाहिए।


