
भागलपुर में साहित्य, संवेदना और पारिवारिक मूल्यों से ओत-प्रोत एक भावपूर्ण काव्य संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें देश और समाज में माता-पिता के योगदान, पारिवारिक संस्कार, मानवीय रिश्तों और जीवन मूल्यों पर आधारित रचनाओं ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय साहित्यकार परिषद्, भागलपुर की मासिक साहित्यिक गोष्ठी के अंतर्गत स्थानीय आनंदमार्ग कॉलोनी स्थित माधुरी स्मृति साधना निवास में किया गया। यह विशेष आयोजन लोकगायक कपिल देव कृपाला के दिवंगत पिता छट्ठू ठाकुर की पुण्यतिथि के अवसर पर भावांजलि स्वरूप आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार महेंद्र प्रसाद निशाकर ने की। इस अवसर पर साहित्य, कविता, गीत और ग़ज़ल के माध्यम से माता-पिता के त्याग, समर्पण और उनके जीवन मूल्यों को याद किया गया। विभिन्न कवियों और साहित्यकारों ने अपनी-अपनी रचनाओं के जरिए यह संदेश दिया कि माता-पिता का स्थान जीवन में सर्वोच्च होता है और उनके संघर्ष तथा प्रेम को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना संभव नहीं है।
कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना और स्वागत गीत के साथ हुई। लोकगायक कपिल देव कृपाला ने अपनी मधुर प्रस्तुति से वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद उन्होंने अपने पिता की स्मृति को समर्पित भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया। उन्होंने अपनी रचना में माता और पिता के जीवन में महत्व को बेहद संवेदनशील शब्दों में व्यक्त किया। उनकी प्रस्तुति ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया और पूरे सभागार में लंबे समय तक तालियां गूंजती रहीं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वरिष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि और प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका के संपादक कुमार भागलपुरी ने अपनी विशिष्ट शैली में हास्य-व्यंग्य की प्रस्तुति दी। उनकी रचना ने श्रोताओं को हंसने पर मजबूर कर दिया। गंभीर साहित्यिक माहौल के बीच उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम में हल्कापन और मनोरंजन का सुंदर संतुलन स्थापित किया।
विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित गोपाल सिंह नेपाली आंदोलन के राष्ट्रीय प्रणेता पारस कुंज ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से बिछड़ने की पीड़ा, स्मृतियों और भावनाओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में मानवीय संवेदनाओं की गहराई स्पष्ट दिखाई दी। उन्होंने बताया कि किसी प्रियजन की याद केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह जीवनभर मन में एक अहसास बनकर साथ चलती है।
कार्यक्रम में एक अन्य विशिष्ट अतिथि नरेश ठाकुर निराला ने मां के प्रेम और त्याग पर आधारित कविता सुनाई। उनकी रचना में मां के निस्वार्थ स्नेह, संघर्ष और ममता का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया। कविता के माध्यम से उन्होंने बताया कि मां स्वयं अपने दुखों को भुलाकर हमेशा अपने बच्चों की खुशियों को प्राथमिकता देती है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे महेंद्र प्रसाद निशाकर ने अपने संबोधन और कविता में पिता के संघर्ष, त्याग और जीवन निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की नींव माता-पिता के संस्कारों और उनके अथक परिश्रम पर टिकी होती है। उनकी कविता में पिता को जीवन का आधार और प्रेरणा का स्रोत बताया गया।
कार्यक्रम का संचालन अभय कुमार भारती ने किया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए जीवनभर कठिन परिश्रम करते हैं। उन्होंने कविता के माध्यम से बताया कि संतानों की खुशियों के लिए माता-पिता हर कठिनाई का सामना करते हैं और अपने सपनों का भी त्याग कर देते हैं।
सेवानिवृत्त रेलकर्मी सुनील कुमार पटेल ने भी माता-पिता के महत्व पर आधारित अपनी कविता प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि जहां मां बच्चों के जीवन की आत्मा होती है, वहीं पिता उनकी पहचान और आत्मविश्वास का आधार बनते हैं। उनकी प्रस्तुति को भी श्रोताओं ने खूब सराहा।
भोजपुरी कवि गणेश ठाकुर अकेला ने जीवन दर्शन पर आधारित अपनी रचना सुनाई। उन्होंने सरल और प्रभावशाली भाषा में जीवन की अस्थिरता, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक सोच को प्रस्तुत किया। उनकी कविता ने श्रोताओं को जीवन की वास्तविकताओं पर सोचने के लिए प्रेरित किया।
साहित्यकार सच्चिदानंद किरण ने पिता के संघर्ष और उनके सपनों पर आधारित कविता प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि एक पिता अपने पूरे जीवन में परिवार की खुशियों और बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करता है। उनकी रचना में पारिवारिक जिम्मेदारियों और भावनात्मक संबंधों का सजीव चित्रण देखने को मिला।
कार्यक्रम में जयंत जलद ने प्रेम और मानवीय रिश्तों पर आधारित रचना प्रस्तुत की। वहीं अजीत कुमार शांत ने प्रकृति और मानसून पर केंद्रित कविता सुनाकर श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया। नवोदित कवि रामजी वृंदावनी ने पिता की सुरक्षा, मार्गदर्शन और स्नेह को अपनी कविता का विषय बनाया। उनकी प्रस्तुति को भी श्रोताओं ने सराहा और युवा कवि के रूप में उनके प्रयास की प्रशंसा की गई।
पूरे कार्यक्रम के दौरान साहित्यकारों ने यह संदेश दिया कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच भी परिवार, संस्कार और मानवीय रिश्तों का महत्व कम नहीं होना चाहिए। माता-पिता के प्रति सम्मान, उनके संघर्षों की समझ और उनके प्रति कृतज्ञता समाज को मजबूत बनाने की सबसे बड़ी आधारशिला है। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने और मानवीय मूल्यों को जीवित रखने का प्रभावी साधन भी है।
काव्य संध्या में शहर के अनेक साहित्यकार, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे। सभी ने कवियों की प्रस्तुतियों को ध्यानपूर्वक सुना और समय-समय पर तालियों की गड़गड़ाहट से उनका उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम का वातावरण पूरी तरह साहित्यिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक बना रहा।
कार्यक्रम के अंत में आयोजक अधिवक्ता नितीश कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों, कवियों और उपस्थित साहित्य प्रेमियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन समाज में साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ-साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत और पारिवारिक मूल्यों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, लेकिन कविताओं में व्यक्त भावनाएं और माता-पिता के प्रति सम्मान का संदेश उपस्थित लोगों के मन में लंबे समय तक गूंजता रहा। यह काव्य संध्या साहित्य, संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों का एक यादगार संगम बनकर सामने आई।


