सबौर कृषि विश्वविद्यालय में धान रोपनी प्रशिक्षण का आयोजन, कुलपति ने छात्रों के साथ खेत में उतरकर दिया व्यावहारिक कृषि शिक्षा का संदेश

भागलपुर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में कृषि शिक्षा को व्यवहारिक अनुभव से जोड़ने की दिशा में एक प्रेरणादायक पहल देखने को मिली। विश्वविद्यालय परिसर के कृषि प्रक्षेत्र में आयोजित धान रोपनी प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह स्वयं खेत में उतरे और छात्र-छात्राओं तथा वैज्ञानिकों के साथ धान की रोपाई में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों से धान की खेती से जुड़े महत्वपूर्ण तकनीकी प्रश्न पूछे और उन्हें खेती के वैज्ञानिक तरीकों को व्यवहार में अपनाने की सलाह दी।

कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर उन्हें खेत में काम करने का प्रत्यक्ष अनुभव देना था, ताकि भविष्य में वे आधुनिक कृषि तकनीकों को बेहतर ढंग से समझ सकें और किसानों तक प्रभावी तरीके से पहुंचा सकें। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि कृषि शिक्षा तभी सार्थक होगी, जब छात्र खेत में उतरकर फसलों की वास्तविक परिस्थितियों को समझेंगे।

खेत में उतरे कुलपति, छात्रों का बढ़ाया उत्साह

धान रोपनी कार्यक्रम के दौरान कुलपति डॉ. डी.आर. सिंह ने विश्वविद्यालय के कृषि प्रक्षेत्र में पहुंचकर स्वयं धान की रोपाई की। उनके साथ स्नातक के चतुर्थ एवं षष्ठम सेमेस्टर के छात्र-छात्राओं के अलावा सस्य विज्ञान विभाग के एमएससी और पीएचडी शोधार्थियों ने भी खेत में उतरकर रोपाई कार्य किया।

कुलपति को छात्रों के साथ खेत में काम करते देखकर विद्यार्थियों में विशेष उत्साह देखने को मिला। कई छात्रों ने इसे अपने शैक्षणिक जीवन का यादगार अनुभव बताया। उनका कहना था कि जब विश्वविद्यालय का सर्वोच्च अधिकारी स्वयं खेत में उतरकर प्रशिक्षण देता है तो छात्रों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

धान की खेती से जुड़े तकनीकी सवाल पूछे

कार्यक्रम के दौरान कुलपति ने केवल औपचारिक निरीक्षण तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि विद्यार्थियों से धान की खेती से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी पूछे।

उन्होंने छात्रों से पूछा कि धान की रोपाई कितनी दूरी पर करनी चाहिए, एक स्थान पर कितने पौधे लगाए जाने चाहिए, रोपाई के लिए कितने दिनों की पौध उपयुक्त मानी जाती है तथा अच्छी उपज के लिए किन बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।

छात्रों ने इन सभी प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर दिया, जिससे कुलपति ने प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह देखकर खुशी होती है कि विद्यार्थी सैद्धांतिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक जानकारी भी प्राप्त कर रहे हैं।

कृषि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं

छात्रों को संबोधित करते हुए कुलपति ने कहा कि कृषि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना या डिग्री प्रदान करना नहीं है। वास्तविक कृषि शिक्षा वही है जो छात्रों को खेती के वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ-साथ व्यवहारिक अनुभव भी प्रदान करे।

उन्होंने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल पढ़ाई कराना नहीं, बल्कि ऐसे कृषि विशेषज्ञ तैयार करना है जो खेत की समस्याओं को समझें और किसानों को वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध करा सकें।

धान बिहार की प्रमुख फसल

कार्यक्रम के दौरान कुलपति ने धान की खेती के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि बिहार सहित देश के अधिकांश राज्यों में धान प्रमुख खाद्यान्न फसल है और लाखों किसान परिवारों की आजीविका इसी पर आधारित है।

उन्होंने बताया कि यदि धान की खेती वैज्ञानिक पद्धति से की जाए तो उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। इसके लिए समय पर रोपाई, उचित दूरी, स्वस्थ पौध और खेत की सही तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है।

‘कर के सीखो’ मॉडल पर दिया जोर

कुलपति ने कहा कि कृषि शिक्षा में “कर के सीखो” यानी Learning by Doing की अवधारणा सबसे अधिक प्रभावी है। जब विद्यार्थी स्वयं खेत में काम करते हैं तो उन्हें फसल उत्पादन की पूरी प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से समझ में आती है।

उन्होंने कहा कि केवल कक्षा में बैठकर कृषि विज्ञान की पढ़ाई करने से छात्र पूरी तरह दक्ष नहीं बन सकते। वास्तविक ज्ञान खेत में काम करने और अनुभव प्राप्त करने से ही विकसित होता है।

व्यावहारिक प्रशिक्षण से बढ़ेगी दक्षता

कुलपति ने छात्रों को सलाह दी कि वे प्रयोगात्मक कार्यों में अधिक से अधिक भाग लें। उन्होंने कहा कि भविष्य में चाहे वे वैज्ञानिक बनें, कृषि अधिकारी बनें या शोधकर्ता, सभी के लिए व्यावहारिक अनुभव अत्यंत आवश्यक होगा।

उन्होंने यह भी कहा कि किसान की समस्याओं को वही व्यक्ति बेहतर समझ सकता है जिसने स्वयं खेत में काम किया हो। इसलिए प्रत्येक छात्र को नियमित रूप से कृषि प्रक्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहिए।

वैज्ञानिकों को दिए विशेष निर्देश

कार्यक्रम के दौरान कुलपति ने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और शिक्षकों को भी निर्देश दिए कि केवल धान ही नहीं बल्कि अन्य प्रमुख फसलों की खेती पर भी इसी प्रकार के व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक फसल की खेती से जुड़े आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का प्रदर्शन खेतों में कराया जाए ताकि छात्र नई तकनीकों को प्रत्यक्ष रूप से सीख सकें।

उच्च शिक्षा के लिए किया प्रेरित

विद्यार्थियों से संवाद करते हुए कुलपति ने उन्हें उच्च शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित किया।

उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में शोध की अपार संभावनाएं हैं और नई तकनीकों के विकास से किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। इसलिए विद्यार्थियों को स्नातक के बाद उच्च शिक्षा और शोध कार्यों की ओर भी आगे बढ़ना चाहिए।

वैज्ञानिक और शिक्षक भी रहे मौजूद

इस विशेष कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कई वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और शिक्षक उपस्थित रहे। इनमें बीज एवं प्रक्षेत्र निदेशक डॉ. फिजा अहमद, स्नातकोत्तर अध्ययन के अधिष्ठाता एवं सस्य विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. संजय कुमार, प्रशासन निदेशक डॉ. राजेश कुमार तथा कृषि प्रक्षेत्र के प्रभारी डॉ. शम्भु प्रसाद सहित सस्य विज्ञान और पौधा प्रजनन विभाग के कई वैज्ञानिक एवं शिक्षक शामिल हुए।

सभी विशेषज्ञों ने विद्यार्थियों को धान रोपाई की आधुनिक तकनीकों, पौध चयन, खेत की तैयारी और उत्पादन बढ़ाने के वैज्ञानिक उपायों की जानकारी दी।

कृषि शिक्षा में नए प्रयोगों पर जोर

विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि बदलते समय के साथ कृषि शिक्षा में भी आधुनिक और व्यवहारिक बदलाव आवश्यक हैं। जलवायु परिवर्तन, नई तकनीक, उन्नत बीज और आधुनिक कृषि उपकरणों के बारे में छात्रों को प्रत्यक्ष प्रशिक्षण देकर ही उन्हें भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सकता है।

इसी सोच के तहत विश्वविद्यालय लगातार ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, जिनमें विद्यार्थी खेत, प्रयोगशाला और अनुसंधान कार्यों से सीधे जुड़ सकें।

किसानों के हित में तैयार होंगे कुशल कृषि विशेषज्ञ

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कृषि विश्वविद्यालयों में इस प्रकार की व्यवहारिक शिक्षा को नियमित रूप से बढ़ावा दिया जाए तो भविष्य में ऐसे कृषि विशेषज्ञ तैयार होंगे जो किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझकर उनका समाधान वैज्ञानिक तरीके से कर सकेंगे।

भागलपुर के बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में आयोजित धान रोपनी प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कुलपति का स्वयं छात्रों के साथ खेत में उतरना न केवल विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक रहा, बल्कि इसने यह भी स्पष्ट संदेश दिया कि कृषि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि खेती से जुड़े वैज्ञानिक और व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से दक्ष, संवेदनशील और नवाचार करने वाले कृषि विशेषज्ञ तैयार करना है।

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