भागलपुर में अंगीका भाषा पर मंथन, महोत्सव को सफल बनाने और पहचान दिलाने पर जोर

भागलपुर में अंगीका भाषा के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक पहचान को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान भाषा से जुड़े साहित्यकारों, कवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों से जुड़े लोगों ने एक मंच पर एकत्र होकर अंगीका भाषा के वर्तमान स्वरूप, उसकी चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की। कार्यक्रम में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि समृद्ध इतिहास, संस्कृति और साहित्यिक विरासत होने के बावजूद अंगीका भाषा को वह स्थान और पहचान अभी तक प्राप्त नहीं हो सकी है, जिसकी वह हकदार है।

यह बैठक भागलपुर के घंटाघर क्षेत्र स्थित एक निजी आवास पर आयोजित की गई, जहां अंगीका महासभा के बैनर तले बड़ी संख्या में भाषा प्रेमी और साहित्य जगत से जुड़े लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आगामी 24 और 25 अक्टूबर को प्रस्तावित अंगीका महोत्सव की तैयारियों की समीक्षा करना और उसे सफल बनाने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करना था। बैठक में मौजूद लोगों ने इस बात पर जोर दिया कि महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं होगा, बल्कि यह अंगीका भाषा और संस्कृति को नई पहचान दिलाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास साबित हो सकता है।

बैठक के दौरान वक्ताओं ने कहा कि अंगीका भाषा का इतिहास बेहद समृद्ध और गौरवशाली रहा है। सदियों से यह भाषा बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में बोली और समझी जाती रही है। इसके बावजूद समय के साथ इस भाषा का उपयोग सीमित होता गया और नई पीढ़ी के बीच इसका प्रभाव कम होने लगा। यही कारण है कि अब भाषा प्रेमियों और सांस्कृतिक संगठनों ने इसके संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए व्यापक अभियान चलाने की जरूरत महसूस की है।

कार्यक्रम में शामिल साहित्यकारों ने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। यदि भाषा कमजोर पड़ती है तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से दूर होती चली जाती हैं। ऐसे में अंगीका भाषा को बचाना केवल भाषाई दायित्व नहीं बल्कि सांस्कृतिक जिम्मेदारी भी है।

बैठक के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि आज भी कई लोग अंगीका भाषा को केवल बोलचाल की भाषा मानते हैं, जबकि इसके साहित्य, लोकगीत, लोककथाएं और सांस्कृतिक धरोहर इसे एक समृद्ध भाषा के रूप में स्थापित करते हैं। उन्होंने कहा कि अंगीका में रचित साहित्य और लोक परंपराएं इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की मांग है।

अंगीका महोत्सव को लेकर हुई चर्चा में कई सुझाव भी सामने आए। प्रतिभागियों ने कहा कि महोत्सव में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ साहित्यिक गोष्ठियां, कवि सम्मेलन, लोकगीत प्रस्तुतियां, नाटक और भाषा आधारित प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए। इससे युवाओं और विद्यार्थियों की भागीदारी बढ़ेगी और उन्हें अपनी मातृभाषा से जुड़ने का अवसर मिलेगा।

बैठक में मौजूद लोगों का मानना था कि यदि अंगीका भाषा को शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर प्रोत्साहन दिया जाए तो इसके विकास की संभावनाएं काफी बढ़ सकती हैं। उन्होंने स्कूलों और कॉलेजों में भाषा और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि युवाओं की भागीदारी के बिना किसी भी भाषा का भविष्य मजबूत नहीं हो सकता।

वक्ताओं ने डिजिटल युग में भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आधुनिक माध्यमों के उपयोग की भी वकालत की। उनका मानना था कि सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑनलाइन सामग्री के जरिए अंगीका भाषा को देश और दुनिया के बड़े वर्ग तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए साहित्यकारों, शिक्षकों और सांस्कृतिक संगठनों को मिलकर काम करने की जरूरत है।

बैठक में यह भी कहा गया कि अंगीका भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि इस क्षेत्र की पहचान और भावनाओं से जुड़ी हुई है। इसके शब्दों में यहां की मिट्टी की खुशबू, लोक जीवन की झलक और सामाजिक परंपराओं की गहराई दिखाई देती है। इसलिए इसे संरक्षित करना और आगे बढ़ाना समाज के हर वर्ग की जिम्मेदारी है।

मीडिया से बातचीत के दौरान कार्यक्रम से जुड़े वक्ताओं ने कहा कि अंगीका भाषा को जिस स्तर की मान्यता और पहचान मिलनी चाहिए थी, वह अब तक नहीं मिल पाई है। इसी कमी को दूर करने और भाषा को नई पहचान दिलाने के उद्देश्य से विभिन्न कार्यक्रमों और अभियानों का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि समाज के सभी वर्ग एकजुट होकर प्रयास करें तो आने वाले समय में अंगीका भाषा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।

आगामी अंगीका महोत्सव को लेकर भी व्यापक तैयारियों की चर्चा की गई। आयोजन समिति से जुड़े लोगों ने कहा कि महोत्सव को यादगार बनाने के लिए विभिन्न जिलों से साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक समूहों को आमंत्रित किया जाएगा। इसके माध्यम से अंगीका संस्कृति की विविधता और समृद्ध परंपराओं को लोगों के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

कार्यक्रम में शामिल कवियों और साहित्यकारों ने इस अवसर पर भाषा के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना था कि यदि समाज अपनी मातृभाषा के प्रति जागरूक होगा तो उसकी सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत होगी। उन्होंने लोगों से अपने घरों और परिवारों में अंगीका भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देने की अपील भी की।

बैठक के दौरान उपस्थित लोगों ने दिवंगत समाजसेवी और भाषा प्रेमी प्रवीण सिंह कुशवाहा को श्रद्धांजलि अर्पित की। सभी ने उनकी स्मृति में दो मिनट का मौन रखकर उन्हें याद किया और भाषा तथा समाज के लिए उनके योगदान को सम्मानपूर्वक स्मरण किया। वक्ताओं ने कहा कि अंगीका भाषा और संस्कृति के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने यह संकल्प लिया कि अंगीका भाषा को नई पहचान दिलाने के लिए प्रयासों को और तेज किया जाएगा। साथ ही आगामी अंगीका महोत्सव को सफल बनाने के लिए समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने पर भी सहमति बनी।

भागलपुर में आयोजित यह विचार गोष्ठी केवल एक बैठक तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह अंगीका भाषा के भविष्य को लेकर गंभीर चिंतन और सामूहिक प्रयास का प्रतीक बनकर सामने आई। भाषा प्रेमियों को उम्मीद है कि ऐसे आयोजनों के माध्यम से अंगीका को नई पहचान मिलेगी और आने वाले समय में यह भाषा अपने समृद्ध साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के साथ और अधिक मजबूती से स्थापित होगी।

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