
पटना | पटना हाई कोर्ट ने शराबबंदी कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ मुंह से शराब की गंध आने के आधार पर किसी सरकारी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए बर्खास्त किए गए पुलिस अधिकारी की बहाली का आदेश बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा कि:
“केवल मुंह से शराब की गंध आना इस बात का निर्णायक प्रमाण नहीं है कि व्यक्ति ने शराब का सेवन किया है।”
अदालत ने माना कि इस आधार पर की गई विभागीय कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
मामला पुलिस अधिकारी धर्मराज सिंह से जुड़ा है, जिन्होंने करीब 32 वर्षों तक पुलिस विभाग में सेवा दी थी। घटना के समय वह मोतिहारी पुलिस लाइन में रिजर्व फोर्स में ASI के पद पर तैनात थे।
औचक निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने आरोप लगाया कि उनके मुंह से शराब की गंध आ रही थी। इसके बाद उन्हें हिरासत में लेकर ब्रेथ एनालाइजर टेस्ट कराया गया और विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि:
- ब्रेथ एनालाइजर रिपोर्ट में शराब की मात्रा का उल्लेख नहीं था।
- ब्लड या यूरिन टेस्ट नहीं कराया गया।
- रिपोर्ट तैयार करने वाले डॉक्टर की गवाही भी नहीं हुई।
- विभागीय जांच में रिपोर्ट का समुचित परीक्षण नहीं किया गया।
‘दवाइयों की वजह से थी गंध’
धर्मराज सिंह ने विभागीय जवाब में कहा था कि वे खांसी की दवा और अन्य दवाएं ले रहे थे, जिनकी वजह से उनके मुंह से अल्कोहल जैसी गंध आ रही थी। हालांकि विभाग ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और उन्हें बर्खास्त कर दिया।
राज्य सरकार की अपील खारिज
हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य किसी भी तरह से शराब सेवन को सिद्ध नहीं करते। ऐसे में केवल संदेह या अधूरी रिपोर्ट के आधार पर सेवा से बर्खास्त करना उचित नहीं है।
इसी आधार पर अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और बर्खास्त पुलिस अधिकारी की बहाली का आदेश बरकरार रखा।
यह फैसला भविष्य में शराबबंदी कानून से जुड़े विभागीय मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है।


