
भागलपुर जिले के पीरपैंती प्रखंड अंतर्गत रिफातपुर-सीमानपुर पंचायत का वंशीचक गांव आज भी उन ग्रामीण इलाकों की तस्वीर पेश करता है, जहां विकास के दावे और जमीनी हकीकत के बीच गहरी खाई दिखाई देती है। देश में डिजिटल इंडिया, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण संपर्क मार्गों के विस्तार की बात लगातार हो रही है, लेकिन करीब 800 की आबादी वाला यह गांव अब भी एक पक्की सड़क के इंतजार में वर्षों से उम्मीद लगाए बैठा है।
आजादी के लगभग आठ दशक बीत जाने के बावजूद गांव तक पहुंचने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित सड़क उपलब्ध नहीं है। ग्रामीणों को खेतों की पगडंडियों और कच्चे रास्तों के सहारे आवागमन करना पड़ता है। गर्मी के मौसम में यह रास्ता किसी तरह उपयोग में आ जाता है, लेकिन बरसात शुरू होते ही हालात पूरी तरह बदल जाते हैं। थोड़ी सी बारिश भी गांव के संपर्क मार्ग को कीचड़ और जलजमाव में बदल देती है, जिससे आवाजाही लगभग असंभव हो जाती है।
गांव के लोगों का कहना है कि बारिश के दिनों में वंशीचक किसी द्वीप की तरह अलग-थलग पड़ जाता है। मुख्य सड़क तक पहुंचना कठिन हो जाता है और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर बुजुर्गों और महिलाओं तक सभी को इस समस्या का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
सबसे अधिक परेशानी शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों को होती है। गांव के छात्र-छात्राओं को प्रतिदिन कीचड़ भरे रास्तों और पानी से भरे गड्ढों को पार कर विद्यालय पहुंचना पड़ता है। कई बार बच्चे फिसलकर गिर जाते हैं, जिससे उनकी किताबें और स्कूल सामग्री भी खराब हो जाती है। बरसात के दिनों में अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से भी डरते हैं, क्योंकि रास्ते की स्थिति दुर्घटना को आमंत्रण देती है।
शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं पर भी इस समस्या का गंभीर असर पड़ रहा है। यदि गांव में कोई व्यक्ति अचानक बीमार पड़ जाए या किसी गर्भवती महिला को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता हो, तो स्थिति और अधिक चिंताजनक हो जाती है। एंबुलेंस सेवा गांव तक नहीं पहुंच पाती और चारपहिया वाहन भी रास्ते की खराब स्थिति के कारण अंदर नहीं जा सकते।
ऐसे में ग्रामीणों को मरीजों को खटिया या अस्थायी साधनों पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है, जहां से आगे वाहन की व्यवस्था की जाती है। कई बार इस प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है, जिससे मरीज की स्थिति गंभीर होने का खतरा बढ़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं के इस दौर में ऐसी परिस्थितियां बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
गांव तक पहुंचने वाले रास्ते में दो स्थानों पर बांस की चचरी से बने अस्थायी पुल मौजूद हैं। ये पुल बरसात के मौसम में अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं या बह जाते हैं। पुल टूटने के बाद ग्रामीणों को कई दिनों तक भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन पुलों की मरम्मत के लिए किसी सरकारी सहायता का इंतजार करने के बजाय गांव के लोग आपस में चंदा इकट्ठा कर खुद ही मरम्मत का काम करवाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है। सड़क निर्माण को लेकर समय-समय पर आश्वासन जरूर मिले, लेकिन जमीन पर कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी। कई बार अधिकारियों द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि सड़क निर्माण के लिए पर्याप्त सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ पा रही है।
हालांकि ग्रामीण इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका कहना है कि वे लंबे समय से गैरमजरुआ भूमि और खेतों के किनारे बने रास्तों का उपयोग कर रहे हैं। यदि प्रशासन और संबंधित विभाग गंभीरता से प्रयास करें, तो सड़क निर्माण के लिए समाधान निकाला जा सकता है।
गांव के निवासी विनय कुमार ने बताया कि बरसात के मौसम में स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि गांव से बाहर जाना और वापस लौटना किसी चुनौती से कम नहीं होता। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इलाज या किसी आवश्यक कार्य से भागलपुर जाता है और देर रात वापस लौटता है, तो कई बार वह गांव तक पहुंचने का जोखिम नहीं उठाता।
अंधेरे, खराब रास्ते और पानी से भरे मार्ग के कारण लोग रेलवे स्टेशन या परिचितों के घर रुकने के लिए मजबूर हो जाते हैं। उनका कहना है कि यह स्थिति केवल असुविधा नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन की एक बड़ी समस्या बन चुकी है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि सड़क की कमी केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर गांव के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर भी पड़ रहा है। खराब संपर्क मार्ग के कारण गांव में व्यापारिक गतिविधियां सीमित हैं और रोजगार के अवसर भी प्रभावित हो रहे हैं।
गांव की महिलाओं ने बताया कि कई बार बाजार तक पहुंचने या आवश्यक सामान खरीदने के लिए भी उन्हें लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। बरसात के दिनों में यह परेशानी और बढ़ जाती है। वहीं किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में अतिरिक्त खर्च और समय लगाना पड़ता है।
सड़क नहीं होने का असर सामाजिक रिश्तों पर भी दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों के अनुसार कई परिवार इस गांव में वैवाहिक संबंध बनाने से हिचकिचाते हैं। विवाह के प्रस्ताव केवल इसलिए वापस हो जाते हैं क्योंकि लोगों को गांव तक पहुंचने में कठिनाई होती है। इससे गांव के युवाओं और परिवारों को सामाजिक स्तर पर भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
गांव के लोगों का कहना है कि एक विकसित समाज की पहचान केवल बिजली और मोबाइल नेटवर्क से नहीं होती, बल्कि सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से होती है। जब तक गांवों को मजबूत संपर्क मार्गों से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक वास्तविक विकास की कल्पना अधूरी रहेगी।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, अनुमंडल प्रशासन और संबंधित विभागों से जल्द से जल्द वंशीचक गांव को पक्की सड़क से जोड़ने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि इस दिशा में शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि सड़क निर्माण का कार्य शुरू हो जाए, तो गांव के बच्चों की शिक्षा, किसानों की आय, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और सामाजिक गतिविधियों में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। इससे गांव का विकास तेज होगा और लोगों का जीवन स्तर भी बेहतर बनेगा।
देश तेजी से आधुनिकता और तकनीकी प्रगति की ओर बढ़ रहा है। सरकारें विकसित भारत का सपना साकार करने की दिशा में लगातार काम कर रही हैं। ऐसे समय में वंशीचक जैसे गांव यह सवाल खड़ा करते हैं कि आखिर ग्रामीण विकास की योजनाओं का लाभ अब तक यहां क्यों नहीं पहुंच पाया।
अब गांव के लोग प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। उनकी मांग केवल एक सड़क की नहीं, बल्कि उस बुनियादी सुविधा की है जो उन्हें मुख्यधारा से जोड़ सके और उनके जीवन को नई दिशा दे सके। आने वाले दिनों में प्रशासन इस समस्या को किस गंभीरता से लेता है, इस पर पूरे गांव की निगाहें टिकी हुई हैं।


