18+ बेटी पर नहीं चलेगी परिवार की मनमानी, शादी का फैसला कोई नहीं थोप सकता

मुंबई: यदि कोई लड़की 18 वर्ष से अधिक उम्र की है, तो वह अपनी जिंदगी से जुड़े सभी महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने के लिए स्वतंत्र है। वह कहां रहेगी, क्या पढ़ेगी, किससे शादी करेगी या शादी करेगी भी या नहीं – इन सभी मामलों में अंतिम निर्णय उसी का होगा। माता-पिता, रिश्तेदार या कोई अन्य व्यक्ति उस पर अपनी इच्छा नहीं थोप सकता। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।

परिवार शादी के लिए बना रहा था दबाव

मामला तेलंगाना की 21 वर्षीय युवती से जुड़ा है। युवती आगे पढ़ाई करना चाहती थी और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी, लेकिन उसके परिवार वाले उसकी शादी एक रिश्तेदार से कराना चाहते थे।

जब युवती ने शादी से इनकार किया तो उस पर लगातार दबाव बनाया जाने लगा। इसके बाद वह घर छोड़कर महाराष्ट्र चली गई। परिवार ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी।

सुरक्षा की मांग लेकर पहुंची हाई कोर्ट

युवती को आशंका थी कि पुलिस या परिवार उसे जबरन वापस घर ले जा सकता है। ऐसे में उसने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी सुरक्षा की मांग की।

सुनवाई के दौरान अदालत ने युवती से अलग कमरे में बातचीत की। न्यायाधीशों ने पाया कि वह किसी दबाव में नहीं है और पूरी समझदारी के साथ अपना भविष्य स्वयं तय करना चाहती है।

माता-पिता के साथ लौटने से किया इनकार

सुनवाई के दौरान युवती के माता-पिता ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वे उस पर शादी का दबाव नहीं डालेंगे। इसके बावजूद युवती ने उनके साथ वापस जाने से इनकार कर दिया।

हालांकि उसने अदालत को बताया कि वह समय-समय पर अपने माता-पिता को अपनी सुरक्षा और कुशलक्षेम की जानकारी देती रहेगी।

कोर्ट ने कहा – बालिग लड़की अपनी मर्जी से जीवन जीने के लिए स्वतंत्र

बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि युवती बालिग है और इसलिए उसे अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे घर ले जाना या शादी के लिए मजबूर करना कानून के खिलाफ होगा।

अदालत ने तेलंगाना पुलिस को युवती की गुमशुदगी का मामला बंद करने का निर्देश दिया और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश भी दिया।

बेटियां किसी की संपत्ति नहीं

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि बेटियां किसी की संपत्ति नहीं हैं। यदि वे बालिग हैं तो उन्हें अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने और अपने भविष्य का निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अपनी पसंद से जीवन जीना और अपने भविष्य का निर्णय लेना इसी मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

यह फैसला उन परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है, जो बालिग बेटियों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध शादी या अन्य फैसलों का दबाव बनाते हैं।

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