लखीसराय के पांच गांवों ने मृत्युभोज के बहिष्कार का लिया सामूहिक संकल्प, समाज सुधार की नई पहल बनी मिसाल

बिहार के लखीसराय जिले में सामाजिक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली है। सूर्यगढ़ा प्रखंड के पांच गांवों के ग्रामीणों ने मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीति के खिलाफ एकजुट होकर इसे पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है। ग्रामीणों का मानना है कि मृत्युभोज जैसी परंपरा कई परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डालती है और इसके कारण अनेक लोगों को कर्ज तक लेना पड़ जाता है। इसलिए अब इस सामाजिक प्रथा को समाप्त कर समाज को नई दिशा देने का अभियान शुरू किया गया है।

रविवार देर शाम सूर्यगढ़ा थाना क्षेत्र के खर्रा गांव स्थित पुस्तकालय भवन में आयोजित एक विशेष बैठक में बड़ी संख्या में ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता, पंचायत प्रतिनिधि, बुजुर्ग और युवाओं ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य मृत्युभोज जैसी परंपरा पर खुलकर चर्चा करना और इसके सामाजिक तथा आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन करना था। लंबे विचार-विमर्श के बाद उपस्थित लोगों ने सामूहिक रूप से मृत्युभोज का बहिष्कार करने का निर्णय लिया और इस अभियान को आसपास के गांवों तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया।

बैठक के दौरान वक्ताओं ने कहा कि किसी भी परिवार में मृत्यु होने के बाद उस परिवार पर पहले से ही मानसिक और भावनात्मक संकट होता है। ऐसे समय में सामाजिक दबाव के कारण बड़े स्तर पर मृत्युभोज आयोजित करना आर्थिक रूप से भी परिवार को कमजोर कर देता है। कई बार गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए कर्ज लेकर मृत्युभोज कराते हैं, जिसका असर कई वर्षों तक उनके आर्थिक जीवन पर पड़ता है।

बैठक में यह भी बताया गया कि खर्रा, निस्ता, खेमतरनी स्थान, चननियां और नवाबगंज सहित पांच गांवों में मृत्युभोज पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। कई मामलों में यह खर्च 15 से 20 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। ग्रामीणों ने इसे समाज के लिए अनावश्यक खर्च बताते हुए कहा कि यदि यही राशि शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीब परिवारों की सहायता या बेटियों की पढ़ाई और विवाह जैसे कार्यों में खर्च की जाए तो समाज को अधिक लाभ मिलेगा।

बैठक की अध्यक्षता अलीनगर पंचायत के मुखिया प्रतिनिधि मुकेश यादव ने की, जबकि संचालन राजेश प्रसाद यादव ने किया। कार्यक्रम में विभिन्न गांवों के लोगों ने अपने विचार रखे और सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। युवाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय रही, जिन्होंने इस अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

चर्चा के दौरान कुछ लोगों ने यह भी कहा कि मृत्युभोज वर्षों से चली आ रही सामाजिक परंपरा है और इसे पूरी तरह समाप्त करना आसान नहीं होगा। इस पर उपस्थित समाजसेवियों और वक्ताओं ने विस्तार से समझाया कि समाज समय के साथ बदलता है और जो परंपराएं लोगों के लिए बोझ बन जाएं, उनमें सुधार करना आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि किसी भी व्यक्ति की स्मृति का सम्मान दिखावे या बड़े भोज से नहीं, बल्कि अच्छे कार्यों और सामाजिक सेवा से किया जाना चाहिए।

बैठक में मौजूद कई वक्ताओं ने सुझाव दिया कि मृत्युभोज पर खर्च होने वाली राशि का उपयोग जरूरतमंद परिवारों की सहायता, गरीब बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पौधारोपण, पुस्तकालय निर्माण और सामाजिक कल्याण के अन्य कार्यों में किया जा सकता है। इससे दिवंगत व्यक्ति की स्मृति भी सम्मानित होगी और समाज को भी सकारात्मक संदेश मिलेगा।

ग्रामीणों ने इस अभियान को केवल एक गांव तक सीमित न रखने का निर्णय लिया। बैठक में तय किया गया कि आने वाले दिनों में आसपास के अन्य गांवों में भी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसके तहत लोगों को मृत्युभोज से होने वाले आर्थिक नुकसान और सामाजिक प्रभावों के बारे में जानकारी दी जाएगी। उद्देश्य यह है कि अधिक से अधिक गांव इस सामाजिक सुधार अभियान से जुड़ें और स्वेच्छा से इस कुप्रथा का बहिष्कार करें।

बैठक के अंत में निर्णय लिया गया कि अभियान की अगली बैठक चननियां गांव में आयोजित होगी। वहां भी ग्रामीणों के साथ चर्चा कर उन्हें इस पहल से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। जब सभी पांच गांवों में जनजागरूकता अभियान पूरा हो जाएगा, तब संयुक्त रूप से मृत्युभोज के बहिष्कार की औपचारिक घोषणा की जाएगी।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी समाज में परिवर्तन एक दिन में नहीं आता, बल्कि इसके लिए निरंतर जागरूकता और जनसहभागिता की आवश्यकता होती है। यदि लोग स्वयं आगे आकर सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने का संकल्प लें तो बदलाव निश्चित रूप से संभव है। यही कारण है कि इस पहल को केवल एक निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक चेतना की नई शुरुआत माना जा रहा है।

ग्रामीणों ने विश्वास जताया कि यदि इस अभियान को लगातार आगे बढ़ाया गया तो आने वाले समय में अन्य पंचायतें और गांव भी इससे प्रेरणा लेंगे। इससे न केवल अनावश्यक खर्च पर रोक लगेगी बल्कि समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी राहत मिलेगी।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि सामाजिक सुधार की शुरुआत स्थानीय स्तर से ही होती है। जब गांव स्वयं आगे बढ़कर सकारात्मक निर्णय लेते हैं तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। मृत्युभोज जैसी परंपराओं पर खुली चर्चा और सामूहिक सहमति से बदलाव की दिशा में उठाया गया कदम सामाजिक जागरूकता का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है।

फिलहाल लखीसराय के इन पांच गांवों की यह पहल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनका यह अभियान आने वाले समय में व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करेगा और समाज को एक नई सोच तथा सकारात्मक दिशा देने में सफल होगा। यदि यह पहल लगातार आगे बढ़ती रही तो यह राज्य के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है।

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