भागलपुर में दूसरी ‘मंजूषा हटिया’ प्रदर्शनी बनी आकर्षण का केंद्र, 50 से अधिक कलाकारों ने परंपरा और नवाचार का किया अनूठा प्रदर्शन

भागलपुर में अंग प्रदेश की ऐतिहासिक लोक चित्रकला मंजूषा कला को नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत दूसरी ‘मंजूषा हटिया’ लोक कला प्रदर्शनी का सफल आयोजन किया गया। जिला कला एवं संस्कृति कार्यालय, भागलपुर और के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस प्रदर्शनी में 50 से अधिक कलाकारों ने अपनी पारंपरिक और नवाचार आधारित कलाकृतियों का प्रदर्शन किया। प्रदर्शनी में बड़ी संख्या में कला प्रेमी, विद्यार्थी, शोधार्थी और आम नागरिक पहुंचे, जिन्होंने न केवल इन कलाकृतियों का अवलोकन किया बल्कि कलाकारों से सीधे खरीदारी कर उन्हें आर्थिक रूप से भी प्रोत्साहित किया।

भागलपुर संग्रहालय परिसर में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य मंजूषा कला के संरक्षण और संवर्धन के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों को प्रत्यक्ष बाजार उपलब्ध कराना था। वर्षों से अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान रही मंजूषा कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और कलाकारों को आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों को इस आयोजन के माध्यम से नई गति मिली। आयोजन में पारंपरिक कला और आधुनिक प्रयोगों का अनूठा संगम देखने को मिला, जिसने आगंतुकों को विशेष रूप से आकर्षित किया।

कार्यक्रम का उद्घाटन जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी सह सहायक संग्रहालयाध्यक्ष अंकित रंजन ने किया। इस अवसर पर शिव शंकर सिंह ‘पारिजात’, राजीवकांत मिश्रा, मनोज पंडित, डॉ. उलूपी झा सहित कई वरिष्ठ कलाकार, कला प्रेमी और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहे। सभी अतिथियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और कलाकारों की रचनात्मकता की सराहना की।

अपने संबोधन में अंकित रंजन ने कहा कि ‘मंजूषा हटिया’ केवल एक प्रदर्शनी नहीं बल्कि कलाकारों के लिए संवाद, प्रशिक्षण और नवाचार का साझा मंच है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के कलाकार एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं, नई तकनीकों पर चर्चा करते हैं और पारंपरिक कला को आधुनिक स्वरूप देने के प्रयासों को साझा करते हैं। उनके अनुसार किसी भी कलाकार के लिए अपनी कला को सीधे दर्शकों और खरीदारों तक पहुंचाने का यह एक प्रभावी माध्यम है।

उन्होंने बताया कि इस आयोजन की एक विशेष परंपरा यह भी है कि प्रत्येक प्रदर्शनी के लिए नए संयोजकों का चयन किया जाता है, जिससे अधिक से अधिक कलाकारों को नेतृत्व का अवसर मिल सके। इस बार प्रदर्शनी का सफल संचालन अनुकृति कुमारी और विशुद्धानंद मिश्र ने किया। वहीं आगामी तीसरी ‘मंजूषा हटिया’ के संयोजक के रूप में मृदुला सिंह और अमन सागर के नामों की घोषणा की गई।

इस बार की प्रदर्शनी में कलाकारों द्वारा किए गए नवाचार विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट की शिक्षा प्राप्त कलाकार सोनाली कुमारी ने चुकंदर, धनिया और हल्दी जैसे प्राकृतिक स्रोतों से तैयार रंगों का उपयोग कर मंजूषा चित्र तैयार किए। उनके इस प्रयोग ने यह संदेश दिया कि पारंपरिक लोक कला को पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक रंगों के माध्यम से भी संरक्षित और विकसित किया जा सकता है।

वरिष्ठ मंजूषा कलाकार माला घोष ने अपने चित्रों के लिए गोबर से तैयार प्राकृतिक बैकग्राउंड का उपयोग किया। इसके ऊपर पारंपरिक मंजूषा चित्रांकन कर उन्होंने भारतीय ग्रामीण संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। उनकी कलाकृतियों को दर्शकों ने काफी सराहा।

कलाकार अर्पणा कुमारी ने भी अपनी रचनात्मकता से लोगों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने पारंपरिक होली के प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हुए मंजूषा चित्र तैयार किए। इस प्रयोग के माध्यम से उन्होंने प्राकृतिक रंगों के महत्व और लोक संस्कृति के संरक्षण का संदेश दिया।

प्रदर्शनी का एक अन्य आकर्षण सरकारी विद्यालय की शिक्षिका प्रियंवदा द्वारा प्रस्तुत क्रोशिया (Crochet) तकनीक से तैयार मंजूषा मोटिफ्स रहे। ऊन से तैयार इन कलात्मक डिजाइनों ने यह साबित किया कि मंजूषा कला केवल कागज और कैनवास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे वस्त्र, हस्तशिल्प और सजावटी उत्पादों के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। इस नवाचार को आगंतुकों ने काफी पसंद किया।

प्रदर्शनी का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य कलाकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी था। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने कलाकारों से सीधे उनकी कलाकृतियां खरीदीं। जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने युवा कलाकार देवांश कुमारी की बनाई मंजूषा पेंटिंग खरीदकर उनका उत्साह बढ़ाया। वहीं सबौर निवासी नवल किशोर राय ने कलाकार पिंकी कुमारी द्वारा तैयार मंजूषा रूमाल खरीदा। इसके अलावा कई अन्य कलाकारों की पेंटिंग, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की भी अच्छी बिक्री हुई।

आयोजकों का कहना था कि ‘मंजूषा हटिया’ का मूल उद्देश्य कलाकारों और कला प्रेमियों के बीच प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना तथा स्थानीय कलाकारों को बिना किसी मध्यस्थ के बाजार उपलब्ध कराना है। इससे कलाकारों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलने के साथ-साथ लोक कला के संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।

कार्यक्रम के दौरान अंकित रंजन ने मंजूषा चित्रकला की पारंपरिक रंग योजना पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मंजूषा कला के मूल रंग केवल तीन हैं—माइजेंटा (गुलाबी), पीला और हरा। उन्होंने बताया कि इसका ऐतिहासिक प्रमाण 1930 के दशक में ब्रिटिश कला इतिहासकार डब्ल्यू. जी. आर्चर द्वारा संग्रहित मंजूषा चित्रों, संग्रहालय में संरक्षित चक्रवर्ती देवी की मूल कलाकृतियों तथा पारंपरिक माली कलाकारों की झांपियों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

उन्होंने कलाकारों से अपील की कि मंजूषा कला की मौलिक पहचान को बनाए रखने के लिए इन्हीं पारंपरिक रंगों का उपयोग किया जाए। उन्होंने यह भी घोषणा की कि आगामी प्रदर्शनी से माइजेंटा के स्थान पर लाल रंग का उपयोग करने वाली मंजूषा पेंटिंग्स को प्रदर्शनी में शामिल नहीं किया जाएगा। उनका कहना था कि कला की ऐतिहासिक और पारंपरिक पहचान को सुरक्षित रखना सभी कलाकारों की साझा जिम्मेदारी है।

पूरे आयोजन के दौरान वरिष्ठ और युवा कलाकारों के बीच तकनीकी चर्चा, रंग संयोजन, डिज़ाइन, सामग्री और पारंपरिक स्वरूप को लेकर विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ। युवा कलाकारों ने वरिष्ठ कलाकारों से मार्गदर्शन प्राप्त किया, जबकि वरिष्ठ कलाकारों ने नई पीढ़ी के नवाचारों की सराहना करते हुए उन्हें परंपरा से जुड़े रहने की सलाह दी। इस प्रकार प्रदर्शनी केवल कला प्रदर्शन तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशिक्षण, संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी प्रभावी मंच बनी।

समापन अवसर पर जिला कला एवं संस्कृति कार्यालय, भागलपुर ने सभी कलाकारों, संयोजकों, अतिथियों, मीडिया प्रतिनिधियों और कला प्रेमियों का आभार व्यक्त किया। आयोजकों ने विश्वास जताया कि ‘मंजूषा हटिया’ का नियमित आयोजन आने वाले वर्षों में मंजूषा कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों के लिए स्थायी बाजार और बेहतर अवसर उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

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