13 दिन तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में फंसे रिटायर्ड प्रोफेसर, साइबर ठगों ने 82.53 लाख रुपये उड़ाए

पटना: बिहार की राजधानी पटना से साइबर ठगी का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां फुलवारीशरीफ निवासी एक सेवानिवृत्त प्राध्यापक को साइबर अपराधियों ने 13 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर उनकी जिंदगी भर की कमाई लूट ली। ठगों ने खुद को केंद्रीय जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर प्रोफेसर मो. गयासुद्दीन से 82.53 लाख रुपये अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करा लिए।

जानकारी के अनुसार, इस सनसनीखेज ठगी की शुरुआत 27 मार्च को एक अनजान फोन कॉल से हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को दिल्ली स्थित एक केंद्रीय जांच एजेंसी का वरिष्ठ अधिकारी बताया। उसने प्रोफेसर को डराते हुए कहा कि उनके मोबाइल नंबर का इस्तेमाल कथित तौर पर देश विरोधी गतिविधियों और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों में किया गया है। साथ ही यह भी दावा किया गया कि उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका है।

ठगों ने रिटायर्ड प्राध्यापक को मानसिक दबाव में लेने के लिए बेहद सुनियोजित तरीके से जाल बिछाया। कभी वे खुद को सीबीआई, तो कभी ईडी का अधिकारी बताते रहे। इसके बाद स्काइप और व्हाट्सएप वीडियो कॉल के जरिए उन्हें लगातार निगरानी में रखा गया। बदमाशों ने उन्हें सख्त हिदायत दी कि जांच पूरी होने तक वे किसी से बात नहीं करेंगे और घर से बाहर भी नहीं निकलेंगे।

प्राध्यापक का भरोसा जीतने और डर बढ़ाने के लिए साइबर अपराधियों ने उनके व्हाट्सएप पर फर्जी सरकारी दस्तावेज, सुप्रीम कोर्ट के कथित आदेश और नकली गिरफ्तारी वारंट भी भेजे। इन दस्तावेजों को देखकर वे बुरी तरह घबरा गए। डर इतना बढ़ गया कि वे लगातार कैमरे के सामने बैठे रहे और अपराधियों के हर निर्देश का पालन करते रहे।

इस दौरान ठगों ने अलग-अलग बहानों से प्रोफेसर से पैसे ट्रांसफर करवाने शुरू किए। बताया गया कि कथित जांच प्रक्रिया के नाम पर रकम सुरक्षित रखने और सत्यापन कराने की बात कहकर उनसे यूपीआई और आरटीजीएस के माध्यम से कई बार लेनदेन कराया गया। हैरानी की बात यह रही कि पीड़ित दो बार बैंक भी गए, लेकिन भय और दबाव के कारण बैंक कर्मचारियों को कुछ नहीं बता सके।

लगातार 13 दिनों तक 27 मार्च से 8 अप्रैल के बीच साइबर बदमाशों ने उन्हें डिजिटल कैद में रखा। इस दौरान उनकी पूरी जमा पूंजी धीरे-धीरे ठग ली गई। जब अपराधियों को यकीन हो गया कि अब उनके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा, तब उन्होंने वीडियो कॉल बंद कर दी। हालांकि इसके बाद भी जून के अंत तक व्हाट्सएप कॉल और मैसेज के जरिए उन्हें धमकाया जाता रहा ताकि वे पुलिस से संपर्क न करें।

मामले का खुलासा तब हुआ जब जून के अंतिम दिनों में उनका एक करीबी परिचित घर पहुंचा। बातचीत के दौरान रिटायर्ड प्रोफेसर भावुक हो गए और रोते हुए पूरी घटना बताई। इसके बाद परिजनों ने तुरंत उन्हें लेकर साइबर थाना पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई।

फिलहाल साइबर थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जिन बैंक खातों में पैसे भेजे गए, उन्हें फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। साथ ही तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर साइबर ठगों की पहचान और गिरफ्तारी के प्रयास जारी हैं।

पुलिस ने लोगों से अपील की है कि यदि कोई खुद को सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर फोन पर धमकाए या डिजिटल अरेस्ट जैसी बात करे, तो घबराएं नहीं और तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करें।

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