पटना में रिश्वतखोरी का बड़ा खुलासा: 50 हजार घूस लेते हेडमास्टर गिरफ्तार, छात्रों के दस्तावेजों पर चल रहा था कमीशन का खेल

बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी अन्वेषण ब्यूरो लगातार सख्त कार्रवाई कर रहा है। इसी क्रम में राजधानी पटना से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर को 50 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि वह छात्रों को अंक प्रमाण पत्र और कॉलेज लीविंग सर्टिफिकेट (CLC) जारी करने के बदले पैसे की मांग कर रहा था। निगरानी विभाग की इस कार्रवाई ने शिक्षा विभाग में हड़कंप मचा दिया है और सरकारी संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह मामला पटना से सटे सम्पतचक क्षेत्र का है, जहां उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय के हेडमास्टर कुणाल प्रियदर्शी पर छात्रों से अवैध वसूली का आरोप लगा। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, विद्यालय से परीक्षा पास कर चुके छात्र-छात्राओं को उनके आवश्यक शैक्षणिक दस्तावेज देने के बदले निर्धारित शुल्क से अलग अतिरिक्त रकम देने के लिए दबाव बनाया जा रहा था।

निगरानी अन्वेषण ब्यूरो के अधिकारियों के मुताबिक हेडमास्टर छात्रों से व्यवस्थित तरीके से पैसे वसूल रहे थे। दस्तावेजों की आवश्यकता हर छात्र को होती है, क्योंकि अंक प्रमाण पत्र और CLC के बिना आगे कॉलेज में नामांकन या अन्य शैक्षणिक प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो सकतीं। इसी मजबूरी का फायदा उठाकर रिश्वत मांगने का खेल चल रहा था।

पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब सम्पतचक के गवसपुर निवासी अरुण कुमार सिंह ने निगरानी विभाग के मुख्यालय में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में उन्होंने बताया कि स्कूल के 152 छात्र वर्ष 2026 की वार्षिक माध्यमिक परीक्षा में सफल हुए हैं और इन सभी छात्रों से दस्तावेज देने के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है।

शिकायतकर्ता के अनुसार हेडमास्टर प्रत्येक छात्र से 400 रुपये की मांग कर रहे थे। यदि इस राशि को कुल छात्रों की संख्या से जोड़ा जाए तो अवैध वसूली की रकम काफी बड़ी हो सकती थी। छात्रों और अभिभावकों के लिए यह आर्थिक बोझ भी था और व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने वाला भी।

शिकायत मिलने के बाद निगरानी विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया। किसी भी कार्रवाई से पहले आरोपों की गुप्त जांच कराई गई। जांच टीम ने स्वतंत्र रूप से तथ्यों की पुष्टि की और पाया कि शिकायत प्रथम दृष्टया सही है। प्रारंभिक जांच में रिश्वत मांगने के आरोप पुष्ट होने के बाद निगरानी थाने में एफआईआर संख्या 076/26 दर्ज की गई।

एफआईआर दर्ज होने के बाद ट्रैप ऑपरेशन की योजना बनाई गई। निगरानी विभाग ने पूरे अभियान को गोपनीय रखा ताकि आरोपी को भनक न लग सके। पुलिस उपाधीक्षक विन्ध्याचल प्रसाद के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई, जिसे ट्रैप ऑपरेशन सफलतापूर्वक अंजाम देने की जिम्मेदारी दी गई।

मंगलवार को कार्रवाई के लिए पूरी रणनीति तैयार की गई। शिकायतकर्ता को केमिकल लगे नोट दिए गए, जिनकी कुल राशि 50 हजार रुपये थी। योजना के अनुसार शिकायतकर्ता स्कूल पहुंचा और हेडमास्टर के दफ्तर में प्रवेश किया। निगरानी टीम पहले से आसपास तैनात थी और मौके पर नजर बनाए हुए थी।

जैसे ही शिकायतकर्ता ने आरोपी हेडमास्टर कुणाल प्रियदर्शी को रकम सौंपी और उसने पैसे स्वीकार किए, निगरानी टीम ने तुरंत कार्रवाई की। टीम ने स्कूल के ऑफिस रूम में अचानक धावा बोला और आरोपी को नोटों सहित रंगे हाथ पकड़ लिया। केमिकल परीक्षण में भी पुष्टि हो गई कि आरोपी ने वही रकम स्वीकार की थी।

कार्रवाई इतनी तेज और सुनियोजित थी कि आरोपी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। गिरफ्तारी के बाद विद्यालय परिसर में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। शिक्षकों, कर्मचारियों और आसपास मौजूद लोगों में घटना को लेकर चर्चा शुरू हो गई।

गिरफ्तारी के बाद निगरानी टीम आरोपी को अपने साथ पटना स्थित मुख्यालय ले गई। वहां उससे पूछताछ की जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या वह अकेले इस अवैध वसूली में शामिल था या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क भी काम कर रहा था। जांच एजेंसियां उसके वित्तीय लेनदेन और अन्य संभावित शिकायतों की भी जांच कर रही हैं।

कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरोपी को विशेष निगरानी अदालत में पेश किया जाएगा। अदालत के समक्ष उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की न्यायिक कार्रवाई तय होगी। यदि आरोप सिद्ध होते हैं तो आरोपी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कठोर कार्रवाई संभव है।

इस घटना ने शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा संस्थानों में इस प्रकार की रिश्वतखोरी सबसे चिंताजनक है, क्योंकि इसका सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। जब शैक्षणिक दस्तावेज जैसे मूल अधिकार भी रिश्वत से जुड़े हों, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता कमजोर होती है।

निगरानी विभाग द्वारा जारी आंकड़े भी भ्रष्टाचार की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2026 में अब तक यह भ्रष्टाचार से जुड़ी 76वीं एफआईआर बताई जा रही है। वहीं रंगे हाथ पकड़ने का यह 71वां मामला है, जो दर्शाता है कि राज्य में रिश्वतखोरी के खिलाफ अभियान लगातार जारी है।

आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष अब तक 70 भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है। साथ ही 2026 में अब तक कुल 27,55,300 रुपये की नकद रिश्वत राशि बरामद की गई है। तुलना करें तो वर्ष 2025 में कुल 101 ट्रैप केस दर्ज हुए थे, जिनमें 37,80,300 रुपये की रिश्वत राशि जब्त की गई थी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार ट्रैप कार्रवाई से भ्रष्ट कर्मचारियों में डर जरूर पैदा हुआ है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि रिश्वतखोरी अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सरकारी विभागों में पारदर्शिता, डिजिटल प्रक्रियाएं और जवाबदेही बढ़ाकर ही भ्रष्टाचार को स्थायी रूप से कम किया जा सकता है।

शिक्षा क्षेत्र में खासतौर पर दस्तावेज निर्गमन, नामांकन और परीक्षा संबंधित प्रक्रियाओं को पूरी तरह ऑनलाइन और ट्रैकिंग आधारित बनाने की मांग लंबे समय से उठ रही है। यदि छात्र सीधे डिजिटल प्लेटफॉर्म से अपने प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकें, तो इस तरह की अवैध वसूली की संभावना काफी कम हो सकती है।

कुल मिलाकर पटना के सम्पतचक में हेडमास्टर की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ निगरानी विभाग की कार्रवाई लगातार जारी है। छात्रों से 400 रुपये प्रति व्यक्ति वसूली का आरोप केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामियों का संकेत भी है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच में आगे और कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं।

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