कामाख्या मंदिर: 52 शक्तिपीठों में एक, आस्था, शक्ति और तंत्र साधना का अद्भुत संगम

गुवाहाटी: असम की राजधानी दिसपुर से करीब 10 किलोमीटर दूर नीलाचल पहाड़ी पर स्थित मां कामाख्या मंदिर देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में शामिल माना जाता है और शक्ति उपासना, तंत्र साधना तथा अंबुबाची महोत्सव के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे, तब जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। मान्यता है कि कामाख्या धाम में माता सती की योनि गिरी थी। इसी कारण यहां देवी की प्रतिमा नहीं है, बल्कि प्राकृतिक शिला-रूप में स्थित एक पवित्र स्थल की पूजा की जाती है, जहां से प्राकृतिक जलधारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है।

कामाख्या मंदिर: 52 शक्तिपीठों में एक, आस्था, शक्ति और तंत्र साधना का अद्भुत संगम

अंबुबाची महोत्सव का विशेष महत्व

कामाख्या मंदिर का सबसे प्रमुख धार्मिक आयोजन अंबुबाची महोत्सव है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार इस दौरान मां कामाख्या वार्षिक रजस्वला अवस्था में रहती हैं। इसी कारण मंदिर के कपाट लगभग तीन दिनों तक बंद रहते हैं और चौथे दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन शुरू होते हैं।

इसी अवधि में मंदिर में रखे गए सफेद वस्त्र को श्रद्धालु अंबुबाची वस्त्र के रूप में प्रसाद मानते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि यह वस्त्र देवी के आशीर्वाद का प्रतीक होता है।

तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र

कामाख्या मंदिर: 52 शक्तिपीठों में एक, आस्था, शक्ति और तंत्र साधना का अद्भुत संगम

कामाख्या मंदिर को तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों से साधु-संत और तांत्रिक यहां साधना के लिए पहुंचते हैं। धार्मिक परंपराओं में मां कामाख्या को शक्ति और तंत्र की अधिष्ठात्री देवी माना गया है।

प्रमुख धार्मिक आयोजन

कामाख्या मंदिर: 52 शक्तिपीठों में एक, आस्था, शक्ति और तंत्र साधना का अद्भुत संगम

वर्षभर यहां दुर्गा पूजा, बसंती पूजा, मनसा पूजा, अंबुबाची महोत्सव सहित कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं। विशेष रूप से अंबुबाची मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु और साधु-संत शामिल होते हैं।

मनोकामना और परंपराएं

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां कामाख्या के दर्शन और पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मनोकामना पूरी होने पर कई श्रद्धालु कन्या भोज का आयोजन करते हैं। मंदिर परिसर में कुछ विशेष धार्मिक परंपराओं के तहत पशु बलि की प्रथा भी प्रचलित है, हालांकि परंपरा के अनुसार मादा पशुओं की बलि नहीं दी जाती।

कामाख्या धाम आज भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा, शक्ति उपासना और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है, जहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु आस्था के साथ पहुंचते हैं।

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