स्मार्टफोन की चमकीली दुनिया और बेबस होते माता-पिता : डॉ. नितिन कुलकर्णी

रात के एक या दो बजे का समय है। पूरे घर में अंधेरा पसरा है, सिवाय एक बेडरूम के दरवाजे के नीचे से छनकर आती मोबाइल की उस धुंधली नीली रोशनी के। आधी रात को माँ की आँख खुलती है। वह पानी पीने के लिए उठती है और सहज भाव से अपने बच्चे के कमरे में झांकती है।

वहाँ वो बिस्तर पे बैठा हैं—हाथ में मोबाइल है और कानों में हेडफोन मजबूती से जड़े हैं। स्क्रीन पर कुछ न कुछ चल रहा है; कोई गेम पूरे जोर से चल रहा है। वक्त का होश तो जैसे पूरी तरह खो चुका है।

“तुम अभी तक सोए नहीं?” स्वाभाविक रूप से एक थका हुआ, चिंतित सवाल हवा में तैरता है।

“बस मम्मा, थोड़ा सा बाकी है। अगले पाँच-दस मिनट में पक्का सो रहा हूँ,” उधर से रटा-रटाया जवाब आता है।

वे दस मिनट कब दो घंटों में बदल जाते हैं, कोई नहीं जानता। आखिरकार नींद आ ही जाती है, पर कब? इसका सटीक हिसाब किसी के पास नहीं होता। आज देश-दुनिया के अधिकांश घरों में हर रात यही कहानी दोहराई जा रही है।

अगले दिन फिर वही चक्र चलता है—दिन के ग्यारह या बारह बजे तक सोए रहना, और कई बार टोकने के बाद ही बिस्तर छोड़ना। जब वे आखिरकार उठते हैं, तो एक हाथ में फोन और दूसरे हाथ में कॉफी का कप होता है। शरीर तो जाग जाता है, लेकिन दिन की जो एक प्राकृतिक लय होती है, वह पूरी तरह दम तोड़ चुकी होती है।

रात भर जागना, दोपहर में आँखें खोलना, और भोर होने तक लैपटॉप या मोबाइल की स्क्रीन को टकटकी लगाकर ताकते रहना ही अब ‘नया नॉर्मल’ बन गया है।

समय बदलता है, तकनीक आगे बढ़ती है और जीवनशैली उसके अनुसार ढल जाती है। यहाँ तक तो सब ठीक है। लेकिन मानव शरीर की बुनियादी जरूरतें नहीं बदलतीं। मानवीय जिस्म को शारीरिक आराम की दरकार होती है। मन को गहरी, सुकून भरी नींद मिलनी चाहिए। आँखों को अंधेरे की और दिमाग को खुद को दोबारा तरोताजा व व्यवस्थित करने के लिए शांत समय की आवश्यकता होती है।

मगर आज की पीढ़ी मानो अपने ही बायोलॉजी से युद्ध लड़ रही है। उन्हें शायद यह मुगालता हो गया है कि ढेर सारी तकनीक और डेटा के दम पर वे इंसानी शरीर के नियमों को मात दे सकते हैं और अपनी जैविक घड़ी (बायो-रिदम) को ठेंगा दिखा सकते हैं।

जब हम बच्चे थे, तो गर्मियों की छुट्टियों की एक अलग ही जादुई दुनिया हुआ करती थी। हम खुले आसमान के नीचे छत पर सोते थे, टिमटिमाते तारों को निहारते हुए परिवार से बतियाते थे। हम सूरज उगने से पहले उठ जाते थे, जहाँ पक्षियों की चहचहाहट और भोर की ताजी हवा एक नए उत्साह के साथ हमारा स्वागत करती थी।

हमारे दिन खेलने, किताबें पढ़ने, गलियों में घूमने और आपस में बातें करने में बीतते थे।

आज, कई बच्चे भूल चुके हैं कि सूर्योदय असल में कैसा दिखता है। वे सुबह की उस शांत लहर और चिड़ियों के चहकने के सीधे गवाह ही नहीं बन पाते। इस बदलाव का दुख सिर्फ पुरानी यादों का रोना नहीं है; बल्कि यह उनके स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और आने वाले कल को लेकर एक सच्ची और गहरी चिंता है।

आज के किशोरों ने वक्त के पहिये को ही उलट दिया है—रात को दिन और दिन को रात बना डाला है। माता-पिता होने के नाते, हम मूकदर्शक बनकर यह सब देखते हैं। शुरुआत में हम टोकते हैं। प्यार से समझाते हैं। फिर, हम इसके बुरे नतीजों से आगाह करने की कोशिश करते हैं। अपनी बातें बार-बार दोहराते हैं। कभी गुस्सा फूटता है, तो कभी हम मिन्नतें करने लगते हैं।

लेकिन आज के बच्चों के पास पलटवार करने के लिए पहले से रिकॉर्डेड जवाबों का एक पूरा तरकश तैयार रहता है—

“हमें सब पता है।”
“आप फालतू में चिंता मत करो।”
“आजकल सब लोग ऐसा ही करते हैं।”
“हमारी पीढ़ी की जिंदगी आपसे अलग है।”

इन दुत्कार भरे जवाबों को रोज-रोज सुनकर माता-पिता आखिरकार घुटने टेक देते हैं और चुप हो जाते हैं। मगर उनका मन शांत नहीं होता। वे अपने तजुर्बे से जानते हैं कि अगर आप अपने शरीर के साथ खिलवाड़ करेंगे, तो देर-सबेर आपको इसकी भारी कीमत चुकानी ही पड़ेगी।

बीस या पच्चीस साल की उम्र में इंसान खुद को अजेय समझता है, लगता है कुछ नहीं होगा। लेकिन नींद की यह लगातार कमी, बेपटरी हो चुकी दिनचर्या, शारीरिक मेहनत से दूरी और स्क्रीन के सामने घंटों गुजारने के ये छोटे-छोटे बीज जो चुपचाप बोए जा रहे हैं; वक्त के साथ, वे पनपते हैं और एक गंभीर शक्ल अख्तियार कर लेते हैं।

स्वभाव में चिड़चिड़ापन घर कर जाता है। एकाग्रता टूटने लगती है। जीवन का उत्साह और ऊर्जा फीकी पड़ जाती है। अपनों से बातचीत का दायरा सिमटने लगता है, आत्मविश्वास डगमगा जाता है, और सबसे दुखद बात यह है कि जिंदगी की छोटी-छोटी मासूम खुशियाँ काफूर होने लगती हैं।

फिर भी, माता-पिता के लिए सबसे बड़ी त्रासदी इन नतीजों को देखना नहीं है; बल्कि यह जानलेवा अहसास है कि वे अब चाहकर भी अपने बच्चों के दिल तक नहीं पहुँच पा रहे हैं, उनसे संवाद के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं।

हर पीढ़ी को लगता है कि उनके माता-पिता उन्हें समझ नहीं पाते। लेकिन सच तो यह है कि माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी ही बच्चों को समझने के नाम कर देते हैं।

वे एक अबोध बच्चे के रोने की वजह पहचान लेते हैं। वे स्कूल के दिनों की अनकही उलझनों और घबराहट को भांप लेते हैं। वे बच्चे की पहली नाकामी का दर्द खुद महसूस करते हैं और उनके पहले प्यार की धड़कन को पहचानते हैं। यहाँ तक कि जब बच्चे पूरी तरह खामोश होते हैं, तब भी माता-पिता सिर्फ उनका चेहरा देखकर उनके भीतर का हाल पढ़ लेते हैं।

फिर एक दिन ऐसा आता है जब वही बच्चे बड़े हो जाते हैं, और सीधे आँखों में आँखें डालकर कह देते हैं—
“आप कुछ नहीं समझते!”

यह एक जुमला माता-पिता के कलेजे को सबसे गहरा घाव देता है।

माता-पिता अपने बच्चों के दुश्मन नहीं होते; वे तो उनके सपनों के सबसे सच्चे और पहले गवाह होते हैं। वे उनकी कामयाबी के लिए सबसे पहले दुआ मांगते हैं और जब बच्चा नाकाम होता है, तो अंदर से टूटने वाले भी वही पहले शख्स होते हैं।

वे बच्चों की बीमारी में रात-रात भर जागते हैं और बच्चों की छोटी सी जीत का जश्न खुद की किसी भी कामयाबी से बढ़कर मनाते हैं।

जब कोई माँ या पिता बच्चे को रात भर जागने से मना करते हैं, तो यह उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाने या नियंत्रित करने की चाहत नहीं होती। यह विशुद्ध प्यार से जनम लेता है। यह उनके तजुर्बे, फिक्र और एक बेहद निस्वार्थ डर से पैदा होता है कि—
“जो परेशानियां मैंने देखीं, मेरा बच्चा उनसे न जूझे।”

लेकिन जब तमाम कोशिशों और अंतहीन बातचीत के बाद भी कुछ नहीं बदलता, तो माता-पिता धीरे-धीरे अपनी एक खामोश दुनिया में सिमट जाते हैं।

बच्चे अक्सर इस चुप्पी को उनकी बेरुखी या लापरवाही मान लेते हैं, उन्हें लगता है कि अब मम्मी-पापा को कोई फर्क नहीं पड़ता। मगर हकीकत इसके उलट होती है; वे फिक्र से मरे जा रहे होते हैं।

यह चुप्पी कोई हार नहीं है; यह एक बेहद दुखद और लाचार स्वीकारोक्ति है। एक भारी बेबसी।

जिस दिन माता-पिता बहस करना बंद कर देते हैं, उस दिन से उनकी चिंताएं कम नहीं होतीं—बल्कि वे और ज्यादा बढ़ जाती हैं। क्योंकि ‘माता-पिता’ होना एक ऐसी उम्रकैद है, जहाँ बच्चे भले ही पचास साल के हो जाएं, उनके लिए फिक्र कभी खत्म नहीं होती।

उम्र के साथ बस डर का स्वरूप बदल जाता है, पर वह दिल से कभी विदा नहीं लेता।

इसीलिए, आज की इस नई और युवा पीढ़ी से मेरी एक ही गुजारिश है—

यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि आप अपने माता-पिता की हर बात को पत्थर की लकीर मानें। आप उनकी हर राय से पूरी तरह सहमत हों, यह भी आवश्यक नहीं है। आपके अपने विचार होने चाहिए, अपने फैसले खुद लीजिए और अपनी जिंदगी को अपने तरीके से ही जिएं।

लेकिन कभी-कभी, उनकी उस चिड़चिड़ाहट और टोकने की आदत के पीछे छिपे बेइंतहा प्यार को भी महसूस करने की कोशिश कीजिए।

क्योंकि जिंदगी के सफर में आगे चलकर एक ऐसा मोड़ जरूर आएगा, जब आपको अचानक उन सभी बातों की अहमियत और वजह समझ में आएगी, जो वे आज कह रहे हैं।

और यकीन मानिए, जब वो दिन आएगा, तब आप इस भारी पछतावे के बोझ को नहीं सहना चाहेंगे कि—
“काश! मैंने उस वक्त उनकी बात मान ली होती, तो कितना अच्छा होता।”

आज रात भी, एक माँ आधी रात को उठेगी और अपने बच्चे के कमरे की बत्ती के नीचे से झांकेगी। एक पिता सुबह देर तक सोते हुए अपने नौजवान बेटे या बेटी को निहारेगा और बिना एक शब्द बोले चुपचाप अपने काम पर निकल जाएगा।

वे अब न तो कोई बहस करेंगे और न ही गुस्सा जताएंगे। लेकिन उनके अंतर्मन में एक खामोश प्रार्थना लगातार गूंजती रहेगी—

“हे ईश्वर, मेरे बच्चों को सलामत रखना, उन्हें अच्छी सेहत और सद्बुद्धि देना। उन्हें खुश रखना। और जो बातें हम उन्हें अपने शब्दों से नहीं समझा पाए, जिंदगी उन्हें वह सबक बड़ी नरमी से और वक्त रहते सिखा दे।”

अगर इस कायनात में कोई सचमुच निस्वार्थ और पवित्र प्यार है, तो वह केवल माता-पिता का है। कभी-कभी यह किसी उबाऊ भाषण जैसा लग सकता है। कभी-कभी यह बेजा चिंता या तीखी बहस का रूप ले लेता है। लेकिन कभी-कभी, यही प्यार पूरी शिद्दत के साथ एक मुकम्मल खामोशी के जरिए खुद को बयां करता है।

यह ताउम्र रहने वाली फिक्र ही उनके प्यार की सबसे सच्ची जुबान है, और हमेशा रहेगी।

लेखक — डॉ. नितिन कुलकर्णी
IAS, अपर मुख्य सचिव, राज्यपाल, झारखंड

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