मां का साया बचपन में उठ गया, लेकिन हौसला नहीं टूटा; संघर्षों के बीच हिमाली राज बनीं SDM

कहते हैं कि जिंदगी में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों और लक्ष्य साफ हो तो सफलता जरूर मिलती है। बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 70वीं परीक्षा में एसडीएम पद के लिए चयनित हिमाली राज की कहानी इसी जज्बे, संघर्ष और अटूट संकल्प की मिसाल बनकर सामने आई है। बचपन में मां को खो देने का दर्द, आर्थिक और पारिवारिक चुनौतियां, पढ़ाई के बीच जिम्मेदारियों का बोझ—इन सबके बावजूद हिमाली ने अपने सपनों को टूटने नहीं दिया। आज उनकी सफलता हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

हिमाली राज वर्तमान में में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। नौकरी की जिम्मेदारियों के साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन उन्होंने अनुशासन, समय प्रबंधन और निरंतर मेहनत के दम पर यह असंभव लगने वाला लक्ष्य हासिल कर दिखाया। दूसरे प्रयास में सफलता हासिल कर उन्होंने एसडीएम बनने का सपना साकार कर लिया।

हिमाली की जिंदगी का सबसे कठिन दौर वह था जब कम उम्र में ही उनकी मां का निधन हो गया। एक बच्चे के लिए मां का साया खो देना जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा होती है। हिमाली के लिए भी यह घटना बेहद दर्दनाक थी। मां हमेशा बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करती थीं और शिक्षा को जीवन बदलने वाला सबसे बड़ा साधन मानती थीं। वह चाहती थीं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर समाज में अपनी अलग पहचान बनाएं।

मां के निधन के बाद परिवार की परिस्थितियां बदल गईं। घर का माहौल पहले जैसा नहीं रहा और जीवन में भावनात्मक खालीपन गहरा गया। लेकिन हिमाली ने अपनी मां के सपनों को ही अपनी ताकत बना लिया। उन्होंने तय कर लिया कि चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो, वह अपनी मां का सपना अधूरा नहीं रहने देंगी।

मां के जाने के बाद हिमाली और उनके भाई-बहनों की परवरिश नानी के घर हुई। नानी का घर उनके लिए केवल आश्रय नहीं बल्कि संघर्ष के दिनों में सहारा बना। वहां उन्हें प्यार, सुरक्षा और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। परिवार के अन्य सदस्यों ने भी उनका पूरा साथ दिया। खासकर मामा और मामी ने माता-पिता की तरह जिम्मेदारी निभाई और उनकी पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं आने दी।

हिमाली कई बार कह चुकी हैं कि यदि परिवार का यह सहयोग उन्हें नहीं मिलता, तो शायद उनके लिए यहां तक पहुंचना बेहद मुश्किल होता। नानी के घर का वातावरण हमेशा सकारात्मक रहा, जहां शिक्षा और मेहनत को प्राथमिकता दी जाती थी। यही माहौल उनके व्यक्तित्व निर्माण में अहम साबित हुआ।

प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना हिमाली ने बचपन में ही देख लिया था। इसके पीछे एक खास वजह भी थी। उनके चाचा सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करते थे। बचपन में उन्हें किताबों के बीच घंटों पढ़ते और मेहनत करते देख हिमाली के मन में भी प्रशासनिक सेवा का सपना जन्मा। तभी उन्होंने तय कर लिया कि एक दिन उन्हें भी इसी क्षेत्र में जाना है।

यह सपना केवल एक करियर विकल्प नहीं था, बल्कि उनके जीवन का मिशन बन गया। उन्होंने शुरुआत से ही खुद को उसी दिशा में तैयार करना शुरू कर दिया। पढ़ाई के प्रति गंभीरता, विषयों की समझ और अनुशासन धीरे-धीरे उनकी आदत बनते गए।

हालांकि सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता। हिमाली को भी असफलता का सामना करना पड़ा। बीपीएससी के पहले प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिली। यह उनके लिए निराशाजनक क्षण था। लंबे समय तक की गई मेहनत के बाद जब परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आया, तो मानसिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक था।

लेकिन हिमाली ने असफलता को हार नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी कमजोरियों का विश्लेषण किया और समझा कि किन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। उन्होंने तैयारी की रणनीति बदली, पढ़ाई का तरीका सुधारा और नए आत्मविश्वास के साथ फिर से तैयारी शुरू की। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुई।

नौकरी के साथ पढ़ाई करना उनकी यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा था। असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियमित जिम्मेदारियां निभाते हुए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए समय निकालना आसान नहीं था। लेकिन हिमाली ने समय प्रबंधन को अपनी सफलता का आधार बनाया।

उन्होंने कभी सिर्फ घंटों की संख्या पर फोकस नहीं किया। उनका मानना था कि पढ़ाई की गुणवत्ता समय से अधिक महत्वपूर्ण होती है। इसलिए उन्होंने रोजाना छोटे-छोटे लक्ष्य तय किए और उन्हें हर हाल में पूरा करने का प्रयास किया। इस आदत ने उनकी तैयारी को व्यवस्थित और प्रभावी बनाया।

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल और सोशल मीडिया प्रतियोगी छात्रों के लिए बड़ी चुनौती बन चुके हैं। हिमाली ने इस चुनौती को समझते हुए मोबाइल के उपयोग को बेहद सीमित रखा। उनका मानना है कि सफलता पाने के लिए ध्यान भटकाने वाली चीजों से दूरी बनाना जरूरी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर समय गंवाने के बजाय अपनी ऊर्जा पढ़ाई और आत्मविकास में लगाई।

हिमाली के अनुसार किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए तीन बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं—अनुशासन, निरंतरता और ईमानदार मेहनत। उनका कहना है कि शॉर्टकट से सफलता संभव नहीं होती। लगातार छोटे प्रयास ही बड़े परिणाम देते हैं।

अब हिमाली राज के जीवन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। जुलाई से उनकी ट्रेनिंग शुरू होगी, जहां वे प्रशासनिक सेवा की नई जिम्मेदारियों के लिए तैयार होंगी। एसडीएम के रूप में उनकी भूमिका सिर्फ एक पद नहीं बल्कि समाज के लिए सेवा का अवसर होगी।

हिमाली की सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। यह उन सभी युवाओं के लिए प्रेरणा है जो कठिन परिस्थितियों के कारण अपने सपनों को छोड़ने का सोचते हैं। उनकी कहानी बताती है कि संघर्ष चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर हौसला मजबूत हो तो मंजिल जरूर मिलती है।

मां की याद, नानी का आशीर्वाद, परिवार का सहयोग और अपनी अथक मेहनत—इन्हीं चार स्तंभों पर हिमाली ने सफलता की इमारत खड़ी की। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि सपने कभी परिस्थितियों से छोटे नहीं होते। अगर मन में दृढ़ संकल्प हो तो हर मुश्किल रास्ता भी मंजिल तक पहुंचा सकता है।

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