भागलपुर प्रमंडल में बाढ़ और सुखाड़ से निपटने की तैयारी तेज, आठ जिलों की तैयारियों की हुई विस्तृत समीक्षा

भागलपुर। मानसून के मौसम को देखते हुए भागलपुर प्रमंडल में संभावित बाढ़ और सुखाड़ की स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में भागलपुर प्रमंडल के अंतर्गत आने वाले आठ जिलों में आपदा प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाओं की विस्तृत समीक्षा की गई। आयुक्त, मुंगेर सह भागलपुर प्रमंडल की अध्यक्षता में आयोजित ऑनलाइन समीक्षा बैठक में बाढ़ और सुखाड़ से निपटने के लिए की जा रही तैयारियों का बिंदुवार आकलन किया गया।

बैठक का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि संभावित प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत एवं बचाव कार्य बिना किसी बाधा के तेजी से संचालित किए जा सकें। प्रशासनिक अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया कि सभी जरूरी संसाधनों और व्यवस्थाओं को समय रहते तैयार कर लिया जाए ताकि आम जनता को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

समीक्षा बैठक में भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, जमुई, खगड़िया, बेगूसराय और शेखपुरा जिलों के अधिकारियों ने भाग लिया। सभी जिलों से बाढ़ एवं सुखाड़ को लेकर तैयारियों की अद्यतन रिपोर्ट ली गई। इस दौरान प्रत्येक जिले की भौगोलिक स्थिति, संवेदनशील क्षेत्रों और संभावित जोखिमों के आधार पर तैयारियों का मूल्यांकन किया गया।

बैठक में सबसे पहले अधिष्ठापित वर्षा मापक यंत्रों की स्थिति की समीक्षा की गई। आयुक्त ने अधिकारियों से पूछा कि सभी वर्षा मापक उपकरण सही तरीके से कार्य कर रहे हैं या नहीं, क्योंकि समय पर वर्षा संबंधी डेटा प्राप्त होना आपदा प्रबंधन की पहली आवश्यकता है। सटीक वर्षा आंकड़ों के आधार पर प्रशासन पहले से अलर्ट जारी कर सकता है और जोखिम वाले क्षेत्रों में राहत तैयारियां तेज कर सकता है।

इसके अलावा संकटग्रस्त व्यक्तियों के समूहों की पहचान पर भी विशेष जोर दिया गया। आयुक्त ने निर्देश दिया कि संभावित बाढ़ या सुखाड़ की स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले लोगों की सूची पहले से तैयार रखी जाए। इसमें दिव्यांगजन, निराश्रित व्यक्ति, गंभीर रूप से बीमार लोग, छोटे बच्चे, वृद्धजन, गर्भवती महिलाएं और धात्री माताएं शामिल हैं। प्रशासन को निर्देश दिया गया कि इन सभी श्रेणियों के लोगों तक राहत और सहायता प्राथमिकता के आधार पर पहुंचाई जाए।

तटबंधों की सुरक्षा भी समीक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय रही। बिहार के कई जिलों में नदियों के जलस्तर बढ़ने पर तटबंधों पर दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में तटबंधों की मजबूती और संवेदनशील स्थानों की निगरानी बेहद जरूरी होती है। अधिकारियों से तटबंधों की मरम्मत, निरीक्षण और निगरानी की वर्तमान स्थिति की जानकारी ली गई। आयुक्त ने निर्देश दिया कि कमजोर स्थलों की पहचान कर तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई की जाए।

आपदा नियंत्रण कक्षों की स्थापना और उनके संचालन की स्थिति पर भी चर्चा हुई। प्रत्येक जिले में कंट्रोल रूम सक्रिय रखने का निर्देश दिया गया ताकि किसी भी आपात स्थिति में त्वरित सूचना का आदान-प्रदान हो सके। नियंत्रण कक्षों की सक्रियता राहत कार्यों के समन्वय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

बैठक में नावों की उपलब्धता पर विशेष समीक्षा की गई। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में नावें राहत और बचाव का सबसे प्रभावी साधन होती हैं। अधिकारियों से पूछा गया कि कितनी नावें उपलब्ध हैं, उनकी स्थिति क्या है और आवश्यकता पड़ने पर कितनी अतिरिक्त नावें तुरंत उपलब्ध कराई जा सकती हैं। साथ ही नाव चालकों और बचाव टीमों की तैयारी पर भी चर्चा की गई।

राहत सामग्री की उपलब्धता भी समीक्षा के केंद्र में रही। तैयार खाद्य सामग्री की आपूर्ति के लिए निविदा प्रक्रिया की स्थिति, चयनित एजेंसियों और वितरण व्यवस्था की जानकारी ली गई। आयुक्त ने स्पष्ट किया कि आपदा के समय भोजन की उपलब्धता में किसी प्रकार की कमी नहीं होनी चाहिए। इसके लिए सभी जिलों को पहले से पर्याप्त व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए।

पॉलिथीन शीट्स की उपलब्धता और वितरण योजना पर भी चर्चा हुई। बाढ़ के दौरान विस्थापित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय अत्यंत आवश्यक होता है। इसलिए जिलों को निर्देश दिया गया कि पर्याप्त मात्रा में पॉलिथीन शीट्स और अन्य राहत सामग्री सुरक्षित रखी जाए।

चिन्हित बाढ़ आश्रय स्थलों की तैयारी की भी विस्तृत समीक्षा की गई। अधिकारियों से पूछा गया कि कितने बाढ़ आश्रय स्थल तैयार हैं और उनमें आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। आश्रय स्थलों में शौचालय, पेयजल, रोशनी और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।

सामुदायिक रसोई की संख्या और संचालन की रूपरेखा भी बैठक में महत्वपूर्ण विषय रही। बाढ़ के दौरान सामुदायिक रसोई प्रभावित परिवारों के लिए भोजन उपलब्ध कराने का प्रमुख माध्यम होती हैं। आयुक्त ने निर्देश दिया कि इनके संचालन की स्पष्ट योजना बनाई जाए ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत शुरू किया जा सके।

स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी पर भी विशेष ध्यान दिया गया। बैठक में आवश्यक मानव दवाओं की उपलब्धता, मोबाइल मेडिकल टीम और मेडिकल कैंप की तैयारी की समीक्षा की गई। संभावित बाढ़ के दौरान जलजनित बीमारियों, संक्रमण और महामारी का खतरा बढ़ जाता है। इसे देखते हुए स्वास्थ्य विभाग को पहले से पर्याप्त दवाइयां और चिकित्सा संसाधन उपलब्ध रखने को कहा गया।

पशुधन सुरक्षा को भी आपदा प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया। बैठक में पशु चारा और पशु औषधियों की उपलब्धता पर चर्चा हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन आजीविका का बड़ा आधार होता है, इसलिए उनके संरक्षण के लिए अलग से रणनीति तैयार करने का निर्देश दिया गया।

शुद्ध पेयजल की उपलब्धता, सड़क मरम्मत, परिवहन व्यवस्था और आकस्मिक फसल योजना की भी समीक्षा की गई। इसके अलावा संपूर्ति पोर्टल के अद्यतन, नोडल पदाधिकारियों की प्रतिनियुक्ति तथा जनरेटर एवं पेट्रोमैक्स जैसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर भी अधिकारियों से रिपोर्ट ली गई।

आयुक्त प्रेम सिंह मीणा ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया कि संभावित बाढ़ एवं सुखाड़ की चुनौती को गंभीरता से लें और हर स्तर पर तैयारियां समय रहते पूरी करें। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन में तैयारी ही सबसे बड़ा हथियार है। यदि संसाधन पहले से तैयार रहें, तो राहत एवं बचाव कार्य अधिक प्रभावी ढंग से संचालित किए जा सकते हैं।

कुल मिलाकर भागलपुर प्रमंडल में आयोजित यह समीक्षा बैठक आने वाले मानसून सीजन को लेकर प्रशासन की गंभीरता को दर्शाती है। बाढ़ और सुखाड़ दोनों स्थितियों के लिए व्यापक तैयारियां यह संकेत देती हैं कि प्रशासन इस बार किसी भी आपदा से निपटने के लिए पहले से ज्यादा सतर्क और सक्रिय है। यदि निर्देशों के अनुसार सभी तैयारियां समय पर पूरी होती हैं, तो आपदा की स्थिति में जनहानि और नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • ये भी पढ़े..

    पटना हाईकोर्ट सख्त: बेऊर में अतिक्रमण और जलजमाव मामले पर सरकार से मांगी रिपोर्ट, अधिकारियों की कार्यशैली पर उठाए सवाल

    Share Add as a preferred…