फादर्स डे पर बेटे ने दिया सबसे बड़ा तोहफा: मस्कुलर डिस्ट्रॉफी से जूझते हुए BPSC पास कर बने SDM, पिता की आंखों में छलक पड़े खुशी के आंसू

मुजफ्फरपुर: फादर्स डे के मौके पर बिहार के मुजफ्फरपुर से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पिता-पुत्र के रिश्ते को नई पहचान दे दी है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे प्रत्यूष प्रभाकर ने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की परीक्षा पास कर बिहार प्रशासनिक सेवा (BAS) में जगह बनाई है। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल परिवार बल्कि पूरे बिहार को गौरवान्वित किया है।

मस्कुलर डिस्ट्रॉफी को हराकर बने अधिकारी

मुजफ्फरपुर के मिठनपुरा निवासी प्रत्यूष प्रभाकर बचपन से ही मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी) जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। बीमारी के कारण उनके शरीर का निचला हिस्सा प्रभावित हो गया और चलना-फिरना बेहद मुश्किल हो गया। लेकिन शारीरिक चुनौतियां उनके सपनों के सामने कभी बाधा नहीं बन सकीं।

BPSC परीक्षा में प्रत्यूष ने 1098वीं ऑल इंडिया रैंक हासिल की, जबकि OH कैटेगरी में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इस शानदार प्रदर्शन के आधार पर उन्हें बिहार प्रशासनिक सेवा में चयनित किया गया है।

“जो कुछ हूं, पिता की वजह से हूं”

अपनी सफलता का श्रेय प्रत्यूष सबसे पहले अपने पिता संजय कुमार को देते हैं। भावुक होकर वे कहते हैं कि उनके पिता सिर्फ अभिभावक नहीं बल्कि हर संघर्ष में उनके सबसे बड़े सहारा बने।

“बचपन में पिताजी मुझे ट्राईसाइकिल पर बैठाकर स्कूल ले जाते थे। पढ़ाई से लेकर हर जरूरत में उन्होंने मेरा साथ दिया। आज मैं जो कुछ भी हूं, उनके त्याग और समर्पण की वजह से हूं।”

फादर्स डे पर मिला जिंदगी का सबसे बड़ा उपहार

प्रत्यूष के पिता संजय कुमार कहते हैं कि बेटे की सफलता उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसी है।

“हर परीक्षा में उसके साथ जाना, सेंटर तक पहुंचाना, वापस लाना, उसकी हर जरूरत का ध्यान रखना मेरी जिम्मेदारी थी। आज फादर्स डे पर बेटे ने SDM बनकर मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा उपहार दिया है।”

तीन बार असफलता, चौथे प्रयास में मिली मंजिल

प्रत्यूष का सफर आसान नहीं रहा। उन्होंने BPSC परीक्षा में लगातार तीन बार असफलता का सामना किया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

चौथे प्रयास में उन्हें सफलता मिली और उनका प्रशासनिक सेवा में चयन हो गया।

“कई बार निराशा हुई, लेकिन परिवार ने कभी हिम्मत टूटने नहीं दी। इस बार परिणाम आया तो विश्वास ही नहीं हुआ।”

रोज 7 घंटे पढ़ाई, घर से की तैयारी

बीमारी के कारण बाहर जाकर कोचिंग करना संभव नहीं था। ऐसे में प्रत्यूष ने घर पर रहकर सेल्फ स्टडी और ऑनलाइन संसाधनों की मदद से तैयारी की।

वे बताते हैं कि नियमितता ही उनकी सफलता का सबसे बड़ा मंत्र रही।

“मैं रोज करीब 7 घंटे पढ़ाई करता था। नियमितता बनाए रखना ही मेरी सबसे बड़ी ताकत थी।”

मां हैं विश्वविद्यालय में प्रोफेसर

प्रत्यूष की मां नीलम कुमारी शिक्षा जगत से जुड़ी हैं और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में बॉटनी विभाग की प्रोफेसर हैं। परिवार का शैक्षणिक माहौल भी उनकी सफलता में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

गांव के युवाओं के लिए बने प्रेरणा

प्रत्यूष प्रभाकर की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो किसी न किसी शारीरिक, आर्थिक या सामाजिक चुनौती का सामना कर रहे हैं।

उन्होंने साबित कर दिया कि यदि इरादे मजबूत हों, मेहनत लगातार जारी रहे और परिवार का साथ मिले, तो कोई भी बाधा सफलता के रास्ते में दीवार नहीं बन सकती।

एक बेटे की जीत, एक पिता के विश्वास की जीत

प्रत्यूष की सफलता सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा पास करने की कहानी नहीं है। यह एक पिता के समर्पण, धैर्य, संघर्ष और विश्वास की भी जीत है।

फादर्स डे पर यह कहानी बताती है कि पिता सिर्फ जन्म नहीं देते, बल्कि अपने बच्चों के सपनों को भी जीते हैं। और जब वही सपना पूरा होता है, तो उसकी खुशी दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है।

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