
पटना। बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कला-कौशल को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है। नालंदा की प्रसिद्ध बावन बूटी साड़ी एवं फैब्रिक, गया की पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट कला और भोजपुर की पारंपरिक पिढ़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त होने के बाद राज्यभर में खुशी का माहौल है। इस उपलब्धि पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राज्य के शिल्पकारों, बुनकरों, कलाकारों और इस उपलब्धि से जुड़े सभी संस्थानों को बधाई दी है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि केवल तीन उत्पादों की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय कला-कौशल को वैश्विक मंच पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि वर्षों से अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर इन कलाओं को जीवित रखने वाले कारीगरों और कलाकारों का यह सम्मान पूरे बिहार के लिए गर्व का विषय है।
उन्होंने कहा कि बिहार की लोक कला, हस्तशिल्प और हथकरघा परंपराएं राज्य की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इन कलाओं में न केवल इतिहास और परंपरा की झलक दिखाई देती है, बल्कि यहां की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता भी परिलक्षित होती है। जीआई टैग मिलने के बाद इन उत्पादों को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा और उनकी विशिष्ट पहचान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती मिलेगी।
क्या होता है GI टैग और क्यों है महत्वपूर्ण?
भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी विशेष गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या पहचान किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। यह टैग उस उत्पाद की मौलिकता और विशिष्टता को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि उस उत्पाद का नाम केवल उसी क्षेत्र के अधिकृत उत्पादकों द्वारा उपयोग किया जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार जीआई टैग मिलने के बाद उत्पादों की बाजार में विश्वसनीयता बढ़ती है, नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है और स्थानीय उत्पादकों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि दुनिया भर में जीआई टैग को पारंपरिक उत्पादों की पहचान और संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
बावन बूटी बुनकरी को मिली नई पहचान
नालंदा की बावन बूटी साड़ी और फैब्रिक बिहार की सबसे प्रसिद्ध हथकरघा परंपराओं में शामिल है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता कपड़े पर बुने गए सूक्ष्म और आकर्षक डिजाइन हैं। इन डिजाइनों में बौद्ध प्रतीक, प्राकृतिक आकृतियां और पारंपरिक कलात्मक पैटर्न शामिल होते हैं।
बिहार के बुनकर समुदाय ने दशकों से इस कला को जीवित रखा है। बावन बूटी वस्त्रों की पहचान उनकी उत्कृष्ट बुनाई और सांस्कृतिक महत्व के कारण देशभर में रही है। जीआई टैग मिलने के बाद इस पारंपरिक बुनकरी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नई पहचान मिलने की उम्मीद है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि उन बुनकर परिवारों के समर्पण और मेहनत का परिणाम है जिन्होंने पीढ़ियों से इस कला को संरक्षित रखा। इससे नालंदा क्षेत्र के बुनकरों को आर्थिक रूप से भी बड़ा लाभ मिल सकता है।
गया की पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट कला को मिला संरक्षण
गया जिले की पत्थरकट्टी स्टोन क्राफ्ट कला भी अपनी अनूठी पहचान के लिए जानी जाती है। इस क्षेत्र के कारीगर वर्षों से पत्थरों पर उत्कृष्ट नक्काशी और मूर्तिकला का कार्य करते रहे हैं। यहां तैयार होने वाली मूर्तियां, धार्मिक प्रतिमाएं और सजावटी कलाकृतियां देश-विदेश तक पहुंचती रही हैं।
पत्थर पर बारीक और आकर्षक डिजाइन उकेरने की यह कला बिहार की पारंपरिक शिल्प विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को न केवल कानूनी संरक्षण मिलेगा, बल्कि इसके उत्पादों की मांग और बाजार मूल्य में भी वृद्धि होने की संभावना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गया की यह कला बिहार के शिल्प कौशल की उत्कृष्ट मिसाल है। इसके संरक्षण और प्रचार से स्थानीय कारीगरों के जीवन स्तर में सुधार आएगा और युवाओं को भी इस क्षेत्र में आगे आने की प्रेरणा मिलेगी।
भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग को मिला राष्ट्रीय सम्मान
भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग बिहार की लोक कला परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह कला विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों पर बनाई जाती रही है। पारंपरिक रंगों और प्रतीकों से सजी यह चित्रकला स्थानीय जीवन, परंपराओं और लोक संस्कृति को अभिव्यक्त करती है।
पिढ़िया पेंटिंग में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाने वाली महिला कलाकारों ने इसे आज तक जीवित रखा है। जीआई टैग मिलने से इस लोक कला को नई पहचान मिलेगी और इसे राष्ट्रीय एवं वैश्विक मंचों तक पहुंचाने का अवसर प्राप्त होगा।
मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से उन महिला कलाकारों की सराहना की जिन्होंने वर्षों तक इस परंपरा को संरक्षित रखने में योगदान दिया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान बिहार की महिला सशक्तिकरण यात्रा का भी प्रतीक है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल
मुख्यमंत्री ने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों के विपणन, ब्रांडिंग और निर्यात की संभावनाएं काफी बढ़ जाएंगी। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक कला और शिल्प से जुड़े परिवारों को आर्थिक मजबूती मिलेगी, जिससे गांवों की अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्राप्त होगी।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार पारंपरिक उद्योगों, हस्तशिल्प, हथकरघा और लोक कलाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए लगातार कार्य कर रही है। सरकार का उद्देश्य इन कलाओं को आधुनिक बाजार से जोड़ना और कारीगरों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।
विभिन्न संस्थाओं की भूमिका की सराहना
मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि के लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड), संबंधित विभागों, उत्पादक समूहों, शिल्पकार संगठनों और अन्य हितधारकों की भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि विभिन्न संस्थाओं के समन्वित प्रयासों के कारण यह सफलता संभव हो सकी है।
उन्होंने उन सभी कारीगरों, बुनकरों और कलाकारों को भी बधाई दी जिन्होंने अपनी कला और मेहनत के बल पर इन उत्पादों को इस मुकाम तक पहुंचाया। मुख्यमंत्री के अनुसार यह उपलब्धि बिहार की सांस्कृतिक शक्ति और रचनात्मक क्षमता का प्रमाण है।
अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी मिलेगा प्रोत्साहन
मुख्यमंत्री ने विश्वास जताया कि इस सफलता से बिहार के अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने कहा कि राज्य में अनेक ऐसे उत्पाद और कलाएं मौजूद हैं जो विशिष्ट पहचान की पात्र हैं। सरकार उनके संरक्षण और विकास के लिए भी लगातार प्रयास कर रही है।
उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे राष्ट्रीय अभियानों को भी मजबूती प्रदान करेगी। स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलने से न केवल आर्थिक विकास को गति मिलेगी बल्कि सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण भी सुनिश्चित होगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कलाओं के लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है। नालंदा की बावन बूटी बुनकरी, गया की पत्थर शिल्पकला और भोजपुर की पिढ़िया पेंटिंग को मिला जीआई टैग पूरे राज्य के लिए गर्व की बात है और आने वाले समय में यह उपलब्धि बिहार की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


