छात्रा अपहरण मामले में बड़ी कार्रवाई: पूर्णिया SP ने अपर थाना अध्यक्ष पुष्पा कुमारी को किया निलंबित, जांच में मिली गंभीर लापरवाही

पूर्णिया। बिहार के पूर्णिया जिले में एक नाबालिग छात्रा के अपहरण मामले में पुलिस विभाग के भीतर बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली है। जिले की पुलिस अधीक्षक स्वीटी सहरावत ने धमदाहा थाना में पदस्थापित अपर थाना अध्यक्ष पुष्पा कुमारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई एक छात्रा के अपहरण मामले की जांच में गंभीर लापरवाही, चिकित्सीय परीक्षण नहीं कराने और केस डायरी में कथित अनियमितताओं के आरोपों के बाद की गई है।

पुलिस विभाग की इस कार्रवाई ने जिले में व्यापक चर्चा पैदा कर दी है। नाबालिगों से जुड़े मामलों में पुलिस की जिम्मेदारी और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। वहीं पुलिस मुख्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट संकेत दिया है कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

जनता दरबार में पहुंची शिकायत से खुला मामला

जानकारी के अनुसार इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब अपहृत छात्रा के पिता चंद्रशेखर सिंह ने पुलिस अधीक्षक के जनता दरबार में पहुंचकर अपनी शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने 4 जून को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर एक आवेदन सौंपा, जिसमें कई गंभीर आरोप लगाए गए थे।

आवेदन में कहा गया था कि मामले के मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की गई है और पीड़ित परिवार को लगातार डराया-धमकाया जा रहा है। इसके अलावा यह भी आरोप लगाया गया कि छात्रा का आवश्यक मेडिकल परीक्षण नहीं कराया गया और जांच से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को केस डायरी में सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया।

पीड़िता के पिता ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी बेटी से दबाव बनाकर कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए। साथ ही उन्होंने छात्रा की मानसिक स्थिति को देखते हुए महिला दंडाधिकारी की उपस्थिति में न्यायालय के समक्ष उसका बयान दर्ज कराने की मांग की।

SP ने गंभीरता से लिया मामला

शिकायत मिलने के बाद पुलिस अधीक्षक स्वीटी सहरावत ने मामले को गंभीरता से लिया और तत्काल जांच के आदेश दिए। अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच करने और आरोपों की सत्यता का पता लगाने का निर्देश दिया गया।

जांच के दौरान पुलिस अधिकारियों ने केस डायरी, जांच से जुड़े दस्तावेज, पीड़िता की स्थिति और अनुसंधान प्रक्रिया का विस्तृत परीक्षण किया। इस दौरान कई ऐसे तथ्य सामने आए जिन्होंने जांच अधिकारियों को भी चौंका दिया।

मेडिकल परीक्षण को लेकर सामने आई बड़ी बात

जांच में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य छात्रा के मेडिकल परीक्षण से जुड़ा सामने आया। रिपोर्ट के अनुसार अपहृता को बरामद किए जाने के बाद उसका चिकित्सीय परीक्षण कराना आवश्यक था, लेकिन यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

जांच के दौरान यह आरोप सही पाया गया कि संबंधित पुलिस अधिकारी ने छात्रा को मेडिकल परीक्षण नहीं कराने के लिए प्रभावित किया था। बताया गया कि इसके परिणामस्वरूप पीड़िता ने चिकित्सीय परीक्षण कराने से इनकार कर दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार अपहरण और नाबालिगों से जुड़े मामलों में मेडिकल परीक्षण जांच का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इससे कई महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाए जा सकते हैं जो न्यायिक प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में मेडिकल जांच नहीं होना पूरे मामले को प्रभावित कर सकता है।

केस डायरी को लेकर भी उठे सवाल

जांच के दौरान केस डायरी में दर्ज तथ्यों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े हुए। आरोप था कि मामले से जुड़े कुछ तथ्यों को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया और जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही।

पुलिस अधिकारियों ने जब दस्तावेजों की समीक्षा की तो पाया कि कुछ बिंदुओं पर जांच की दिशा और वास्तविक परिस्थितियों के बीच अंतर दिखाई दे रहा है। इसी आधार पर केस डायरी में कथित अनियमितताओं की जांच भी शुरू की गई।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में केस डायरी सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक होती है। यदि इसमें तथ्यों को सही तरीके से दर्ज नहीं किया जाता तो अदालत में अभियोजन पक्ष की स्थिति कमजोर हो सकती है।

आरोपी को फायदा पहुंचाने का आरोप

जांच रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि संबंधित पुलिस अधिकारी की कार्यप्रणाली से आरोपी पक्ष को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलने की संभावना बन रही थी। अधिकारियों का मानना है कि यदि जांच के महत्वपूर्ण चरणों में लापरवाही बरती जाती है तो इसका सीधा प्रभाव न्यायिक प्रक्रिया पर पड़ता है।

पुलिस मुख्यालय के अनुसार किसी भी जांच अधिकारी की पहली जिम्मेदारी निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से अनुसंधान करना होती है। यदि जांच में त्रुटियां होती हैं तो इससे न केवल पीड़ित पक्ष प्रभावित होता है बल्कि दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ सकती है।

छात्रा की मानसिक स्थिति को लेकर चिंता

जांच के दौरान यह भी जानकारी सामने आई कि छात्रा को 23 मई 2026 को बरामद कर लिया गया था। हालांकि उसके बाद उसकी मानसिक स्थिति को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की गईं।

परिजनों का कहना था कि छात्रा मानसिक रूप से सामान्य स्थिति में नहीं थी और उसे विशेष देखभाल तथा कानूनी संरक्षण की आवश्यकता थी। ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और विशेष प्रक्रिया अपनाना आवश्यक माना जाता है।

बाल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि नाबालिग पीड़ितों से जुड़े मामलों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जांच के दौरान उनके मानसिक और भावनात्मक पक्ष का भी ध्यान रखना जरूरी होता है।

SP ने माना गंभीर लापरवाही

पुलिस अधीक्षक स्वीटी सहरावत ने जांच रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद माना कि मामले में गंभीर लापरवाही हुई है। उनके अनुसार नाबालिग छात्रा से जुड़े मामले में जिस स्तर की संवेदनशीलता और जिम्मेदारी अपेक्षित थी, उसका पालन नहीं किया गया।

उन्होंने स्पष्ट किया कि पुलिस विभाग में इस प्रकार की कार्यशैली स्वीकार्य नहीं है। कानून के अनुसार प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और किसी भी प्रकार की अनियमितता पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

तत्काल प्रभाव से निलंबन

जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर अपर थाना अध्यक्ष पुष्पा कुमारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। निलंबन अवधि के दौरान उनका मुख्यालय पुलिस केंद्र पूर्णिया निर्धारित किया गया है।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार निलंबन के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया भी आगे बढ़ सकती है। मामले की विस्तृत समीक्षा के बाद आगे के कदम उठाए जाएंगे।

पुलिस विभाग के लिए भी एक संदेश

यह कार्रवाई केवल एक अधिकारी के निलंबन तक सीमित नहीं मानी जा रही है, बल्कि इसे पूरे पुलिस विभाग के लिए एक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा।

फिलहाल इस मामले की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। पीड़ित परिवार को उम्मीद है कि निष्पक्ष जांच के जरिए दोषियों को सजा मिलेगी और मामले में न्याय सुनिश्चित होगा। वहीं पुलिस विभाग इस घटना के बाद अपनी जांच प्रक्रियाओं और जवाबदेही व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठा सकता है।

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