पश्चिम बंगाल में TMC में बढ़ी अंदरूनी कलह, बागी सांसदों के दावों से ममता बनर्जी की बढ़ीं मुश्किलें

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) अब संगठनात्मक चुनौतियों से भी जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की आवाजें अब खुलकर सामने आने लगी हैं और कई सांसदों के बागी रुख ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में बारासात से सांसद काकोली घोष दस्तीदार हैं, जिनके हालिया बयान ने राज्य की राजनीति को और गर्म कर दिया है।

चुनाव परिणामों के बाद से ही पार्टी के अंदर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर असंतोष की खबरें सामने आती रही हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस लगातार यह दावा करती रही है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है, लेकिन हाल के घटनाक्रम इस दावे पर सवाल खड़े कर रहे हैं। काकोली घोष के बयानों और कुछ सांसदों की बैठकों ने संकेत दिए हैं कि पार्टी के भीतर एक बड़ा राजनीतिक बदलाव आकार ले सकता है।

दरअसल, काकोली घोष दस्तीदार ने हाल ही में तृणमूल कांग्रेस के विभिन्न पदों से इस्तीफा देने के बाद एक ऐसा बयान दिया जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। उन्होंने दावा किया कि पार्टी के असंतुष्ट सांसदों का एक समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को समर्थन देने के पक्ष में है। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उनके साथ लगभग 19 सांसदों का समर्थन मौजूद है। यदि यह दावा सही साबित होता है तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जाएगा।

भारतीय राजनीति में दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी पार्टी के सांसदों के अलग गुट को वैध मान्यता प्राप्त करने के लिए कुल सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। ऐसे में काकोली घोष का 19 सांसदों के समर्थन का दावा राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अभी तक इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और कई सांसदों ने सार्वजनिक रूप से इस तरह की चर्चाओं से दूरी भी बनाई है।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली में हाल के दिनों में कई सांसदों की बैठकें हुईं, जिनमें पार्टी के भविष्य और संगठनात्मक स्थिति पर चर्चा की गई। बताया जा रहा है कि इन बैठकों में तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नई राजनीतिक दिशा तलाशने जैसे मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ। इन चर्चाओं ने विपक्ष और सत्ताधारी दल दोनों के बीच राजनीतिक गतिविधियों को तेज कर दिया है।

इस बीच, पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय से ममता बनर्जी के प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे नेता शुभेंदु अधिकारी का नाम भी इन बैठकों को लेकर चर्चा में आया है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि कुछ बैठकों में उनकी मौजूदगी रही, जिससे राजनीतिक अटकलें और तेज हो गईं। हालांकि इन बैठकों को लेकर अलग-अलग पक्षों की ओर से अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं।

सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जिस समय ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA की बैठकों और रणनीतिक चर्चाओं में व्यस्त थीं, उसी दौरान दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट नेताओं की सक्रियता चर्चा का विषय बनी रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय बन सकता है, क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा दोनों स्तरों पर संगठनात्मक एकजुटता किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है।

काकोली घोष के बयान के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद कीर्ति आजाद ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से बागी गुट के दावों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ सूचियां और दावे राजनीतिक उद्देश्य से प्रचारित किए जा रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि जिन सांसदों के नाम सामने लाए जा रहे हैं, उनमें से कई ने किसी प्रकार के दस्तावेज या समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उनके अनुसार तृणमूल कांग्रेस के भीतर टूट की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

कीर्ति आजाद ने अपने बयान में यह भी कहा कि विपक्षी दलों द्वारा चलाए जा रहे राजनीतिक अभियानों का उद्देश्य केवल भ्रम पैदा करना है और पार्टी को कमजोर दिखाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने भरोसा जताया कि तृणमूल कांग्रेस अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मजबूती से खड़ी है और किसी भी तरह की राजनीतिक चुनौती का सामना करने में सक्षम है।

दूसरी ओर, बागी खेमे से जुड़े नेताओं का कहना है कि पार्टी के भीतर लंबे समय से कुछ वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की जा रही थी। उनका आरोप है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में कई अनुभवी सांसदों को महत्व नहीं दिया गया, जिसके कारण असंतोष बढ़ता गया। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने इन आरोपों पर अभी तक कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है।

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम को और अधिक गंभीर तब माना गया जब तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का फैसला किया। उनके इस्तीफे ने राजनीतिक चर्चाओं को नई दिशा दे दी। उन्होंने पार्टी और शासन व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए, जिसके बाद विपक्ष को सरकार और पार्टी नेतृत्व पर हमला बोलने का अवसर मिल गया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं और सांसदों को एकजुट बनाए रखने की है। यदि असंतोष की यह स्थिति आगे भी बनी रहती है तो इसका असर भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों और चुनावी तैयारियों पर पड़ सकता है।

हालांकि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व अभी भी यह दावा कर रहा है कि पार्टी पूरी तरह संगठित और मजबूत है, लेकिन लगातार सामने आ रही राजनीतिक गतिविधियां और नेताओं के बयान संकेत दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में आने वाले दिनों में और बड़े घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे निपटता है और क्या बागी नेताओं को मनाने में सफल हो पाता है या नहीं।

फिलहाल इतना तय है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है और तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही यह खींचतान आने वाले समय में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति दोनों पर प्रभाव डाल सकती है।

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