
पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी और प्रशासनिक बदलाव देखने को मिला है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति का पुनर्गठन किए जाने के बाद कई नए चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। खास तौर पर नबीनगर विधायक चेतन आनंद और मोकामा की विधायक नीलम देवी को समिति में शामिल किए जाने को बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, मुख्यमंत्री इस समिति के अध्यक्ष होंगे। वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। दोनों को राज्य मंत्री का दर्जा भी दिया जाएगा। इसके अलावा उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी को समिति का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है।
राज्य स्तरीय कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति को प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों दृष्टिकोण से अहम माना जाता है। यह समिति सरकार की विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की निगरानी तथा समन्वय का कार्य करती है। ऐसे में इसमें शामिल नेताओं को सरकार और संगठन के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है।
समिति में कुल 12 सदस्यों को शामिल किया गया है। इनमें चेतन आनंद और नीलम देवी के अलावा कई प्रभावशाली नेताओं को जगह मिली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल प्रशासनिक नियुक्ति नहीं बल्कि आगामी राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम भी है।
नबीनगर से विधायक चेतन आनंद लंबे समय से बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बने हुए हैं। वह पूर्व सांसद और चर्चित राजनीतिक चेहरा के पुत्र हैं। पिछले कुछ समय से उनके समर्थकों के बीच यह चर्चा थी कि उन्हें सरकार में बड़ी भूमिका मिल सकती है। हालांकि मंत्रिमंडल विस्तार में जगह नहीं मिलने के बाद उनके समर्थकों में नाराजगी की बातें सामने आई थीं। ऐसे में अब उन्हें समिति में अहम जिम्मेदारी मिलना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस फैसले के जरिए सरकार ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है। एक तरफ संगठन के भीतर असंतुष्ट नेताओं को साधने का प्रयास किया गया है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन को भी ध्यान में रखा गया है।
मोकामा विधायक नीलम देवी को भी समिति में शामिल किए जाने को खास महत्व दिया जा रहा है। नीलम देवी बिहार के चर्चित राजनीतिक चेहरों में गिने जाने वाले की पत्नी हैं। मोकामा क्षेत्र में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़ मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उन्हें समिति में शामिल कर सरकार ने मोकामा और आसपास के इलाकों में अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने की कोशिश की है।
सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि समिति के सदस्यों को उप मंत्री का दर्जा मिलेगा। इसका मतलब यह है कि उन्हें सरकारी सुविधाएं और प्रोटोकॉल भी दिए जाएंगे। वहीं उपाध्यक्षों को राज्य मंत्री स्तर की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि सरकार आने वाले समय में कुछ और नेताओं को भी इसी तरह की जिम्मेदारियां दे सकती है।
समिति में जिन अन्य नेताओं को शामिल किया गया है, उनमें संगीता कुमारी, भरत बिंद, मुरारी प्रसाद गौतम, सिद्धार्थ सौरव, ललन कुमार मंडल, प्रहलाद यादव, जगन्नाथ ठाकुर, राजेश कुमार वर्मा, भारती मेहता और चंदन कुमार सिंह जैसे नाम शामिल हैं। इन नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक और सामाजिक पकड़ मानी जाती है।
बिहार मंत्रिमंडल सचिवालय विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के बाद यह भी संकेत मिले हैं कि समिति में आगे और भी नाम जोड़े जा सकते हैं। कुछ पद अभी रिक्त रखे गए हैं, जिन पर बाद में नियुक्तियां की जा सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में गठबंधन राजनीति के दौर में इस तरह की समितियां केवल प्रशासनिक भूमिका तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि इनके जरिए सत्ता संतुलन साधने की कोशिश भी की जाती है। खासकर तब, जब कई विधायक मंत्री बनने की उम्मीद लगाए बैठे हों और उन्हें कैबिनेट में जगह न मिल पाई हो।
चेतन आनंद के राजनीतिक सफर की बात करें तो वह पहले से जुड़े रहे थे, लेकिन बाद में उन्होंने का दामन थाम लिया। उनके जदयू में आने के बाद से ही यह चर्चा थी कि पार्टी उन्हें बड़ी भूमिका दे सकती है। वहीं उनके पिता आनंद मोहन समय-समय पर पार्टी और राजनीतिक मुद्दों पर खुलकर बयान देते रहे हैं, जिससे कई बार राजनीतिक माहौल भी गर्माया है।
इस फैसले को लेकर विपक्षी दल भी नजर बनाए हुए हैं। कुछ राजनीतिक दल इसे “संतुलन बनाने की राजनीति” बता रहे हैं, जबकि समर्थकों का कहना है कि सरकार अनुभवी और प्रभावशाली नेताओं को जिम्मेदारी देकर प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करना चाहती है।
बिहार की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से लगातार नए समीकरण बनते और बिगड़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में समिति के पुनर्गठन और नए नेताओं को जिम्मेदारी मिलने को आने वाले चुनावी समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
फिलहाल इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन नई नियुक्तियों का राजनीतिक असर कितना व्यापक होता है और क्या इससे गठबंधन के भीतर चल रही नाराजगी को कम करने में सफलता मिलती है।


