
बिहार में उच्च शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए राज्यपाल एवं कुलाधिपति सैयद अता हसनैन ने चार विश्वविद्यालयों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। समर्थ पोर्टल लागू करने में लगातार लापरवाही बरतने वाले विश्वविद्यालयों से अब स्पष्टीकरण मांगा गया है। राजभवन की ओर से साफ संकेत दिए गए हैं कि यदि तय समय सीमा के भीतर पोर्टल को लागू नहीं किया गया तो संबंधित संस्थानों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई भी की जा सकती है।
राज्य सरकार और राजभवन की बार-बार चेतावनी के बावजूद कई विश्वविद्यालय अभी तक समर्थ पोर्टल के जरिए नामांकन और प्रशासनिक कार्य शुरू नहीं कर पाए हैं। इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए बिहार लोक भवन सचिवालय ने संबंधित विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों से जवाब तलब किया है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब जुलाई 2026 से शुरू होने वाले नए स्नातक सत्र 2026-30 की तैयारी चल रही है।
जानकारी के अनुसार बीआरए बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर, आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय पटना, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय आरा और मगध विश्वविद्यालय बोधगया ने अभी तक समर्थ पोर्टल के माध्यम से नामांकन प्रक्रिया शुरू करने की ठोस तैयारी नहीं की है। इन विश्वविद्यालयों को पहले भी कई बार निर्देश दिए गए थे कि वे मिशन मोड में पोर्टल को लागू करें, लेकिन अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी।
राजभवन से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि राज्यपाल के आदेशों की अनदेखी को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उच्च शिक्षा संस्थानों में डिजिटल व्यवस्था लागू करना सरकार और यूजीसी दोनों की प्राथमिकता है। ऐसे में पोर्टल लागू करने में देरी शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में बाधा मानी जा रही है।
समर्थ पोर्टल को विश्वविद्यालयों में एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य छात्रों के नामांकन से लेकर परीक्षा, फीस भुगतान, शिक्षकों की सेवा पुस्तिका, कर्मचारियों के वेतन, छुट्टी, पदोन्नति और कॉलेज प्रबंधन तक सभी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाना है। इस पोर्टल के जरिए विश्वविद्यालयों के कामकाज में मानवीय हस्तक्षेप कम होगा और भ्रष्टाचार व गड़बड़ी की संभावना भी घटेगी।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने करीब तीन वर्ष पहले देशभर के विश्वविद्यालयों को समर्थ पोर्टल अपनाने का निर्देश दिया था। आयोग का मानना है कि डिजिटल व्यवस्था लागू होने से उच्च शिक्षा संस्थानों में जवाबदेही बढ़ेगी और छात्रों को भी सुविधाएं मिलेंगी। कई राज्यों में यह पोर्टल सफलतापूर्वक लागू हो चुका है, लेकिन बिहार के कुछ विश्वविद्यालय अब भी पीछे चल रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक यूजीसी बिहार के मामलों को विशेष गंभीरता से देख रहा है। आयोग ने संकेत दिया है कि यदि विश्वविद्यालय समय पर समर्थ पोर्टल लागू नहीं करते हैं तो उन्हें मिलने वाले विभिन्न वित्तीय अनुदानों और विकास योजनाओं से बाहर किया जा सकता है। इतना ही नहीं, ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा पाठ्यक्रमों की मान्यता पर भी असर पड़ सकता है।
उच्च शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म लागू होने से विश्वविद्यालयों में लंबे समय से चली आ रही कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। अभी अधिकांश विश्वविद्यालयों में दाखिला, परीक्षा और प्रमाणपत्र से जुड़े कार्यों में छात्रों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। कई बार फाइलें महीनों तक लंबित रहती हैं और छात्रों को कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। समर्थ पोर्टल लागू होने के बाद इन प्रक्रियाओं में तेजी आएगी।
पूर्व कुलपति प्रोफेसर रासबिहारी सिंह ने भी इस मामले को गंभीर बताया है। उनका कहना है कि यूजीसी पारदर्शी और तकनीक आधारित प्रक्रियाओं को बढ़ावा देना चाहता है। यदि कोई विश्वविद्यालय जानबूझकर इस व्यवस्था को लागू करने में देरी करता है तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में फैकल्टी भर्ती, कॉलेज संबद्धता और विभिन्न शैक्षणिक अनुमोदनों को भी डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार समर्थ पोर्टल केवल तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक सुधार है। इससे छात्रों और शिक्षकों के रिकॉर्ड सुरक्षित रहेंगे और किसी भी जानकारी को ऑनलाइन ट्रैक किया जा सकेगा। विश्वविद्यालयों में वित्तीय लेनदेन भी डिजिटल होने से पारदर्शिता बढ़ेगी। फीस भुगतान, छात्रवृत्ति और वेतन जैसी प्रक्रियाओं में भी समय की बचत होगी।
बिहार सरकार पिछले कुछ वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में तकनीक आधारित बदलाव पर जोर दे रही है। स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक डिजिटल सिस्टम लागू करने की कोशिश की जा रही है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालयों में समर्थ पोर्टल लागू करना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि कई विश्वविद्यालयों में तकनीकी संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव और प्रशासनिक सुस्ती इसकी राह में बड़ी बाधा बन रही है।
छात्र संगठनों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों की लापरवाही का सीधा असर छात्रों पर पड़ता है। समय पर नामांकन, परीक्षा और रिजल्ट नहीं होने से हजारों छात्रों का भविष्य प्रभावित होता है। ऐसे में डिजिटल व्यवस्था को जल्द लागू करना जरूरी है ताकि शैक्षणिक सत्र नियमित हो सके।
राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि राज्यपाल के सख्त रुख के बाद संबंधित विश्वविद्यालयों पर दबाव बढ़ेगा। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालय प्रशासन तेजी से तैयारी शुरू करेगा ताकि किसी प्रकार की कार्रवाई से बचा जा सके।
राजभवन की ओर से स्पष्ट संकेत दिए गए हैं कि अब केवल निर्देश जारी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसका पालन भी सुनिश्चित कराया जाएगा। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन समय रहते समर्थ पोर्टल लागू नहीं करता है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जा सकती है। बिहार में उच्च शिक्षा व्यवस्था को डिजिटल और पारदर्शी बनाने की दिशा में यह मामला आने वाले समय में बड़ा प्रशासनिक मुद्दा बन सकता है।


