
पटना, 19 मई 2026: बिहार की राजनीति में इन दिनों जनता दल यूनाइटेड के भीतर चल रही हलचल ने नया मोड़ ले लिया है। पूर्व सांसद आनंद मोहन के लगातार तीखे बयानों और पार्टी नेतृत्व पर खुले हमलों के बीच मंगलवार को एक ऐसी राजनीतिक मुलाकात हुई, जिसने सियासी चर्चाओं को और तेज कर दिया। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अचानक पार्टी के विधान पार्षद संजय सिंह के आवास पहुंचे, जहां दोनों नेताओं के बीच लंबे समय तक बातचीत हुई।
इस मुलाकात को सिर्फ सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे जेडीयू के अंदर चल रही खींचतान और बढ़ती असहजता से जोड़कर देखा जा रहा है। खासतौर पर इसलिए क्योंकि हाल के दिनों में आनंद मोहन लगातार पार्टी और नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक मंचों से नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार और संजय सिंह के बीच संगठन, सरकार और हालिया राजनीतिक बयानों को लेकर विस्तार से चर्चा हुई। हालांकि मुलाकात के बाद किसी भी नेता ने आधिकारिक रूप से बातचीत का पूरा ब्योरा साझा नहीं किया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे बड़ा संदेश माना जा रहा है।
दरअसल, बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद से ही आनंद मोहन के तेवर लगातार बदले हुए नजर आ रहे हैं। खासकर बेटे चेतन आनंद को मंत्री पद नहीं मिलने के बाद उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की है। चेतन आनंद फिलहाल जेडीयू के विधायक हैं, जबकि आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद भी पार्टी से सांसद हैं।
हाल ही में सीतामढ़ी में आयोजित एक कार्यक्रम में आनंद मोहन ने बेहद तीखा बयान देते हुए कहा था कि नीतीश कुमार को उनकी ही पार्टी के लोगों ने “जिंदा दफन” कर दिया है। इस बयान ने बिहार की राजनीति में हलचल मचा दी थी। उन्होंने पार्टी के अंदर फैसलों को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि अब संगठन की पुरानी पहचान खत्म होती जा रही है।
इतना ही नहीं, उन्होंने मंत्री पद को लेकर भी तंज कसते हुए कहा था कि पार्टी अब “थैली वाली पार्टी” बन गई है। उनका इशारा इस ओर था कि कथित रूप से पैसे और प्रभाव के आधार पर लोगों को जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। इस बयान के बाद विपक्ष के साथ-साथ खुद जेडीयू के भीतर भी चर्चा तेज हो गई।
आनंद मोहन के इस हमले के बाद पार्टी नेताओं ने खुलकर जवाब देना शुरू कर दिया। जेडीयू विधान पार्षद संजय सिंह ने सबसे तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि ऐसा बयान कोई मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति ही दे सकता है। संजय सिंह ने यहां तक कह दिया कि अगर जरूरत हो तो आनंद मोहन का इलाज भी कराया जा सकता है।
संजय सिंह ने यह भी चुनौती दी कि अगर आनंद मोहन वास्तव में पार्टी से नाराज हैं, तो पहले अपनी पत्नी और बेटे से इस्तीफा दिलवाकर मैदान में उतरें। तभी उनकी राजनीतिक ताकत का असली पता चलेगा। उनके इस बयान के बाद दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच बयानबाजी और तेज हो गई।
राज्य सरकार की वरिष्ठ मंत्री लेशी सिंह ने भी आनंद मोहन के आरोपों को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि पार्टी में किसी को भी जिम्मेदारी उसकी क्षमता, संगठन के प्रति समर्पण और जनता के बीच उसकी स्वीकार्यता के आधार पर दी जाती है। उन्होंने साफ कहा कि “थैली लेकर मंत्री बनाए जाने” जैसी बातें पूरी तरह निराधार और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।
लेशी सिंह ने यह भी कहा कि नीतीश कुमार लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता हैं और वे हर कार्यकर्ता की क्षमता को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए पार्टी में लिए गए फैसलों पर सवाल उठाना अनुचित है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आनंद मोहन के बयानों ने जेडीयू के अंदर मौजूद असंतोष को सार्वजनिक कर दिया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व फिलहाल इसे खुला विवाद बनने से रोकने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लगातार सामने आ रहे बयान यह संकेत दे रहे हैं कि अंदरखाने सब कुछ सामान्य नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार की राजनीति में आनंद मोहन का एक अलग प्रभाव माना जाता है, खासकर कुछ क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में उनकी पकड़ आज भी मजबूत मानी जाती है। यही वजह है कि उनके बयानों को हल्के में नहीं लिया जा रहा। पार्टी नेतृत्व भी जानता है कि अगर नाराजगी ज्यादा बढ़ी तो इसका असर राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है।
नीतीश कुमार का संजय सिंह के घर पहुंचना भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह मुलाकात सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संगठनात्मक संदेश भी हो सकती है। इससे यह संकेत देने की कोशिश की गई हो कि पार्टी नेतृत्व अपने नेताओं के साथ मजबूती से खड़ा है और किसी भी बयानबाजी का जवाब देने के लिए तैयार है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्ष भी लगातार नजर बनाए हुए है। विपक्षी दलों का कहना है कि जेडीयू के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा और नेताओं के बयान उसी बेचैनी को उजागर कर रहे हैं। हालांकि जेडीयू नेता लगातार यह दावा कर रहे हैं कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और सरकार मजबूती से काम कर रही है।
सोशल मीडिया पर भी इस विवाद को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग आनंद मोहन के बयानों को पार्टी के अंदर की सच्चाई बता रहे हैं, जबकि कई लोग इसे व्यक्तिगत नाराजगी और राजनीतिक दबाव की रणनीति मान रहे हैं।
फिलहाल बिहार की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का बड़ा केंद्र बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इस नाराजगी को शांत करने के लिए कोई बड़ा कदम उठाता है या बयानबाजी का यह दौर और तेज होता है। इतना जरूर साफ है कि आनंद मोहन के हालिया बयानों ने जेडीयू की आंतरिक राजनीति को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है।


