पर्यावरण और सेहत की सुरक्षा के लिए अनूठी पहल: बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर में ‘नो व्हीकल डे’ पर साइकिल से दफ्तर पहुंचे कुलपति और कर्मी

भागलपुर, 16 मई 2026। पर्यावरण संरक्षण, ईंधन की बचत और व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भागलपुर के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) परिसर में एक नई और अनुकरणीय प्रशासनिक परंपरा की शुरुआत की गई है। भारत सरकार और राष्ट्रीय नेतृत्व के वैश्विक हरित ऊर्जा तथा पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली के आह्वान के अनुपालन में विश्वविद्यालय प्रशासन ने परिसर के भीतर ‘नो व्हीकल डे’ (वाहन निषेध दिवस) का आयोजन किया। विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा पूर्व में जारी किए गए आधिकारिक विधिक आदेश के आलोक में शनिवार को परिसर का पूरा परिदृश्य बदला हुआ नजर आया। सामान्य दिनों में मोटर वाहनों की आवाजों से गूंजने वाले इस विशाल परिसर में पूरी तरह से शांति और स्वच्छता का माहौल देखा गया। इस विशेष अभियान के तहत विश्वविद्यालय के कुलपति, सभी संकायों के अधिष्ठाता (डीन), विभिन्न विभागों के निदेशक, प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक, शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारी अपने व्यक्तिगत वाहनों को छोड़कर या तो साइकिल चलाकर या फिर पैदल चलते हुए अपने-अपने नियत कार्यालयों तक पहुंचे।

कैंपस में दिखा बदलाव का दृश्य, शीर्ष अधिकारियों ने पेश की मिसाल

​विश्वविद्यालय के मुख्य प्रशासनिक भवन और विभिन्न अनुसंधान केंद्रों की ओर जाने वाले मार्गों पर सुबह से ही एक अनूठा और प्रेरणादायक दृश्य देखने को मिला। दैनिक बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज कराने की समय-सीमा से पहले ही विश्वविद्यालय के कुलपति स्वयं साइकिल के पैडल मारते हुए मुख्य प्रशासनिक विंग की ओर बढ़ते दिखाई दिए। उनके इस कदम ने पूरे विश्वविद्यालय परिवार के भीतर एक सकारात्मक प्रशासनिक संदेश का संचार किया। कुलपति के पीछे-पीछे विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और महिला कर्मचारी भी रंग-बिरंगी साइकिलों पर सवार होकर या समूह में पैदल संवाद करते हुए दफ्तरों की ओर अग्रसर रहे।

​इस आयोजन को लेकर विश्वविद्यालय की सुरक्षा और विधिक व्यवस्था विंग द्वारा मुख्य द्वारों पर विशेष बैरिकेडिंग की गई थी, ताकि अनजाने में भी कोई भी ईंधन चालित वाहन (पेट्रोल या डीजल गाड़ियां) परिसर के भीतर प्रवेश न कर सके। केवल आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं और अनिवार्य विधिक सुरक्षा वाहनों को ही इस प्रतिबंध से छूट दी गई थी। विश्वविद्यालय के इस फैसले का न केवल अधिकारियों ने स्वागत किया, बल्कि कृषि अनुसंधान में जुटे छात्र-छात्राओं ने भी इस अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और परिसर को पूरी तरह से कार्बन-मुक्त बनाने में अपनी विधिक और व्यावहारिक भूमिका निभाई।

साइकिल चलाना और पैदल चलना राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य के लिए विधिक कदम

​विश्वविद्यालय के मुख्य सभागार के समीप आयोजित एक अनौपचारिक विमर्श के दौरान कुलपति ने इस हरित पहल के दूरगामी विधिक और सामाजिक प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार को संबोधित करते हुए कहा कि साइकिल चलाना और छोटी दूरियों के लिए पैदल चलना न केवल हमारे व्यक्तिगत शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है, बल्कि यह देश के आर्थिक स्वास्थ्य तथा वैश्विक पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक बहुत बड़ा विधिक कदम है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में डीजल, पेट्रोल और अन्य जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ्यूल्स) की लगातार बढ़ती खपत और उनकी सीमित प्राकृतिक उपलब्धता को देखते हुए ईंधन संरक्षण आज के समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता बन चुका है।

​कुलपति ने आंकड़ों का हवाला देते हुए समझाया कि यदि समाज का प्रत्येक प्रबुद्ध नागरिक अपनी दैनिक दिनचर्या में छोटी दूरियों को तय करने के लिए मोटर चालित वाहनों के बजाय साइकिल या पैदल चलने की आदत को विधिक रूप से अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना ले, तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के आयात पर होने वाले भारी वित्तीय खर्च को कम किया जा सकता है। यह ईंधन की बचत के साथ-साथ शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण के स्तर में भारी कमी लाने का सबसे सरल और प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है।

राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पर्यावरण नीतियों को दैनिक जीवन में आत्मसात करने की प्रेरणा

​सबौर कृषि विश्वविद्यालय में इस ‘नो व्हीकल डे’ के आयोजन के सांगठनिक उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए प्रशासनिक अधिकारियों ने बताया कि इसका मुख्य लक्ष्य आम जनमानस को एक स्वच्छ और टिकाऊ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है। यह आयोजन सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री और बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा समय-समय पर शुरू किए गए विभिन्न पर्यावरण अनुकूल अभियानों, जैसे ‘मिशन लाइफ’ (Lifestyle for Environment) और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘जल-जीवन-हरियाली’ जैसी विधिक नीतियों के सिद्धांतों को दैनिक जीवन में अक्षरशः आत्मसात करने की एक जीवंत कड़‍ी है।

​एक अग्रणी कृषि अनुसंधान संस्थान होने के नाते, विश्वविद्यालय की यह विधिक जिम्मेदारी बनती है कि वह समाज के सामने पारिस्थितिक संतुलन (इकोलॉजिकल बैलेंस) का एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत करे। कृषि वैज्ञानिक खुद दिन-रात प्रकृति, मिट्टी और पौधों के बीच रहकर अनुसंधान करते हैं, ऐसे में पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना और कार्बन उत्सर्जन को न्यूनतम स्तर पर लाना इस संस्थान के मूल विधिक सिद्धांतों में शामिल है। इस अभियान के माध्यम से न केवल संस्थान के भीतर काम करने वाले कर्मियों को जागरूक किया गया, बल्कि सबौर और भागलपुर के आसपास के ग्रामीण इलाकों के किसानों और युवाओं के बीच भी पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बेहद सकारात्मक और व्यावहारिक संदेश प्रसारित करने का प्रयास किया गया है।

भविष्य के लिए हरित और स्वच्छ परिसर का विधिक खाका तैयार

​’नो व्हीकल डे’ के इस सफल और प्रभावी आयोजन के समापन सत्र के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस व्यवस्था को केवल एक दिन के प्रतीक के रूप में न रखकर भविष्य में एक स्थाई नीति के रूप में लागू करने का संकेत दिया है। कुलपति ने विश्वविद्यालय के सभी संकायों और हॉस्टलों के प्रभारियों से अपील की है कि वे इस आदत को अपने नियमित जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय के भीतर विभिन्न विंगों के बीच होने वाली बैठकों या फाइलों के आदान-प्रदान के लिए भी कर्मियों को साइकिल का ही उपयोग करना चाहिए।

​विश्वविद्यालय के इस पर्यावरण-अनुकूल कदम की सराहना भागलपुर के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों द्वारा भी बड़े पैमाने पर की जा रही है। लोगों का मानना है कि यदि जिले के अन्य बड़े शैक्षणिक संस्थान और सरकारी कार्यालय भी सप्ताह या महीने में कम से कम एक दिन इस प्रकार की विधिक व्यवस्था को अपने यहाँ अनिवार्य कर दें, तो भागलपुर शहर को जाम और प्रदूषण की गंभीर विभीषिका से काफी हद तक विधिक और व्यावहारिक मुक्ति दिलाई जा सकती है। विश्वविद्यालय प्रशासन अब परिसर के भीतर विभिन्न स्थानों पर ‘साइकिल स्टैंड्स’ और हरित गलियारों (ग्रीन कॉरिडोर्स) के निर्माण की विधिक योजना पर काम कर रहा है, ताकि आने वाले दिनों में नन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट (गैर-मोटर चालित परिवहन) को संपूर्ण परिसर में पूरी तरह से सुगम और सुरक्षित बनाया जा सके।

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