मिट्टी की सेहत और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा: बिहार में जैविक खेती को जन-आंदोलन बनाने की तैयारी, युवा किसानों को मिलेगा राजकीय सम्मान

पटना। बिहार की कृषि व्यवस्था में एक बड़े युगांतकारी परिवर्तन की नींव रखी जा रही है, जहाँ रसायनों की जगह प्रकृति और विज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में खेती केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षित पर्यावरण का आधार बनेगी। कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने राज्य के कृषि रोडमैप को नई दिशा देते हुए जैविक खेती को प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा है। पटना के मीठापुर स्थित कृषि भवन में आयोजित एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान उन्होंने यह संकल्प दोहराया कि बिहार की मिट्टी को रसायनों के जहर से मुक्त कर इसे फिर से उर्वर और जीवंत बनाया जाएगा। सरकार का मानना है कि इस बदलाव के सबसे बड़े संवाहक राज्य के युवा किसान होंगे, जिन्हें न केवल आधुनिक तकनीक से लैस किया जाएगा, बल्कि उनके उत्कृष्ट प्रयासों को राजकीय स्तर पर सम्मानित कर एक नई पहचान भी दी जाएगी।

गोबर और बायोगैस पर भारी अनुदान: पशुपालन और कृषि का नया मेल

​खेती की लागत को कम करने और घर पर ही जैविक खाद तैयार करने के लिए सरकार ने पशुपालन और कृषि के पारंपरिक रिश्तों को आधुनिकता का जामा पहनाया है। विजय कुमार सिन्हा ने बताया कि चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में बायोगैस और गोबर गैस इकाइयों की स्थापना के लिए 100 नई इकाइयों का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा और खाद की आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए इन इकाइयों पर सरकार 50 प्रतिशत तक का भारी अनुदान दे रही है। योजना के अनुसार, प्रत्येक पात्र किसान को बायोगैस इकाई स्थापित करने के लिए अधिकतम 22,500 रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाएगी।

​इसके साथ ही, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में ‘वर्मी कम्पोस्ट’ (केचुआ खाद) की भूमिका को अनिवार्य माना गया है। पूर्व के वर्षों के सफल परिणामों को देखते हुए, सरकार ने इस वर्ष 7500 नई पक्का वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों और व्यावसायिक वर्मी कम्पोस्ट इकाइयों के निर्माण का लक्ष्य रखा है। यह पहल उन किसानों के लिए वरदान साबित होगी जो बाजार से महंगी खाद खरीदने के बजाय अपनी जमीन पर ही पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद तैयार करना चाहते हैं।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन: 5700 हेक्टेयर में दिखेगा बदलाव का असर

​बिहार सरकार जैविक खेती के साथ-साथ प्राकृतिक खेती (Natural Farming) के प्रति भी अत्यंत गंभीर है। केंद्र और राज्य सरकार के साझा प्रयासों से ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन’ के अंतर्गत वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई है। इसके तहत राज्य के 5700 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती के क्रियान्वयन का लक्ष्य रखा गया है। सरकार उन किसानों को आर्थिक संबल देने के लिए प्रतिबद्ध है जो रासायनिक खेती छोड़कर इस वैकल्पिक पद्धति को अपनाना चाहते हैं।

​इस मिशन से जुड़ने वाले प्रत्येक किसान को 4,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से प्रोत्साहन अनुदान राशि सीधे उनके बैंक खातों में उपलब्ध कराई जाएगी। यह राशि उन शुरुआती खर्चों और चुनौतियों से निपटने में मदद करेगी जो पारंपरिक रासायनिक पद्धति से हटने के दौरान किसानों के सामने आती हैं। सरकार का मानना है कि इस योजना के सफल क्रियान्वयन से न केवल पानी की खपत कम होगी, बल्कि खेती की कुल लागत में भी भारी गिरावट आएगी, जिससे किसानों की शुद्ध आय में बढ़ोत्तरी निश्चित है।

वैज्ञानिकों और किसानों का सीधा संवाद: प्रयोगशाला से खेतों तक की दूरी होगी कम

​अक्सर यह देखा गया है कि नई तकनीक और शोध पत्रों की जानकारी सीधे खेतों तक नहीं पहुँच पाती। इस बाधा को दूर करने के लिए विजय कुमार सिन्हा ने एक अभिनव पहल की घोषणा की है। अब राज्य के हर जिले में अनुभवी शोधकर्ताओं (रिसर्चर्स) और प्रगतिशील किसानों की नियमित संयुक्त बैठकें आयोजित की जाएंगी। यह व्यवस्था केवल जिला स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि समय-समय पर राज्य स्तर पर भी ऐसे संवाद सत्र होंगे।

​इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि जैविक खेती के दौरान आने वाली तकनीकी समस्याओं, कीट नियंत्रण और पोषक तत्व प्रबंधन जैसे विषयों पर किसानों को विशेषज्ञों का सीधा परामर्श मिल सके। वैज्ञानिक खेती की पद्धतियों को सरल भाषा में किसानों तक पहुँचाया जाएगा ताकि वे अपनी समस्याओं का त्वरित और वैज्ञानिक समाधान प्राप्त कर सकें। यह पहल कृषि के वैज्ञानिक पक्ष को जमीनी हकीकत से जोड़ने का कार्य करेगी, जिससे नवाचार (Innovation) को बढ़ावा मिलेगा।

उत्पादकता और गुणवत्ता का संतुलन: दूर होगी किसानों की शंका

​जैविक खेती को लेकर किसानों के मन में अक्सर यह संशय रहता है कि रसायनों का त्याग करने से उनकी पैदावार घट जाएगी। इस मिथक को तोड़ते हुए विजय कुमार सिन्हा ने आश्वासन दिया कि सरकार का पूरा ध्यान एक ऐसे कृषि मॉडल को विकसित करने पर है जहाँ उत्पादकता भी बनी रहे और गुणवत्ता में भी अभूतपूर्व सुधार हो। उन्होंने जोर देकर कहा कि रसायनों के बिना भी वैज्ञानिक पद्धतियों, जैसे जीवामृत, घनजीवामृत और बीजामृत के उपयोग से उच्च उत्पादकता प्राप्त की जा सकती है।

​सरकार का लक्ष्य केवल जैविक उत्पाद पैदा करना नहीं है, बल्कि उनकी ऐसी ब्रांडिंग करना है जिससे किसानों को बाजार में उनके उत्पादों की बेहतर कीमत मिल सके। गुणवत्तापूर्ण और रसायन मुक्त उत्पादों की मांग आज वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, जिसका लाभ बिहार के किसानों को देने के लिए सरकार प्रमाणन (Certification) की प्रक्रिया को भी सरल और सुलभ बनाने जा रही है।

मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण: आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षा कवच

​वर्तमान समय में बढ़ती बीमारियों और गिरती रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को लेकर विजय कुमार सिन्हा ने गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के कारण हमारी थाली में पहुँचने वाला भोजन प्रदूषित हो चुका है, जिसका असर सीधा मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जैविक खेती के माध्यम से सरकार मानव स्वास्थ्य की रक्षा को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मान रही है।

​यह केवल मिट्टी बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की इम्यूनिटी को मजबूत बनाए रखने का एक सुरक्षा कवच है। रसायनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण और जल स्रोत भी दूषित हो रहे हैं, जिन्हें पुनर्जीवित करना समय की मांग है। जैविक खेती मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाती है और सूक्ष्म जीवों के पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से बहाल करती है। मंत्री ने आह्वान किया कि जैविक खेती को एक पद्धति के बजाय एक ‘जन-आंदोलन’ का रूप दिया जाए। जब समाज का हर वर्ग—युवा, वैज्ञानिक और किसान—एक साथ खड़ा होगा, तभी समृद्ध किसान, स्वस्थ समाज और स्वच्छ पर्यावरण का सपना साकार हो सकेगा।

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