बिहार के पुलों पर ’72 घंटे’ का सुरक्षा कवच: सचिव पंकज कुमार पाल का बड़ा आदेश; सेफ्टी ऑडिट में कोताही पर अब सिर्फ इंजीनियर नहीं, मुख्यालय के अफसर भी नपेंगे

पटना। बिहार की लाइफलाइन कहे जाने वाले पुलों की सेहत और उनकी मजबूती को लेकर राज्य सरकार अब ‘मिशन मोड’ में आ गई है। हाल के दिनों में बुनियादी ढांचे को लेकर उठते सवालों और आगामी मानसून की चुनौतियों को देखते हुए पथ निर्माण विभाग ने एक अभूतपूर्व फैसला लिया है। शनिवार, 09 मई 2026 को विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल ने एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक के बाद राज्य के तमाम बड़े पुलों के ‘सघन सेफ्टी ऑडिट’ का आदेश जारी कर दिया है। यह आदेश केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके साथ एक बेहद सख्त डेडलाइन भी जोड़ी गई है। सचिव ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले 72 घंटे के भीतर बिहार के हर महत्वपूर्ण पुल की बारीकी से जांच पूरी कर उसकी रिपोर्ट ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध होनी चाहिए। इस आदेश के बाद विभाग के क्षेत्रीय कार्यालयों से लेकर विकास भवन तक खलबली मच गई है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बार जवाबदेही का दायरा केवल फील्ड में तैनात अभियंताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लापरवाही की स्थिति में मुख्यालय स्तर के आला अधिकारियों पर भी कठोर कार्रवाई की गाज गिरेगी।

## 72 घंटे की डेडलाइन: सुरक्षा का ‘डिजिटल’ ऑडिट

​पंकज कुमार पाल की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में पथ निर्माण विभाग के साथ-साथ बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड (BRPNNL), बिहार राज्य सड़क विकास निगम (BSRDCL) और एनएच (National Highway) विंग के वरीय पदाधिकारी शामिल हुए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े क्षेत्रीय पदाधिकारियों को सचिव ने दो-टूक शब्दों में निर्देश दिया कि सुरक्षा के मानकों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

​इस ऑडिट की सबसे बड़ी विशेषता इसका डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम है। सचिव ने निर्देश दिया है कि जांच के बाद जो भी रिपोर्ट तैयार होगी, उसे सीधे PMIS (Project Management Information System) पोर्टल पर अपलोड करना अनिवार्य होगा। इससे मुख्यालय स्तर पर बैठे अधिकारी रियल-टाइम में यह देख सकेंगे कि किस पुल में क्या खामी है और उसकी मरम्मत के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। 72 घंटे का समय इसलिए तय किया गया है ताकि मानसून की पहली बारिश से पहले राज्य के जर्जर और संवेदनशील पुलों की पहचान कर उनकी तत्काल मरम्मत शुरू की जा सके।

## जांच का दायरा: 60 मीटर से लेकर ‘महासेतु’ तक की होगी पड़ताल

​विभाग ने इस सेफ्टी ऑडिट के लिए पुलों की श्रेणी तय कर दी है। सचिव के निर्देशानुसार, 60 मीटर से 250 मीटर और 250 मीटर से अधिक लंबाई वाले सभी पुलों का अनिवार्य रूप से सुरक्षा ऑडिट किया जाएगा। बिहार की भौगोलिक स्थिति और नदियों के जाल को देखते हुए इन लंबी दूरी के पुलों का सुरक्षित होना सामरिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

ऑडिट के मुख्य तकनीकी बिंदु:

  • बेयरिंग की स्थिति: पुल के स्लैब और पिलर के बीच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ‘बेयरिंग’ होता है। इसकी घिसाव या विस्थापन की गहराई से जांच होगी।
  • गर्डर और स्पैन स्लैब: कंक्रीट की संरचना में दरारें या लोहे के सरियों में जंग की स्थिति का पता लगाया जाएगा।
  • पाइल और ज्वाइंट: पानी के भीतर पिलर की नींव (पाइल) और स्लैब के बीच के जोड़ों की मजबूती की जांच होगी।
  • अप्रोच रोड और ड्रेनेज: पुल तक पहुँचने वाली सड़क की स्थिति और बारिश के पानी की निकासी के लिए बने ड्रेनेज की सफाई सुनिश्चित की जाएगी ताकि जलजमाव से संरचना को नुकसान न पहुँचे।

## जवाबदेही का नया ‘हथौड़ा’: मुख्यालय भी होगा जिम्मेदार

​इस बैठक में सचिव पंकज कुमार पाल ने जिस सबसे कड़े पहलू पर जोर दिया, वह है अधिकारियों की जवाबदेही। अब तक बिहार में पुलों से जुड़ी किसी भी दुर्घटना या लापरवाही के लिए केवल स्थानीय कार्यपालक अभियंताओं को दोषी मानकर कार्रवाई की जाती थी। लेकिन इस बार सचिव ने चेतावनी का लहजा बदलते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी पुल में लापरवाही के कारण क्षति होती है, तो संबंधित क्षेत्र के कार्यपालक अभियंता के साथ-साथ मुख्यालय स्तर के अधिकारी भी समान रूप से जिम्मेदार माने जाएंगे।

​यह बदलाव विभाग की कार्यसंस्कृति में एक बड़ी क्रांति माना जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि मुख्यालय के अधिकारियों को भी अपनी डेस्क से बाहर निकलकर या डिजिटल माध्यमों से लगातार मॉनिटरिंग करनी होगी। दोषियों के खिलाफ केवल विभागीय जांच नहीं, बल्कि ‘कठोर कार्रवाई’ की बात कही गई है, जो यह संकेत देती है कि सरकार अब बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चल रही है।

## मानसून की आहट और ‘एनएच विंग’ को विशेष निर्देश

​बिहार में मानसून के दौरान नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ता है, जो पुलों की नींव पर भारी दबाव डालता है। इसे ध्यान में रखते हुए पंकज कुमार पाल ने सभी कार्यपालक अभियंताओं को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने को कहा है। विशेष रूप से एनएच (NH) विंग को निर्देशित किया गया है कि वे राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित बड़े पुलों का सुरक्षा ऑडिट प्राथमिकता के आधार पर करें क्योंकि इन पर भारी वाहनों (ट्रक और हाईवा) का दबाव सबसे अधिक होता है।

​सचिव ने बैठक में यह भी कहा कि जिन पुराने पुलों की स्थिति जर्जर पाई जाती है, वहां तत्काल मरम्मत का कार्य शुरू किया जाए। यदि कोई पुल अत्यधिक संवेदनशील पाया जाता है, तो वहां यातायात नियंत्रण या भार कम करने के उपाय भी तत्काल प्रभाव से लागू किए जाएंगे। विभाग का लक्ष्य केवल कागजी रिपोर्ट तैयार करना नहीं, बल्कि राज्य के हर हिस्से में सुगम और सुरक्षित यातायात सुनिश्चित करना है ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके।

## बुनियादी ढांचे की मजबूती: विकसित बिहार का संकल्प

​पथ निर्माण विभाग की यह सक्रियता बिहार के बदलते राजनैतिक और प्रशासनिक परिदृश्य का हिस्सा है। सचिव पंकज कुमार पाल की अध्यक्षता में हुई इस बैठक ने यह साफ कर दिया है कि राज्य सरकार अब पुलों के निर्माण के साथ-साथ उनके मेंटेनेंस (रखरखाव) पर भी उतना ही ध्यान दे रही है। 72 घंटे के भीतर होने वाला यह सघन ऑडिट आने वाले दिनों में बिहार के सड़क परिवहन के इतिहास में एक ‘सुरक्षा मानक’ के रूप में याद रखा जाएगा।

​क्षेत्रीय पदाधिकारियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दिए गए कड़े निर्देशों का असर अब सड़कों पर दिखने लगा है। विभिन्न जिलों में अभियंताओं की टीमें क्रेन और आधुनिक उपकरणों के साथ पुलों के नीचे और स्लैब के ज्वाइंट्स की जांच में जुट गई हैं। PMIS पोर्टल पर अपलोड होने वाली ये रिपोर्टें भविष्य में पुलों के स्वास्थ्य कार्ड (Health Card) के रूप में काम करेंगी। विभाग की इस मुस्तैदी से आम जनता के बीच भी यह संदेश गया है कि उनकी सुरक्षा और राज्य की संपत्ति की रक्षा के लिए प्रशासन अब पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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